संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 608, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५७९
मुनियोंके ये वचन सुनकर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीने लिंगस्थापनाके लिये पुण्यकाल निश्चित किया, जो दो ही मुहूर्त्तमें आनेवाला था। उसे निश्चित करके उन्होंने हनुमान्जीको शिवलिंग ले आनेके लिये कैलास पर्वतपर भेजा। हनुमान्जी बड़े पराक्रमी थे, उन्होंने दो मुहूर्त्तका पुण्यकाल जानकर भी भुजाओंपर ताल ठोंकी। वे सब देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके देखते-देखते बड़े वेगसे ऊपरको उड़े और आकाशमार्गको लाँघते हुए कैलास पर्वतपर जा पहुँचे। वहाँ उन्हें लिङ्गरूपधारी महादेवजीका दर्शन नहीं हुआ। तब उन्होंने महादेवजीको प्रसन्न किया और उनकी कृपासे शिवलिंगको प्राप्त किया। इतनेमें ही वहाँ तत्त्वदर्शी मुनियोंने जब यह देखा कि हनुमान्जी अभी नहीं आये तथा स्थापनाका मुहूर्त्त अब बीतना ही चाहता है, तब उन्होंने परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी! अब तो पुण्यकाल बीत रहा है, अतः जानकीने जो लीलापूर्वक बालूका शिवलिंगका बनाया है, उसीको इस समय स्थापित कर दीजिये।' यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने शीघ्रतापूर्वक श्रीजानकीजी तथा मुनियोंके सहित मंगलाचार आरम्भ किया और ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिको बुधवार और हस्त नक्षत्रके योगमें गद करण, आनन्द और व्यतीपात योग, कन्याराशिके चन्द्रमा तथा वृषराशिके सूर्यमें परम पुण्यमय उपयुक्त दस योगोंकी उपस्थितिमें गन्धमादन पर्वतपर सेतुकी सीमामें लिंगरूपधारी भगवान् शिवकी स्थापना की। उस समय लिंगमें पार्वतीसहित भगवान् शंकर प्रत्यक्ष प्रकट हो गये थे। उनके ललाटपर चन्द्रमाकी कला और साक्षात् गंगा शोभा पा रही थीं। भगवान् साम्बशिवने सब लोगोंको शरण देनेवाले महात्मा रघुनाथजीको इस प्रकार वरदान दिया—'राघवेन्द्र! आपके द्वारा यहाँ स्थापित किये गये शिवलिंगका जो दर्शन करेंगे, वे महापातकोंसे युक्त होंगे, तो भी उनके पापोंका नाश हो जायगा। जैसे धनुष्कोटिमें गोता लगानेसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार इस 'रामेश्वर लिंग'के दर्शनसे महापातक भी नष्ट हो जायँगे।'
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने भगवान् रामेश्वरके सामने नन्दिकेश्वरको स्थापित किया और अपने धनुषकी कोटिसे रामेश्वर शिवके अभिषेकके लिये धरती फोड़कर एक कूप तैयार किया। फिर उससे जल लेकर भगवान् शंकरको स्नान कराया। वही पुण्यमय तीर्थ 'कोटितीर्थ' के नामसे विख्यात हुआ। मुनिवरो! कोटितीर्थकी महिमाका वर्णन पहले किया जा चुका है।
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा हनुमान्जीको ज्ञानोपदेश
**श्रीसूतजी कहते हैं—**इस प्रकार अनायास ही सब कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा उस शिवलिंगकी प्रतिष्ठा हो जानेपर पवनपुत्र हनुमान्जी एक उत्तम शिवलिंग लेकर आ पहुँचे। आकर उन्होंने दशरथनन्दन वीरवर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। फिर क्रमशः सीता, लक्ष्मण तथा सुग्रीवको भी मस्तक झुकाया। हनुमान्जीने देखा रघुनाथजी सीताजीके बनाये हुए बालुकामय शिवलिंगका मुनियोंके साथ पूजन कर रहे हैं। तब वे खिन्न होकर बोले—'भगवन्! कैलास पहुँचनेपर वहाँ मुझे भगवान् शंकरका दर्शन नहीं हुआ। तब मैंने तपस्याद्वारा उन्हें प्रसन्न किया और उनकी कृपासे शिवलिंग प्राप्त होनेपर मैं तुरंत यहाँ लौट आया हूँ। तबतक आपने दूसरे ही बालुकामय शिवलिंगकी स्थापना कर ली और अब मुनियों, देवताओं तथा गन्धर्वोंके साथ