भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 610
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५८१

सिवा और कोई भय नहीं है, वैसे ही जन्म लेनेवाले मनुष्योंको मृत्युके सिवा और कोई भय नहीं है। जैसे सुदृढ़ खम्भोंवाला गृह सुदीर्घकालके बाद जीर्ण होनेपर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जराजीर्ण होकर मृत्युके अधीन हो नष्ट हो जाता है। दिन और रात बीतते चले जा रहे हैं। इससे मनुष्योंकी आयु नष्ट होती है। इस दशामें तुम अपनी आत्माके लिये शोक करो। दूसरी किसी बातके लिये क्यों शोक करते हो? कपीश्वर! कोई खड़ा हो या दौड़ता हो, उसकी आयुका प्रतिक्षण नाश हो रहा है। मृत्यु साथ-साथ चलती है, साथ ही बैठती है और दूर देशमें साथ-साथ जाकर पुनः साथ ही लौट आती है*। शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिरके बाल सफेद हो गये और वृद्धावस्था एवं दमा और खाँसीसे देह शिथिल होती जाती है। कपिश्रेष्ठ! जैसे समुद्रमें बहते हुए दो काठ एक-दूसरेसे मिलकर फिर विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार कालयोगसे मनुष्योंका एक-दूसरेके साथ संयोग और वियोग होता है। इसी प्रकार स्त्री, पुत्र, भाई, क्षेत्र और धन—ये सब कभी कुछ कालके लिये एकत्र होते और फिर अन्यत्र चले जाते हैं। जैसे कोई पथिक राह चलते हुए किसी दूसरे पथिकसे कहता है कि 'ठहरिये मैं भी आपके साथ चलूँगा' और इस प्रकार दोनों कुछ कालतक साथ हो जाते हैं और फिर अलग-अलग चले जाते हैं, कपे! इसी प्रकार स्त्री और पुत्र आदिका समागम नश्वर है। शरीरके उत्पन्न होनेके साथ ही निश्चय ही मृत्यु भी उत्पन्न होती है। इस अवश्यम्भावी मृत्युको टालनेका कोई उपाय नहीं है। वत्स! इस शरीरका अन्त हो जानेपर देहाभिमानी जीव अपने कर्मकी गतिके अनुसार दूसरा शरीर धारण कर लेता है। वानर! प्राणियोंका सदा एक स्थानपर निवास नहीं होता। अपने-अपने कर्मवश सभी जीव एक-दूसरेसे विलग हो जाते हैं।

कपिश्रेष्ठ! जीवोंके शरीर जिस प्रकार उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, उस प्रकार आत्माका जन्म और मरण नहीं होता। अंजनानन्दन! तुम शोकरहित अद्वैत ज्ञानमय सत्स्वरूप निर्मल परब्रह्म परमात्माका दिन-रात चिन्तन करो। ऐसी दृष्टि होनेपर तुम्हारा किया हुआ प्रत्येक कर्म मेरा किया हुआ है और मेरा किया हुआ प्रत्येक कर्म तुम्हारा किया हुआ है। इसलिये कपे! मैंने जो शिवलिंगकी स्थापना की है, वह तुमने ही की है—ऐसा समझना चाहिये। शिवलिंगस्थापनका पुण्यकाल बीता जा रहा था, इसलिये मैंने सीताजीके बनाये हुए बालुकामय शिवलिंगको यहाँ स्थापित किया है। अतः तुम कोप और दुःख न करो। आज शुभ दिन है। इसमें कैलाससे लाये हुए शिवलिंगको तुम्हीं स्थापित करो। यह लिंग तीनों लोकोंमें तुम्हारे नामसे प्रसिद्ध होगा। पहले हनुमदीश्वरका दर्शन करके तब रामेश्वरका दर्शन होगा। कपे! तुमने ब्रह्मराक्षसोंके समुदायका वध किया है, इसलिये अपने नामसे शिवलिंगकी स्थापना करनेपर तुम उस पापसे छूट सकोगे। यह हनुमन्नामक शिवलिंग साक्षात् भगवान् शिवका दिया हुआ है। इसका दर्शन करके जो रामेश्वर शिवका दर्शन करेगा, वह कृतकृत्य हो जायगा।


* नश्यत्यायुः स्थितस्यापि धावतोऽपि कपीश्वर।
सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति। चरित्वा दूरदेशं च सह मृत्युर्निवर्तते॥
(स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४५। ४५-४६)