भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 601
५७२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लगा लिया। तत्पश्चात् महर्षि मुद्गलने भगवान्‌को प्रणाम किया और भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। भगवान् विष्णुके चले जानेपर महर्षि मुद्गलने प्रतिदिन सुरभिके दूधसे श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये अग्निमें आहुति करते हुए मोक्षदायक फुल्लग्राममें अनेक सौ वर्षोंतक निवास किया। तदनन्तर देहान्त होनेपर उन्होंने भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लिया।


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कपितीर्थकी महिमा—उसमें स्नान करनेसे रम्भा और घृताचीका शापसे उद्धार

श्रीसूतजी कहते हैं—अब मैं 'कपितीर्थ' के माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, जिसे पूर्वकालमें सब वानरोंने मिलकर गन्धमादन पर्वतपर निर्माण किया था। उस तीर्थको बनाकर वानरोंने उसमें हर्षपूर्वक स्नान किया और तीर्थके लिये इस प्रकार वर दिया—'जो मनुष्य भक्तिसे विनीतचित्त होकर इस तीर्थमें स्नान करेंगे, वे महापातकोंसे मुक्त होकर मोक्षके भागी होंगे। इस तीर्थमें गोता लगानेवाले पुरुषोंको नरकका भय नहीं होगा। इसमें स्नान करनेवाले लोगोंको दरिद्रता नहीं प्राप्त होगी। यमराजकी यातना भी नहीं भोगनी पड़ेगी।' इस प्रकार इस तीर्थके लिये वरदान देकर कपीश्वरोंने दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके उनसे भी प्रार्थना की—'स्वामिन् ! आप भी इस तीर्थके लिये अद्भुत वरदान दें।' वानरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर उनकी प्रीतिके लिये श्रीरामचन्द्रजीने हर्षपूर्वक उस तीर्थको वरदान दिया—'इस तीर्थमें गोता लगानेवालोंको गंगास्नानका फल मिलेगा, प्रयागस्नानका पुण्य प्राप्त होगा तथा सब तीर्थोंके फलकी प्राप्ति होगी। यह अति उत्तम तीर्थ कपियोंद्वारा बनाया गया है, इसलिये संसारमें 'कपितीर्थ' के नामसे इसकी प्रसिद्धि होगी।' अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको इस तीर्थमें अवश्य स्नान करना चाहिये। प्राचीन कालकी बात है, कुशिकवंशमें विश्वामित्र नामक राजा हुए। एक समय महाराज विश्वामित्रने अपने राज्यका निरीक्षण करनेके लिये विशाल सेनाके साथ पृथ्वीपर घूमना आरम्भ किया। अनेक देशोंमें घूमकर वे वसिष्ठजीके आश्रमपर गये। महात्मा वसिष्ठने अपनी कामधेनुके प्रभावसे राजा विश्वामित्रका उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया। कौशिक विश्वामित्रने कामधेनुका प्रभाव जानकर वसिष्ठजीसे वह सब मनोरथोंको देनेवाली गाय माँगी। वसिष्ठजीने उसे देना अस्वीकार कर दिया। तब वे बलपूर्वक उस गायको खींचकर ले चले। कामधेनुने म्लेच्छोंकी बहुत बड़ी सेना उत्पन्न की, जिससे विश्वामित्रको हार खानी पड़ी। तब उन्होंने महादेवजीकी आराधना करके उनसे अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किये और वसिष्ठजीके आश्रमपर जाकर उन सबका प्रयोग करना प्रारम्भ किया। विश्वामित्रने सब अस्त्र चलाये, ब्रह्मास्त्रका भी प्रयोग किया; परंतु ब्रह्मन्दन वसिष्ठजीने अपने तपोबलसे एकमात्र ब्रह्मदण्डके द्वारा विश्वामित्रके उन सब अस्त्रोंको नष्ट कर दिया। इस प्रकार पराजित होनेपर विश्वामित्रको बड़ी लज्जा हुई। अब वे स्वयं ब्राह्मणत्वप्राप्तिके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। उन्होंने उत्तर दिशामें जाकर हिमालय पर्वतपर कौशिकी नदीके पापनाशक पुण्यमय तटपर एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या की। निराहार और जितेन्द्रिय रहकर नेत्र बंद करके श्वास और क्रोधको जीतकर वे निश्चल भावसे खड़े रहे। तब इन्द्र आदि देवताओंने रम्भासे कहा—'रम्भे! तुम हिमालय पर्वतपर कौशिकी नदीके किनारे तपस्या करनेवाले महामुनि