संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५९१ ---|---
जाकर शयन किया। सोते समय उन्होंने स्वप्नमें उस ब्राह्मणको देखा। वह शंख, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे विभूषित था। उसके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिका आभूषण शोभा पा रहा था। ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् श्रीहरि विराजमान थे। उन्होंने अपने श्रीअंगोंमें पीताम्बर धारण किया था। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कृष्ण मेघके समान श्याम थी, मुखपर मनोहर मुसकानकी मनोहर छटा छा रही थी और स्वच्छ दन्तपंक्ति चमक रही थी। कानोंमें मकराकृति कुण्डल शोभायमान थे। विष्वक्सेन आदि पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित थे। भगवान् शेषशय्यापर लेटे हुए थे और नारद आदि देवर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे। वहीं उन्होंने अपनी कन्याको भी देखा, जो विकसित कमलके आसनपर विराजमान थी। वह कन्या नहीं, साक्षात् लक्ष्मी थीं। उन्होंने अपने हाथमें कमल धारण कर रखा था और उनके मस्तकपर काले-काले घुँघराले बाल बड़ी शोभा पा रहे थे। इस प्रकार राजाने रात्रिमें अपनी कन्याको महालक्ष्मीके स्वरूपमें देखा। यह देखकर राजा सहसा उठ बैठे और कन्याके घरमें गये। वहाँ उन्होंने कन्याको उसी रूपमें देखा, जैसे स्वप्नमें उसका दर्शन हुआ था। प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर राजा पुण्यनिधि कन्याको साथ ले रामेश्वरमन्दिरमें पहुँचे और उस श्रेष्ठ मण्डपमें गये, जहाँ ब्राह्मणको रख छोड़ा था। वहाँ ब्राह्मण देवताको उन्होंने साक्षात् श्रीहरिके रूपमें देखा, ठीक उसी रूपमें, जैसा कि स्वप्नमें दर्शन हुआ था। वनमाला आदि चिह्नोंसे पहचाने जानेवाले भगवान् विष्णुको जानकर राजाने उनकी इस प्रकार स्तुति की—'कमलाकान्त! आपको नमस्कार है। गरुड़ध्वज! आप प्रसन्न होइये। शाङ्गिपाणे! आपको नमस्कार है, आप मेरा अपराध क्षमा करें। आप निर्गुण, अप्रमेय तथा बुद्धिके साक्षी विष्णु हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले परमात्मा श्रीनिवासको नमस्कार है। कृपामूर्ते! आपके लिये नमस्कार है। मधुसूदन! आप मेरा यह अपराध क्षमा करें।'
इस प्रकार महाविष्णुकी स्तुति करके राजा पुण्यनिधिने सम्पूर्ण जीवोंकी जननी श्रीलक्ष्मीजीका भी स्तवन किया—'सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली देवि! आपको नमस्कार है। आप भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें निवास करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। समुद्रसे प्रकट हुई हरिप्रिया महालक्ष्मी! आपको नमस्कार है। आप ही सिद्धि, पुष्टि, स्वधा, स्वाहा, सन्ध्या, प्रभा, धात्री, भूति, श्रद्धा, मेधा और सरस्वती हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। देवेश्वरि! आप ही यज्ञविद्या, महाविद्या, अतिशय शोभामयी गुह्यविद्या, आत्मविद्या तथा सब प्राणियोंको मुक्ति देनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। संसारकी रक्षा करनेवाली जगदम्बिके! आप अपनी दयादृष्टिसे मेरी रक्षा करें। महेश्वरि! आप ब्रह्माजीकी माता हैं, आपको नमस्कार है।'
महालक्ष्मीकी इस प्रकार स्तुति करके राजाने पुनः भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना की—विष्णो! मैंने अज्ञानवश आपके पैरोंमें बेड़ी डालकर जो इस समय आपके प्रति अपराध किया है, वह स्पष्ट ही द्रोह है आप उसे क्षमा करें। मधुसूदन! आप सम्पूर्ण जगत्के पिता हैं, पिताको पुत्रका अपराध क्षमा करना चाहिये। आपने अपराधी दैत्योंको अपना स्वरूपतक दे डाला है। भगवन्! मेरे भी इस अपराधको आप क्षमा करें। कृपानिधे! मारनेके लिये आयी हुई पूतनाको भी आपने अपने चरण-कमलोंमें स्थान दिया है, मेरी भी रक्षा कीजिये। लक्ष्मीकान्त! केशव! मुझपर अपनी कृपापूर्ण दृष्टि डालिये।
राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् विष्णुने कहा—राजन्! मुझे बन्धनमें डालनेके कारण जो तुमको भय हो रहा है, उसे त्याग दो। तुमने इस तीर्थमें मेरी प्रसन्नताके लिये यज्ञ किया है। अतः तुम मेरे प्रिय भक्त हो। शत्रुदमन! मैं भक्तोंके अपराध सदा ही क्षमा करता हूँ। तुम्हारी भक्ति जाननेके लिये मेरी