भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 609

५८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उसीकी पूजा करते हैं। मैं जो कैलास पर्वतसे इस शिवलिंगको लेकर आया सो व्यर्थ ही हुआ। अब मैं इस शिवलिंगको क्या करूँ?'

**श्रीरामचन्द्रजी बोले—**कपे! इस संसारमें जो जन्म ले चुके हैं, जो जन्म लेनेवाले हैं और जो मर चुके हैं, उन सबके तथा अपने और पराये सब कार्योंको मैं भलीभाँति जानता हूँ। जीव अपने कर्मके अनुसार अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही मरता है। अपने कर्मोंके अनुसार नरकमें भी वह अकेला ही जाता है। वानरश्रेष्ठ! तत्त्वज्ञानमें बाधा उपस्थित करनेवाले इस शोकको अपने मनमें क्यों स्थान देते हो। तत्त्वज्ञानमें ही सदा स्थित रहो। यह आत्मा स्वयंप्रकाश है, तुम सदा आत्माके इसी स्वरूपका चिन्तन करो। देह आदिमें ममता त्याग दो, सदा धर्मका आश्रय लो, साधु पुरुषोंका सेवन करो, सम्पूर्ण इन्द्रियोंका दमन करो, दूसरोंके दोषकी चर्चासे दूर रहो एवं शिव और विष्णु आदि देवताओंकी सदा पूजा करो। सर्वदा सत्य बोलो, शोक छोड़कर आत्मा और परमात्माकी एकताका अनुभव करो। इस संसारमें भ्रम भी यथार्थकी भाँति प्रतीत होता है, कहीं शोभनमें अशोभनका भ्रम होता है और कहीं अशोभनमें शोभनका। यह सब मोहके वैभवसे ही होता है। भ्रान्त मनुष्योंका विभिन्न विषयोंमें राग हो जाता है। राग और द्वेषके बलसे बँधकर वे धर्म और अधर्मके वशीभूत होते हैं तथा उन्हींके अनुसार देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि योनियोंमें तथा नरकोंमें पड़ते हैं। चन्दन, अगर और कपूर आदि पदार्थ अत्यन्त शोभन हैं, परंतु जिसके स्पर्शसे ये भी मलरूप हो जाते हैं, वह शरीर सुखस्वरूप कैसे माना जा सकता है? जिसके सम्पर्कसे अत्यन्त सुन्दर भक्ष्य-भोजन आदि सब उत्तम पदार्थ विष्ठारूपमें बदल जाते हैं, वह शरीर सुखरूप कैसे हो सकता है? जिसके संगसे सुगन्धित एवं शीतल जल मूत्ररूप हो जाता है, उस शरीरको शोभन कैसे कहा जा सकता है? कपे! तुम्हीं बताओ, जिसके संसर्गमें आनेपर अत्यन्त सफेद एवं धुले हुए वस्त्र भी पसीने आदिके लगनेसे मैले हो जाते हैं, वह शरीर कैसे शोभन माना जा सकता है? वायुनन्दन! मुझसे परमार्थकी बात सुनो। यह संसार एक गड्ढेके समान है। इसमें कुछ भी सुख नहीं। यहाँ पहले तो जीवका जन्म होता है, तत्पश्चात् उसकी बाल्यावस्था रहती है, फिर वह जवान होता है। उसके बाद वह बुढ़ापा भोगता है। तदनन्तर मृत्युको प्राप्त होता है और मृत्युके बाद पुनः जन्मका कष्ट भोगता है। इस प्रकार अज्ञानके प्रभावसे ही मनुष्य दुःख पाता है और अज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर उसे उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। अज्ञानकी निवृत्ति ज्ञानसे ही होती है, कर्मसे नहीं। ज्ञान परब्रह्म परमात्माका नाम है। वेदान्तवाक्यके श्रवण और मननसे जो ज्ञान होता है, वह विरक्त पुरुषको ही होता है, दूसरेको नहीं। श्रेष्ठ अधिकारीको गुरुदेवकी कृपासे भी ज्ञान हो जाता है—यह सत्य है। मनुष्यके हृदयमें जो कामनाएँ हैं, वे सब-की-सब जब छूट जाती हैं, तब वह जीवन्मुक्त होकर इसी जीवनमें परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है। क्रूर काल जागते, सोते, खाते और ठहरते समय सदा ही इस जीवको अपनी ओर खींचता रहता है। संग्रहका अन्त विनाश है, अधिक ऊँचे चढ़नेका अन्त नीचे गिरना है, संयोगका अन्त वियोग और जीवनका अन्त मरण है*। जैसे पके हुए फलोंको गिरनेके


* सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥
(स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४५। ४१)