भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 618

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य *

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भी स्नान किया और भक्तिपूर्वक भगवान् रामेश्वरकी सेवा की। इस प्रकार उन्होंने बहुत कालतक उसी तीर्थमें सुखपूर्वक निवास किया। वहाँ रहते हुए राजा पुण्यनिधिने किसी समय भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला एक यज्ञ किया। यज्ञ पूर्ण होनेपर वे अपनी स्त्री तथा परिवारके लोगोंके साथ अवभृथ स्नानके लिये श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें गये और वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया।

इस प्रकार राजा पुण्यनिधि जब उस तीर्थमें निवास करते थे, उसी समय एक दिन राजाकी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुने लक्ष्मीजीको भेजा। वे आठ वर्षकी सुन्दरी बालिका होकर गन्धमादन पर्वतपर गयीं। उस समय राजा पुण्यनिधि धनुष्कोटिमें स्नान करनेके लिये गये थे। वहाँ स्नान करके पुण्यकर्म करनेके पश्चात् राजाने अलौकिक रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित एक अष्टवर्षीया कन्या देखी। उसे देखकर पुण्यनिधिने पूछा—'बेटी! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है?' राजाके इस प्रकार पूछनेपर कन्याने कहा—'महाराज! मेरे न माता हैं, न पिता हैं और न कोई भाई-बन्धु हैं। मैं अनाथ हूँ। मैं आपकी पुत्री होकर रहना चाहती हूँ। आपको पिताके रूपमें देखती हुई सदा आपके घरमें निवास करूँगी। परन्तु मेरी एक शर्त है, 'जो मुझे हाथसे पकड़े अथवा हठपूर्वक खींचकर ले जाय, उसको यदि आप दण्ड दें, तभी मैं आपके घरमें आपकी पुत्री होकर चिरकालतक निवास करूँगी।' कन्याके ऐसा कहनेपर राजा पुण्यनिधि बोले—'शुभे! मैं तुम्हारी कही हुई सब बातें मानूँगा। मेरे भी कोई पुत्री नहीं है। एक ही वंशधर पुत्र है। भद्रे! जिसके प्रति तुम्हारा अनुराग होगा, उसे ही तुम्हें समर्पित करूँगा। बेटी! आओ मेरे घर चलो और मेरी पत्नीकी पुत्री होकर अन्तःपुरमें स्वेच्छानुसार निवास करो।'

'बहुत अच्छा' कहकर वह कन्या राजाके साथ उनके घर गयी। राजाने अपनी पत्नीके हाथमें उस कल्याणमयी कन्याको सौंप दिया। रानीका नाम विन्ध्यावली था। राजाने उनसे कहा—'देवि! यह हम दोनोंकी पुत्री है। इसकी दूसरे पुरुषोंसे सर्वथा रक्षा करो।' विन्ध्यावलीने राजाकी आज्ञा शिरोधार्य की और उस कन्याको हाथमें ले लिया। राजाके द्वारा कन्याका पुत्रकी भाँति पालन-पोषण होने लगा। वह लाड़-प्यार और सुखसे राजभवनमें रहने लगी। तदनन्तर जगदीश्वर भगवान् विष्णु अपनी लक्ष्मीको ढूँढ़नेके लिये वैकुण्ठसे निकले और रामसेतुपर गये। वहाँ सब ओर भ्रमण करते रहे। इसी समय फूल तोड़नेके कौतूहलसे वह कन्या सखियोंके सहित राजाके गृहोद्यानमें गयी और वृक्षोंसे फूल चुनने लगी। तब भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारण करके वहीं आकर खड़े हो गये। ब्राह्मणको सहसा वहाँ आया देख वह कन्या ठिठककर खड़ी रह गयी। उस मधुरभाषिणी कन्याको देखकर उस द्विजने शीघ्रतापूर्वक उसका हाथ पकड़ लिया। यह देख वह कन्या अपनी सखियोंके साथ उस उपवनमें चिल्लाने लगी। उसकी चिल्लाहट सुनकर राजा पुण्यनिधि वहाँ आ गये। वहाँ राजाने उस कन्या और उसकी सखियोंसे पूछा—'बेटी! तुम इस समय अपनी सखियोंके साथ क्यों चिल्ला उठी थी?'

कन्या बोली—पाण्ड्यनाथ! इस ब्राह्मणने हठपूर्वक मेरा हाथ पकड़ लिया था। तात! यहीं उस वृक्षके नीचे वह निर्भय होकर खड़ा है। राजा परम बुद्धिमान् और सद्गुणोंके निधान थे। उन्होंने उस ब्राह्मणका यथार्थ बल न जानते हुए उसे हठात् पकड़ लिया और रामेश्वर मन्दिरमें ले जाकर वहाँ पैरोंमें बेड़ी डाल और हाथोंमें रस्सीसे बाँधकर पुनः उसे मण्डपमें ले आये। अपनी पुत्रीको आश्वासन देकर राजाने अन्तःपुरमें भेज दिया और स्वयं भी परम सुन्दर भवनमें