संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रणाम करता हूँ। देव! कृपया मेरी रक्षा कीजिये और मेरी ब्रह्महत्याको शीघ्र जला डालिये। त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले महादेव! आप कालकूट विषको भक्षण करनेवाले हैं। दयासिन्धो! आप मेरी रक्षा करें और मुझे स्त्रीहत्यारूपी पापसे छुड़ावें। गंगाधर! विरूपाक्ष! रामनाथ! त्रिलोचन! प्रभो! आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरा पालन कीजिये। विभो! मेरा पातक नष्ट कर दीजिये। कामारे! आप भक्तोंकी मनोवांछित कामनाओंको देनेवाले हैं। रामेश्वर! मुझपर कृपाकटाक्ष कीजिये। धूर्जटे! मुझे शुद्ध बना लीजिये। मार्कण्डेयजीको भयसे बचानेवाले मृत्युंजय! आप अविनाशी शिव हैं, भगवती गिरिराजनन्दिनी आपके आधे अंगमें निवास करती हैं, आपको नमस्कार है। आप मुझे पापरहित कीजिये। रुद्राक्षकी मालासे विभूषित चन्द्रशेखर भगवान् शंकर! आप मुझे वैदिक सदाचारके योग्य बना दीजिये, आपको नमस्कार है। रामेश्वरदेवको नमस्कार है। आप मुझे शुद्धि देनेवाले हों। जो आनन्दस्वरूप और सच्चिदानन्दघन हैं, उन रामेश्वर शिवको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। मेरा पातक नष्ट हो जाय।'
इस प्रकार रामेश्वर महादेवकी भक्तिपूर्वक स्तुति करते हुए राजा शंकरके मुखसे अत्यन्त भयानक ब्रह्महत्या निकली, जो नील वस्त्र धारण करनेवाली और अत्यन्त क्रूर थी। उसके सिरके बाल रक्तकी भाँति लाल थे। राजाके मुखसे निकली हुई उस बीभत्स ब्रह्महत्याको भगवान् शंकरकी आज्ञासे भैरवने त्रिशूलसे मार डाला। तब भगवान् रामेश्वरने राजासे कहा—'पाण्ड्यनरेश! महाराज! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर तुम्हें वर देना चाहता हूँ, तुम कोई मनोवांछित वर माँगो। स्त्रीहत्या और ब्रह्महत्यासे जो तुम्हें दोष लगा था, वह निकल गया। अब तुम शुद्ध हो, निष्पाप हो, पूर्ववत् अपने राज्यका पालन करो। राजन्! मेरी सेवा करनेवाले मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेते। वे मेरे सायुज्य मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं। जो मानव इस स्तोत्रद्वारा भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करेंगे, उनके महापातकोंकी राशिको मैं अवश्य नष्ट कर दूँगा। अब तुम इच्छानुसार वर माँगो।'
राजा बोले—महेश्वर! मैं आपके दर्शनमात्रसे ही कृतार्थ हो गया हूँ। इस समय मुझे इससे बढ़कर माँगने योग्य कोई वस्तु नहीं प्रतीत होती। आपके दोनों चरणकमलोंमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे।
'तथास्तु' कहकर भगवान् रामेश्वरने राजापर अनुग्रह किया और वे पुनः उसी शिवलिंगमें अन्तर्धान हो गये। भगवान् रामेश्वरकी कृपा प्राप्त करके राजा भी कृतार्थ हो गये और उन्हें प्रणाम करके अपनी पुरीको चले गये। उन्होंने वनवासी मुनियोंको यह वृत्तान्त बतलाया। तब उन मुनियोंने प्रसन्नचित्त होकर राजाको पुनः उनके राज्यपर अभिषिक्त किया। तदनन्तर अन्तकाल आनेपर राजाने रामेश्वर शिवका ध्यान करते हुए देहका त्याग किया और भगवान् रामेश्वरके सायुज्य मोक्षको प्राप्त कर लिया।
राजा पुण्यनिधिके यहाँ महालक्ष्मीका पुत्रीके रूपमें निवास एवं सेतुमाधवकी महिमा
श्रीसूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें चन्द्रवंशी राजा पुण्यनिधि मथुरा नामक पुरीका पालन करते थे। किसी समय राजा पुण्यनिधि मथुरामें अपने पुत्रका राज्याभिषेक करके अन्तःपुरकी रानियोंके साथ स्नानके लिये उत्सुक हो रामसेतु नामक तीर्थमें गये। उनके साथ उनकी चतुरंगिणी सेना भी थी। वहाँ धनुष्कोटिमें संकल्पपूर्वक स्नान करके उन नृपश्रेष्ठने वहाँके अन्य तीर्थोंमें