संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 616, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५८७
लपटोंवाली प्रज्वलित अग्निमें मुनियोंकी आज्ञासे अपने शरीरको त्याग दूँगा। तुम जल्दी काष्ठ ले आओ और उसके द्वारा अग्निको प्रज्वलित करो। मेरे पुत्र सुरुचिको शीघ्र ही राज्यसिंहासनपर बिठा दो।'
राजाके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मन्त्रीलोग रोने लगे और बोले—पाण्ड्यनाथ! महाराज! आप तो शत्रुओंपर भी स्नेह रखनेवाले हैं। हम सबको आपने सदा पुत्रकी भाँति पाला है। हम आपके बिना देवपुरीके समान सुन्दर अपनी राजधानीमें प्रवेश नहीं करेंगे। हम भी आपके साथ महाकाष्ठोंद्वारा प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर जायँगे।
मन्त्रियोंका प्रलाप सुनकर पाण्ड्यनरेश शंकरने उन्हें समझाते हुए कहा—'मन्त्रियो! मुझ महापातकी राजाको लेकर क्या करोगे? अग्निमें प्रवेश करनेके लिये शीघ्र काष्ठ एकत्रित करो। उनके ऐसा कहनेपर मन्त्रीलोग शीघ्र काष्ठ ले आये। राजा शंकरने देखा, काष्ठोंद्वारा अग्नि प्रज्वलित हो चुकी है। तब उन्होंने स्नान और आचमन करके शुद्धचित्त हो मुनियोंके समीप उस अग्निकी परिक्रमा की। फिर उन मुनियोंकी भी परिक्रमा करके अग्नि और मुनि दोनोंको प्रणाम किया। उसके बाद भगवान् शंकरका ध्यान करके राजा धैर्यपूर्वक ज्यों ही अग्निमें गिरनेको तैयार हुए, त्यों ही सब ऋषि-मुनियोंके सुनते-सुनते आकाशवाणी हुई—'राजा शंकर! तुम अभी अग्निमें प्रवेश न करो। महामते! तुम्हें ब्रह्महत्याके कारण भय नहीं होना चाहिये। दक्षिण समुद्रके किनारे गन्धमादन पर्वतपर महापातकोंका नाश करनेवाले परम पुण्यमय रामसेतुमें श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा स्थापित जो रामेश्वर नामक शिवलिंग है, उसकी एक वर्षतक तीनों समय भक्तिपूर्वक सेवा करो। भगवान् रामेश्वरकी परिक्रमापूर्वक उन्हें नमस्कार करो, उनका महाभिषेक करो और प्रतिदिन नाना प्रकारका नैवेद्य निवेदन करो। चन्दन, अगर और कपूरके द्वारा श्रीरामलिंगकी पूजा करो। दो भार गायके घीसे भगवान्का अभिषेक कराओ। प्रतिदिन दो भार गोदुग्धसे और एक द्रोण शहदसे उस शिवलिंगको नहलाओ। नित्यप्रति खीरसे भगवान्को नैवेद्य लगाओ तथा रोज-रोज रातमें तिलके तेलसे दीपक जलाकर दीपदानद्वारा आराधना करो। महाराज! रामेश्वर शिवकी इस प्रकार उपासना करनेसे तुम्हारी स्त्रीहत्या और ब्रह्महत्या तत्काल नष्ट हो जायगी। तुम शीघ्र रामसेतुपर जाओ और निरन्तर रामेश्वरका भजन करो। इस कार्यमें विलम्ब न करो।'
वह आकाशवाणी सुनकर सब ऋषि राजाको जल्दी जानेकी प्रेरणा देने लगे—महाराज! मोक्षदायक रामसेतुपर शीघ्र जाओ। हमने भगवान् रामेश्वरके माहात्म्यको न जाननेके कारण ही आपको प्रज्वलित अग्निमें देह त्याग करनेकी सलाह दी थी। मुनीश्वरोंकी ऐसी आज्ञा पाकर महाराज शंकरने चतुरंगिणी सेना तो नगरमें भेज दी और स्वयं हर्षयुक्त चित्तसे महर्षियोंको नमस्कार करके कुछ इने-गिने सैनिकोंके साथ बहुत धन लेकर भगवान् रामेश्वरकी सेवाके लिये गन्धमादन पर्वतपर गये तथा वहाँ शुद्धिदायक रामसेतुपर उन्होंने एक वर्षतक निवास किया। राजा एक समय भोजन करते और क्रोध एवं इन्द्रियसमूहको वशमें रखते थे। वे तीनों समय भक्तिपूर्वक भगवान् रामेश्वरकी सेवा करते हुए उन्हें प्रतिदिन दस भार धन भेंट करते थे। उन्होंने नित्यप्रति भगवान् रामेश्वरकी महापूजा करवायी। प्रतिदिन धनुष्कोटिमें भक्तिपूर्वक स्नान और प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको अन्नदान किया। आकाशवाणीने जैसा बताया था, उसके अनुसार सब पूजन किया। इस प्रकार एक वर्ष पूरा होनेपर राजा शंकरने सन्तुष्टचित्त हो दयानिधान भगवान् रामेश्वरका इस प्रकार स्तवन किया—'मैं सबके ईश्वर रुद्रको नमस्कार करता हूँ। रामेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् उमापतिको