भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करना है? क्या मरनेवाला प्रेत मरे हुए प्रेतके लिये शोक करे? तुम्हारे माता और पिता जब उत्पन्न हुए थे, उस समय तुम्हारा जन्म नहीं हुआ था। अतः तुमसे उनकी गति भिन्न है। यदि तुम्हारी और उनकी समान गति होती, तो तुम भी उन्हींके साथ चले जाते। जिस बाणसे वे मरे हैं, उसीसे तुम भी मर गये होते और वे मरकर जहाँ गये हैं, वहीं तुम भी पहुँच जाते। ऐसा नहीं हुआ इससे सिद्ध है कि तुम्हारी और उनकी समान गति नहीं है। अतः उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये। मरे हुए प्राणियोंके भाई-बन्धु जो इस भूतलपर आँसू बहाते हैं, उन आँसुओंको मरे हुए प्रेत परलोकमें पीते हैं*। अतः शोक छोड़कर एकाग्रचित्त हो धैर्य धारण करो और वैदिक रीतिसे माता-पिताका प्रेतकार्य करो। तुम्हारे पिता और माता बाणके आघातसे मरे हैं, अतः उस दोषकी शान्तिके लिये इनकी अस्थियाँ लेकर रामेश्वर शिवके क्षेत्रमें मुक्तिदायक रामसेतुमें स्थापित करो तथा सपिण्डीकरण आदि श्राद्ध भी वहीं करो। इससे उनके दुर्मृत्युजनित दोषकी शान्ति हो जायगी।

मुनियोंके ऐसा कहनेपर शाकल्यपुत्र जांगलने माता-पिताके सब अन्त्येष्टि संस्कार किये। तत्पश्चात् दूसरे दिन उनकी अस्थियाँ लेकर वे हालास्य क्षेत्रमें गये। हालास्य क्षेत्रसे रामेश्वरक्षेत्रमें जाकर मुनियोंके बताये अनुसार वहाँ उन अस्थियोंको डाल दिया और वहीं रहकर एक वर्ष पूरा होनेतक सब श्राद्ध आदि कार्य सम्पन्न किये। वर्षभर निवास करनेके पश्चात् एक दिन जांगल मुनिने रातको सपनेमें अपने माता-पिताको देखा। उन दोनोंने अपने-अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा आदि धारण कर रखे थे। दोनों ही पद्ममाला और तुलसीकी मालासे विभूषित हो गरुड़की पीठपर बैठे थे। उनके कानोंमें मकराकृति कुण्डल झिलमिला रहे थे, कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलको अलंकृत कर रही थी और वे दोनों पीत वस्त्र धारण करके अतिशय शोभा पा रहे थे। मुनिपुत्रने इस प्रकारकी झाँकीमें माता-पिताका दर्शन करके मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। तदनन्तर जांगल मुनि पुनः अपने आश्रमपर आकर सुखपूर्वक रहने लगे। उन्होंने माता-पिताके विषयमें सपनेमें देखा हुआ वृत्तान्त वहाँके सब ब्राह्मणोंको बड़ी प्रसन्नताके साथ सुनाया। सुनकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए।

इधर जांगलको अन्त्येष्टि संस्कारका आदेश देनेके पश्चात् राजा शंकरकी ओर देखकर उन सभी महर्षियोंने उस समय बड़ा क्रोध किया। वे उन्हें कोसते हुए बोले—'महामूर्ख पाण्ड्यनरेश! तूने क्रूरतावश ब्राह्मणकी हत्या की है, तुझे स्त्रीहत्या और ब्रह्महत्याका पाप लगा है। अतः तू प्रज्वलित अग्निमें जलकर अपने शरीरका त्याग कर दे। अन्यथा सैकड़ों प्रायश्चित्त करनेपर भी तेरी शुद्धि न होगी। तेरे साथ वार्तालाप करनेमात्रसे दूसरोंको भारी पाप लगेगा।' मुनियोंके ऐसा कहनेपर राजा शंकरने कहा—'महात्माओ! ऐसा ही हो। मैं ब्रह्महत्याकी शुद्धिके लिये आपके समीप प्रज्वलित अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दूँगा। आपलोग मुझपर अनुग्रह करें, जिससे शरीर त्याग देनेपर मेरा यह पातक नष्ट हो जाय।' सब मुनियोंसे ऐसा कहकर पाण्ड्यनरेशने अपने मन्त्रियोंको बुलाकर कहा—'सचिवगण! मैंने अनजानमें ब्रह्महत्या तथा क्रूरतापूर्ण स्त्रीहत्या कर डाली है, जो महानरक प्रदान करनेवाली है। इस पातककी शुद्धिके लिये मैं बड़ी-बड़ी


* मृतानां बान्धवा ये तु मुञ्चन्त्यश्रूणि भूतले। पिबन्त्यश्रूणि तान्यद्धा मृताः प्रेताः परत्र वै॥ (स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४८। ४२)