भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 614
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५८५ ---|---

बड़े-बड़े दान देते थे। एक दिन बुद्धिमान् राजा शंकर शिकार खेलनेके लिये तपोवनमें गये और वहाँ दुर्गम एवं रमणीय प्रदेशों, पर्वतों तथा गुफाओंमें भ्रमण करने लगे। वनके एक भागमें व्याघ्रचर्मधारी, शान्त, जितेन्द्रिय एवं मनको वशमें रखनेवाले एक मुनि गुफाके भीतर निवास करते थे। राजाने दूरसे उन्हें देखकर व्याघ्र ही समझा और बड़े वेगसे झुकी हुई गाँठवाले बाणका प्रहार करके उन्हें मार डाला। राजाके उस बाणने पतिके पास बैठी हुई पतिव्रता मुनिपत्नीका भी वध कर डाला। माता और पिता दोनोंको मारा गया देख उनका पुत्र अत्यन्त दुःखसे पीड़ित होकर कातरभावसे वनमें रोने और विलाप करने लगा—‘हा तात! हा माता! तुम दोनों मुझे छोड़कर कहाँ चले गये। पिताजी! अब मुझे वेद-शास्त्र कौन पढ़ायेगा? मा! कौन मुझे शिक्षाके साथ-साथ भोजन देगी। हाय तात! आप तो परलोकगामी हो गये। अब मुझे सदाचारकी शिक्षा कौन देगा? हाय! आज किस पापीने अपने बाणोंसे बिना किसी अपराधके आप दोनोंको मार डाला! आप ही दोनों मेरे गुरु और मेरे प्राण थे, सदा तपस्यामें लगे रहते थे, तो भी न जाने किस पापीके हाथसे आप मारे गये?’

इस प्रकार कहकर उन दोनों दम्पतिका पुत्र फूट-फूटकर रोने लगा। उसका प्रलाप सुनकर वनमें विचरनेवाले राजा शंकर तुरंत ही उस शब्दकी ओर लक्ष्य करके उस कन्दराके समीप जा पहुँचे। उस वनके रहनेवाले मुनि भी उस आश्रमपर एकत्रित हो गये। मुनियोंने बाणसे मरे हुए मुनि और उनकी पत्नीको देखा। पासमें धनुष धारण किये हुए राजा शंकरपर भी दृष्टिपात किया तथा माता-पिताके लिये विलपते हुए उस मुनिकुमारको भी देखा। उसे देखकर वे अत्यन्त व्याकुल हो उठे और ‘मत रोओ’ ऐसा कहते हुए उस कातर बालकको धैर्य बँधाने लगे।

मुनि बोले—बेटा! धनी, दरिद्र, मूर्ख, पण्डित, मोटे अथवा पतले, सभी जीवोंके प्रति यमराजका समान बर्ताव होता है। कोई वनमें रहता हो, या नगर और गाँवमें; पर्वतपर रहता हो, या दूसरे किसी स्थानमें— सभी जन्तुओंको एक दिन मृत्युके वशमें जाना पड़ता है। वत्स! गर्भमें रहनेवाले, जन्म ग्रहण कर चुकनेवाले, बालक, जवान और बूढ़े—सभी जीवोंको यमलोककी यात्रा करनी पड़ती है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी सबको समय आनेपर यह शरीर त्यागना पड़ता है। महामते! द्विजपुत्र! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और वर्णसंकर सबको एक दिन यमलोक जाना पड़ता है। देवता, मुनि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, राक्षस तथा अन्य सब प्राणी भी नाशको प्राप्त होते हैं। इसलिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। अद्वितीय सच्चिदानन्दस्वरूप जो उपनिषत्प्रतिपादित ब्रह्म है, उसका जन्म-मरण और वृद्धिको प्राप्त होना नहीं बनता। यह नौ द्वारोंवाला शरीर मल-मूत्रका भाण्ड है, पीब और रक्तका घर है। पानीके बुलबुलेके समान यह क्षणभंगुर है एवं इसमें कीड़ोंका ढेर (कीटाणुओंका समुदाय) भरा है। काम, क्रोध, भय, द्रोह, मोह और मात्सर्यका एकमात्र कारण यह शरीर ही है। मल और मूत्रका यह एकमात्र भाजन है। ऐसे घृणित शरीरमें जो सुन्दर एवं श्रेष्ठ बुद्धि रखता है, वह मूर्ख है तथा वह खोटी बुद्धिवाला है। जैसे अनेक छेदवाले घड़ेमें पानी नहीं ठहरता, उसी प्रकार अनेक छेदोंवाले इस अपवित्र शरीरमें प्राणवायुकी स्थिति दीर्घकालतक कैसे हो सकती है? अतः तुम अपने पिता और माताके लिये शोक न करो। वे दोनों अपने कर्मवश इस घरको छोड़कर कहीं चले गये। तुम अपने कर्मवश इस भूतलपर वर्तमान हो। जब तुम्हारे प्रारब्धकर्मका क्षय होगा, तब तुम भी मर जाओगे। तब उनके लिये शोक क्या