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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५९१ ---|---

जाकर शयन किया। सोते समय उन्होंने स्वप्नमें उस ब्राह्मणको देखा। वह शंख, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे विभूषित था। उसके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिका आभूषण शोभा पा रहा था। ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् श्रीहरि विराजमान थे। उन्होंने अपने श्रीअंगोंमें पीताम्बर धारण किया था। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कृष्ण मेघके समान श्याम थी, मुखपर मनोहर मुसकानकी मनोहर छटा छा रही थी और स्वच्छ दन्तपंक्ति चमक रही थी। कानोंमें मकराकृति कुण्डल शोभायमान थे। विष्वक्सेन आदि पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित थे। भगवान् शेषशय्यापर लेटे हुए थे और नारद आदि देवर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे। वहीं उन्होंने अपनी कन्याको भी देखा, जो विकसित कमलके आसनपर विराजमान थी। वह कन्या नहीं, साक्षात् लक्ष्मी थीं। उन्होंने अपने हाथमें कमल धारण कर रखा था और उनके मस्तकपर काले-काले घुँघराले बाल बड़ी शोभा पा रहे थे। इस प्रकार राजाने रात्रिमें अपनी कन्याको महालक्ष्मीके स्वरूपमें देखा। यह देखकर राजा सहसा उठ बैठे और कन्याके घरमें गये। वहाँ उन्होंने कन्याको उसी रूपमें देखा, जैसे स्वप्नमें उसका दर्शन हुआ था। प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर राजा पुण्यनिधि कन्याको साथ ले रामेश्वरमन्दिरमें पहुँचे और उस श्रेष्ठ मण्डपमें गये, जहाँ ब्राह्मणको रख छोड़ा था। वहाँ ब्राह्मण देवताको उन्होंने साक्षात् श्रीहरिके रूपमें देखा, ठीक उसी रूपमें, जैसा कि स्वप्नमें दर्शन हुआ था। वनमाला आदि चिह्नोंसे पहचाने जानेवाले भगवान् विष्णुको जानकर राजाने उनकी इस प्रकार स्तुति की—'कमलाकान्त! आपको नमस्कार है। गरुड़ध्वज! आप प्रसन्न होइये। शाङ्गिपाणे! आपको नमस्कार है, आप मेरा अपराध क्षमा करें। आप निर्गुण, अप्रमेय तथा बुद्धिके साक्षी विष्णु हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाले परमात्मा श्रीनिवासको नमस्कार है। कृपामूर्ते! आपके लिये नमस्कार है। मधुसूदन! आप मेरा यह अपराध क्षमा करें।'

इस प्रकार महाविष्णुकी स्तुति करके राजा पुण्यनिधिने सम्पूर्ण जीवोंकी जननी श्रीलक्ष्मीजीका भी स्तवन किया—'सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाली देवि! आपको नमस्कार है। आप भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें निवास करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। समुद्रसे प्रकट हुई हरिप्रिया महालक्ष्मी! आपको नमस्कार है। आप ही सिद्धि, पुष्टि, स्वधा, स्वाहा, सन्ध्या, प्रभा, धात्री, भूति, श्रद्धा, मेधा और सरस्वती हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। देवेश्वरि! आप ही यज्ञविद्या, महाविद्या, अतिशय शोभामयी गुह्यविद्या, आत्मविद्या तथा सब प्राणियोंको मुक्ति देनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। संसारकी रक्षा करनेवाली जगदम्बिके! आप अपनी दयादृष्टिसे मेरी रक्षा करें। महेश्वरि! आप ब्रह्माजीकी माता हैं, आपको नमस्कार है।'

महालक्ष्मीकी इस प्रकार स्तुति करके राजाने पुनः भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना की—विष्णो! मैंने अज्ञानवश आपके पैरोंमें बेड़ी डालकर जो इस समय आपके प्रति अपराध किया है, वह स्पष्ट ही द्रोह है आप उसे क्षमा करें। मधुसूदन! आप सम्पूर्ण जगत्‌के पिता हैं, पिताको पुत्रका अपराध क्षमा करना चाहिये। आपने अपराधी दैत्योंको अपना स्वरूपतक दे डाला है। भगवन्! मेरे भी इस अपराधको आप क्षमा करें। कृपानिधे! मारनेके लिये आयी हुई पूतनाको भी आपने अपने चरण-कमलोंमें स्थान दिया है, मेरी भी रक्षा कीजिये। लक्ष्मीकान्त! केशव! मुझपर अपनी कृपापूर्ण दृष्टि डालिये।

राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् विष्णुने कहा—राजन्! मुझे बन्धनमें डालनेके कारण जो तुमको भय हो रहा है, उसे त्याग दो। तुमने इस तीर्थमें मेरी प्रसन्नताके लिये यज्ञ किया है। अतः तुम मेरे प्रिय भक्त हो। शत्रुदमन! मैं भक्तोंके अपराध सदा ही क्षमा करता हूँ। तुम्हारी भक्ति जाननेके लिये मेरी

राजाको स्वप्नमें भगवान्‌के दर्शन


राजाके द्वारा लक्ष्मीनारायणका स्तवन

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९३

ही प्रेरणासे मेरी प्रिया लक्ष्मी तुम्हारे घर आयी थीं और तुमने इनका भलीभाँति संरक्षण किया है। अतः मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। संसारमें जो पुरुष मेरी स्वरूपभूता इन महालक्ष्मीमें भक्ति रखता है, वह मेरा भक्त कहलाता है और जो इनसे विमुख है, वह मेरा द्वेषपात्र माना गया है। तुमने भक्तिपूर्वक इनका पूजन किया है, अतः तुम्हारे द्वारा मेरी भी पूजा सम्पन्न हो गयी; क्योंकि ये लक्ष्मी मुझसे अभिन्न हैं। इसलिये तुमने मेरा अपराध नहीं, पूजन ही किया है। मेरी स्वरूपभूता लक्ष्मी सम्पूर्ण जगत्की माता तथा वेदत्रयीरूपा हैं। उनकी रक्षा करते हुए जो तुमने मुझे बन्धनमें डाला है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। ये लक्ष्मी वास्तवमें तुम्हारी पुत्री हैं।

भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेके पश्चात् लक्ष्मीने भी कहा—राजन् ! तुमने अपने घरमें मेरी रक्षा की, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारी भक्तिका शोधन करनेके लिये ही मैं और भगवान् दोनों यहाँ आये हैं। तुम्हारे मनःसंयमरूप योग और भक्तिभावसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हम दोनोंकी कृपासे तुम्हें सदा सुखकी प्राप्ति होगी। हमारे चरणोंमें तुम्हारी अविचल भक्ति बनी रहेगी और देहावसान होनेपर तुम्हें पुनरावृत्तिरहित मेरा सायुज्य मोक्ष प्राप्त होगा। भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त तुम्हारी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहेगी।

तदनन्तर भगवान् विष्णुने पुनः इस प्रकार कहा—नृपश्रेष्ठ! तुमने जिस प्रकार मुझे यहाँ बेड़ीसे बाँधा है, उसी रूपसे मैं इस मण्डपमें निवास करूँगा। 'सेतुमाधव' के नामसे यहाँ मेरी प्रसिद्धि होगी। जो मनुष्य यहाँ मुझ सेतुमाधवकी सेवा करेंगे, वे सम्पूर्ण मनोरथों और अन्तमें सायुज्य मोक्षको भी प्राप्त होंगे। तुम्हारे द्वारा किये हुए मेरे तथा लक्ष्मीजीके स्तोत्रको जो प्रसन्नतापूर्वक पढ़ेंगे, सुनेंगे और लिखेंगे, उनकी मेरे परमधामसे कभी पुनरावृत्ति नहीं होगी। राजा पुण्यनिधिसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु सदा पूर्णरूपसे वहाँ निवास करने लगे हैं। राजाने सेतुमाधवरूपी भगवान् विष्णुको प्रणाम करके भक्तिभावसे उनकी महापूजा की और श्रीरामेश्वरका सेवन करके अपने घरको प्रस्थान किया। मथुरामें उन्होंने अपने पुत्रको राजा बना दिया और स्वयं जीवनभर उस परम उत्तम सेतुतीर्थमें निवास किया। देहावसान होनेपर राजाने मोक्ष प्राप्त कर लिया। उनकी पत्नी विन्ध्यावली भी उन्हींके साथ मृत्युको प्राप्त हुई। उस पतिव्रताने भी पतिके साथ उत्तम गति प्राप्त कर ली।

जो सेतुतीर्थमें भक्तिपूर्वक प्रतिदिन सेतुमाधवका दर्शन करते हैं, उनकी कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो सेतुतीर्थकी रेणुका लेकर गंगाजीमें डालता है, वह मृत्युके पश्चात् भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो गंगाजीका जल लाकर भगवान् रामेश्वरको स्नान कराता और उसके भारको सेतुतीर्थमें रखता है, वह निश्चय ही परब्रह्मको प्राप्त होता है। ब्राह्मणो ! इस प्रकार तुमसे भगवान् सेतुमाधवकी महिमाका वर्णन किया गया।


५९४ संक्षिप्त स्कन्दपुराण


सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! अब मैं सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम बतलाता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। श्रेष्ठ बुद्धिवाला पुरुष स्नान और आचमन करके विशुद्धचित्त हो नित्यकर्म पूरा कर ले। उसके बाद भगवान् रामेश्वर शिव तथा राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन करावे। फिर सब अंगोंमें भस्म धारण करके मस्तकमें त्रिपुण्ड्र अथवा गोपीचन्दनसे तिलक करे। रुद्राक्षकी माला धारण करके हाथमें पवित्री पहन ले और पवित्रतापूर्वक यह संकल्प करे कि 'मैं सेतुतीर्थकी यात्रा करूँगा।' तत्पश्चात् भक्तिभावसे अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए मौनावलम्बनपूर्वक अपने घरसे निकले। अथवा शिवजीका पंचाक्षर नाममन्त्र जपता रहे। मनको वशमें रखे। प्रतिदिन एक बार हविष्यान्न भोजन करे। क्रोध और इन्द्रियोंको काबूमें रखे। जूता, खड़ाऊँ अथवा छाता न धारण करे। पान न खाये। तेल न लगावे। स्त्री-प्रसंग आदिसे बचकर रहे। शौच-सन्तोष आदि नियमोंके तथा सदाचारके पालनमें तत्पर रहे। समयपर सन्ध्योपासना करे। तीनों समय गायत्रीकी उपासना और श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करता रहे। मार्गमें सेतुतीर्थकी महिमाका प्रतिदिन आदरपूर्वक पाठ करे अथवा रामायण या किसी अन्य पुराणका पाठ करे। व्यर्थकी बातें छोड़कर सेतुतीर्थकी यात्रा करे। आत्मशुद्धिके लिये प्रतिग्रह न स्वीकार करे। सदाचारको न छोड़े। मार्गमें शिव-विष्णु आदिकी पूजा तथा बलिवैश्वदेवादि कर्म करता रहे। ब्रह्मयज्ञ आदि धर्म, अग्निहोत्र कर्म तथा शक्तिके अनुसार अतिथियोंको अन्न-पान आदिका दान करे। रास्तेमें भगवान् शिव और विष्णु आदिके नाम जपे तथा उनके स्तोत्रोंका पाठ करे। निषिद्ध कर्मोंको सर्वथा त्याग दे और सदा धर्मका ही आचरण करे। इस प्रकारके नियमोंका पालन करते हुए पहले सेतुमूल स्थानको जाय। वहाँ एकाग्रचित्त हो समुद्रका आवाहन करके उसे प्रणाम करे। तदनन्तर समुद्रके लिये अर्घ्य दे। अर्घ्यके पश्चात् भगवान्‌से आज्ञा लेकर समुद्रमें स्नान करे। मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए मुनि, देवता, वानर और पितरोंके लिये तर्पण करे।

समुद्रको प्रणाम करनेका मन्त्र

नमस्ते विश्वगुप्ताय नमो विष्णो ह्यपाम्पते।
नमो हिरण्यशृङ्गाय नदीनां पतये नमः ॥

'विश्वमें गुप्तस्वरूपसे व्यापक एवं जलोंके स्वामी श्रीविष्णुदेव*! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हिरण्यमय शृंगसे सुशोभित नदीपति सागर! आपको नमस्कार है।'

अर्घ्यदानका मन्त्र

सर्वरत्नमयः श्रीमान् सर्वरत्नाकराकर।
सर्वरत्नप्रधानस्त्वं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥

'सब रत्नोंके आकर महासागर! तुम सर्वरत्नमय एवं श्रीसम्पन्न हो। तुम्हीं सब रत्नोंमें प्रधान हो। मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार करो।'

भगवान्‌से आज्ञा लेनेका मन्त्र

अशेषजगदाधार शंखचक्रगदाधर।
देहि देव ममानुज्ञां युष्मत्तीर्थनिषेवणे ॥

'सम्पूर्ण जगत्‌के आधार शंख-चक्र-गदाधारी नारायण! अपने तीर्थका सेवन करनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये।'

सेतुकी पूर्व दिशामें सुग्रीवका, दक्षिणमें नलका, पश्चिममें मयन्दका, उत्तरमें द्विविदका और मध्यमें श्रीराम, लक्ष्मण, यशस्विनी सीता, अंगद, वायुपुत्र


* 'सरसामस्मि सागरः' इस भगवद्वचनके अनुसार समुद्र भगवान्‌की विभूति है। इसलिये उसे 'विष्णु' कहा गया है।

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५१५

हनुमान् तथा विभीषणका स्मरण करना चाहिये। ‘हिरण्यशृंगम्’ इत्यादि दो मन्त्रोंद्वारा नाभिमें भगवान् नारायणका स्मरण करे। स्नानादि कर्मोंमें भगवान् नारायणका चिन्तन करनेवाला पुरुष ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वह इस संसारमें फिर जन्म नहीं लेता; उसके समस्त पापोंका भी प्रायश्चित्त हो जाता है। प्रह्लाद, नारद, व्यास, अम्बरीष, शुक तथा अन्यान्य भगवद्भक्तोंका एकाग्रचित्त होकर चिन्तन करना चाहिये।*

समुद्रमें स्नान करनेका मन्त्र

वेदादिर्यो वेदवसिष्ठयोनिः सरित्पतिः सागररत्नयोनिः।
अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोधा विष्णोरमृतस्य नाभिः॥
इदं तेऽन्याभिरस्यमानमद्भिर्याः काश्च सिन्धुं प्रविशन्त्यापः।
सर्पो जीर्णामिव त्वचं जहामि पापं शरीरात्सशिरस्कोऽभ्युपेत्य॥

‘हे सागर! तुम वेदोंके आदि तथा वेद और वशिष्ठकी योनि हो, सरिताओंके स्वामी हो और सम्पूर्ण रत्नोंकी उत्पत्तिके स्थान हो। अग्नि तुम्हारा कारण तथा यज्ञ तुम्हारे शरीरका उपादान है। तुम भगवान् विष्णुके वीर्यको धारण करते हो। तुम अमृतकी नाभि हो। तुम्हारे जलसे तथा जो नदियाँ समुद्रमें प्रवेश करती हैं, उनसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य जलसे भी सिरसहित स्नान करके मैं अपने इस पापको शरीरसे उसी प्रकार त्याग देता हूँ, जैसे सर्प अपने पुराने केंचुलको त्याग देता है।’

इस प्रकार सेतुमें तीन बार स्नान करे। यदि मनुष्य देवीपत्तनसे प्रारम्भ करके सेतुकी यात्रा करे, तो नौ प्रस्तरोंके बीचसे मोक्षदायक सेतुमें अपनी पापराशिके निवारणके लिये समुद्र-स्नान करे और यदि दर्भशयनके मार्गसे मुक्तिदायक सेतुतीर्थमें जाय तो वहाँ समुद्रमें ही स्नान करे।

स्नानके पश्चात् पिप्पलाद, कवि, कण्व, कृतान्त, जीवितेश्वर, मन्यु, कालरात्रि, विद्या, अहः, गणेश्वर, वसिष्ठ, वामदेव, पराशर, उमापति, वाल्मीकि, नारद, वालखिल्य मुनिगण, नल, नील, गवाक्ष, गवय, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, शरभ, ऋषभ, सुग्रीव, हनुमान्, वेगदर्शन, राम, लक्ष्मण, महाभागा यशस्विनी सीता तथा विभु— इन सबके लिये चतुर्थ्यन्त नामोंका नमःसहित उच्चारण करके तर्पण करना चाहिये। जैसे ‘पिप्पलादाय नमः’, ‘कवये नमः’ इत्यादि। देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको विधिपूर्वक क्रमशः अक्षत, यव, तिलयुक्त जलसे उनके द्वितीयान्त नामोंका उच्चारण करके तर्पण करे। यथा ‘ब्रह्माणं तर्पयामि, विष्णुं तर्पयामि’ इत्यादि। मनुष्य प्रसन्नचित्त हो हाथमें पवित्री धारण करके जलमें खड़ा होकर तर्पण करे। इस प्रकार तर्पण और नमस्कार करके जलसे बाहर निकले। भीगे वस्त्रको खोलकर सूखा वस्त्र पहन ले; फिर आचमन करके हाथमें पवित्री लिये हुए विधिपूर्वक श्राद्ध करे। तिल और चावलोंसे पितरोंको पिण्ड दे।

तदनन्तर चक्रतीर्थमें जाकर वहाँ भी स्नान करे और सेतुके अधिपति भगवान् श्रीनारायणका दर्शन करे। जो पश्चिम मार्गसे जाता हो, वह वहाँके चक्रतीर्थमें स्नान करके दर्भशय्यापर सोनेवाले भगवान्‌का भक्तिपूर्वक दर्शन करे। उसके बाद कपितीर्थमें स्नान करके सीताकुण्डमें गोता लगावे। तत्पश्चात् उत्तम फलवाले ऋणमोचनतीर्थमें स्नान करके वहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करे। फिर लक्ष्मणतीर्थमें जाय और कण्ठसे ऊपर क्षौर कराकर अपने पापोंका चिन्तन करते हुए उसमें स्नान करे। इसके बाद रामतीर्थमें नहाकर देवालयमें जाय। पुनः पापविनाशनतीर्थमें नहाकर गंगा, यमुना, सावित्री, सरस्वती, गायत्री एवं हनुमत्कुण्डमें स्नान करके ब्रह्मकुण्डमें जाकर विधिपूर्वक स्नान करे। ब्रह्मकुण्डके बाद नागकुण्डमें जाकर स्नान


* प्रह्लादं नारदं व्यासमम्बरीषं शुकं तथा। अन्यांश्च भगवद्भक्तांश्चिन्तयेदेकमानसः॥ (स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ५१। २९-३०)

५९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करे, वह समस्त पापों और नरकके क्लेशोंका नाश करनेवाला है।

तदनन्तर अति उत्तम अगस्त्यतीर्थमें स्नान करे। वहाँसे अग्नितीर्थमें जाकर स्नान, तर्पण और विधिपूर्वक श्राद्ध करे। चक्र आदि तीर्थ सब पातकोंका अपहरण करनेवाले हैं। वे क्रमशः यहाँ बताये गये हैं। उसी क्रमसे अथवा अपनी रुचिके अनुसार उन सब तीर्थोंमें नहाकर श्राद्ध आदि करे। तत्पश्चात् रामेश्वरमें पहुँचकर परमेश्वर भगवान् शिवकी सेवा करे। फिर सेतुमाधवमें आकर क्रमशः राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान् तथा अन्य कपिवरोंके तीर्थोंमें वहाँ जाकर नियमपूर्वक स्नान करे। फिर भगवान् रामेश्वर तथा श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार करके धनुष्कोटिमें नहानेके लिये जाय। वहाँ स्नान करके अपनी शक्तिके अनुसार धन-दान करे। उसके बाद कोटितीर्थमें आकर नियमपूर्वक स्नान करे और रामेश्वर नामक भगवान् शिवको प्रणाम करके अपने पास धन हो तो ब्राह्मणोंको सुवर्ण-दान करे। तिल, धान्य, गौ, क्षेत्र, वस्त्र, चावल आदि दान करे। धूप, दीप, नैवेद्य एवं पूजाके अन्य उपकरण भगवान् रामेश्वरको अर्पण करे। फिर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके आज्ञा ले सेतुमाधवके समीप जाय। उन्हें भी धूप, दीप आदि भेंट करके उनकी आज्ञा ले पूर्वोक्त नियमोंका पालन करते हुए अपने घर लौटे। घर आनेपर षड्रस भोजनके द्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करे। इससे भगवान् रामेश्वर प्रसन्न होकर उसे मनोवांछित वस्तु देते हैं। उसके लिये नरकका भय नहीं रहता और उसकी दरिद्रताका नाश हो जाता है। उस पुरुषकी सन्तति बढ़ती है और शीघ्र ही संसारबन्धनका नाश करके वह सायुज्य मोक्षको प्राप्त होता है। जो यहाँकी यात्रा करनेमें असमर्थ हो, वह श्रुति-स्मृति तथा आगम ग्रन्थोंमें जो सेतुमाहात्म्यसूचक परम पुण्यमय ग्रन्थ हो, उसका पाठ करावे अथवा स्वयं भक्तिपूर्वक उसका पाठ करे। ऐसा करनेसे वह सेतुस्नानके पुण्य-फलको निःसन्देह प्राप्त कर लेता है। मनीषी पुरुषोंने यह सुविधा अन्धे और पंगु मनुष्योंके लिये ही बतायी है। विप्रवरो! इस प्रकार यहाँ सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम बतलाया गया। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।

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सेतुतीर्थका माहात्म्य तथा इस खण्डका उपसंहार

श्रीसूतजी कहते हैं— मुनिवरो! सेतुतीर्थमें किया हुआ जप, होम, तप और दान सब अक्षय कहा जाता है। धनुष्कोटिमें स्नान करके भक्तिपूर्वक श्रीरामेश्वर शिवका दर्शन करते हुए मनुष्य तीन दिन यहाँ निवास करे। यहाँ आदि षडक्षर (ॐ नमः शिवाय) इस मन्त्रका भक्तिपूर्वक एक हजार आठ बार जप करके मनुष्य भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। इस सेतुतीर्थकी महिमाका वर्णन करनेके उद्देश्यसे 'द्वौ समुद्रौ०' इत्यादि श्रुति सनातन कालसे विद्यमान है, जो माताके समान आदरणीय है। इसी प्रकार 'अदो यद्दारु०' यह दूसरी श्रुति भी उसी विषयमें है। 'विष्णोः कर्माणि पश्यत्०' यह श्रुति भी सेतुतीर्थके वैभवका वर्णन करनेवाली है। 'तद्विष्णोः०' यह दूसरी श्रुति भी सेतुका माहात्म्य सूचित करती है। इन वैदिक श्रुतियोंके अतिरिक्त इतिहास, पुराण और स्मृतियाँ भी एक स्वरसे सेतुतीर्थकी महिमाका वर्णन करती हैं। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर सेतुतीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य तत्काल कोटि जन्मोंके पापका नाश कर

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९७

देता है। विषुवयोग, उत्तरायण या दक्षिणायनके प्रारम्भ दिन, संक्रान्तिकाल, सोमवार तथा अमावास्या एवं पूर्णिमा तिथि—इन सभी अवसरोंपर सेतुतीर्थका दर्शन करनेमात्रसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। सूर्यनारायणके मकर राशिमें स्थित होनेपर सूर्योदयकालमें तीन दिनतक धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे मनुष्य पापहीन हो जाता है। जो मनुष्य माघ मासमें पंद्रह दिनोंतक धनुष्कोटिमें स्नान करता है, वह वैकुण्ठधामको पाता है। माघ मासमें रामसेतुतीर्थमें बीस दिनोंतक स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् शिवका सामीप्य प्राप्त करता और उन्हींके साथ आनन्दित होता है तथा तीस दिनोंतक वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। अतः माघ मासमें जब सूर्यका किंचिन्मात्र उदय हुआ हो, उस समय मनुष्य रामसेतुमें अवश्य स्नान करे। वह स्नान ब्रह्महत्यादि पातकोंका नाशक है। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा अर्धोदय योगमें धनुष्कोटि तीर्थमें स्नान करना अत्यन्त आवश्यक है। पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने रावणका विनाश करनेके लिये इस तीर्थमें स्नान किया था और उक्त योगोंमें स्नानका नियम बताया था। उस समय सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर, नाग, ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि, पितृसमुदाय तथा ब्रह्मा आदि देवसमुदाय भी धनुष्कोटि तीर्थका सेवन करते हैं। जो मनुष्य पुण्यमय रामसेतुका स्मरण करके जहाँ कहीं भी पोखरे आदिके जलमें स्नान करता है, उसका किंचिन्मात्र भी पाप कभी शेष नहीं रहता। सेतुके मध्यमें विद्यमान तीर्थोंमें मुट्ठीभर अन्न देनेसे भी सब रोग और भ्रूणहत्या आदि पाप नष्ट हो जाते हैं। धनुष्कोटिके दर्शनमात्रसे मनुष्य अपने समस्त कुलको तार देता है। श्रीरामचन्द्रजीके धनुषकी कोटिसे की हुई रेखामें स्नान करनेसे करोड़ों पातकोंका तत्काल नाश हो जाता है। जहाँ सीताजी अग्निमें समायी थीं, उस कुण्डमें स्नान करनेसे सैकड़ों भ्रूणहत्याएँ क्षणभरमें नष्ट हो जाती हैं। जैसे श्रीरामचन्द्रजी हैं, वैसा ही सेतुतीर्थ है। जैसे विष्णुभगवान् हैं, वैसे ही गंगा भी है। अतः 'हे गंगे! हे हरे! हे रामसेतुतीर्थ!' ऐसा उच्चारण करता हुआ जहाँ कहीं तीर्थके बाहर भी स्नान करता है, उससे वह परम गतिको प्राप्त होता है। गन्धमादन पर्वतपर सेतुमें अर्धोदय योगकी बेलामें स्नान करके जो पितरोंके उद्देश्यसे सरसोंभर भी पिण्डदान देता है, उसके पितर जबतक सूर्य और चन्द्रमा स्थिर रहते हैं, तबतक तृप्त रहते हैं। सेतु, पद्मनाभ, गोकर्ण और पुरुषोत्तम—इन तीर्थोंमें समुद्रके जलमें किया जानेवाला स्नान सभी समयोंमें अभीष्ट है। शुक्र, मंगल, शनैश्चरके दिन सन्तानकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सेतुतीर्थके सिवा और कहीं क्षारसमुद्रमें स्नान न करे। जिसकी पत्नी गर्भिणी हो, वह भी सेतुके सिवा अन्य स्थानोंमें समुद्रमें स्नान न करे। सेतुका स्नान सदैव उत्तम है। दिन, तिथि और नक्षत्रके नियम सेतुसे भिन्न तीर्थोंके लिये ही हैं। सेतुमें, नदी और समुद्रके संगममें, गंगा-सागर-संगममें, गोकर्ण क्षेत्रमें और पुरुषोत्तमतीर्थमें भी सदैव समुद्र-स्नानका विधान है। इन तीर्थोंके अतिरिक्त और कहीं बिना पर्वके समुद्रके जलका स्पर्श नहीं करे। सीता और लक्ष्मणके साथ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने यहाँ सब देवताओं, पितरों और मुनियोंके सुनते हुए यह प्रतिज्ञा की थी—'जो मनुष्य यहाँ मेरे द्वारा निर्मित सेतुमें स्नान करेंगे, वे यहाँ मेरे प्रसादसे फिर जन्म नहीं ग्रहण करेंगे। मेरे सेतुके दर्शनमात्रसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।' रामसेतुमें रक्षाके लिये भगवान् महाविष्णु सेतुमाधव नामसे प्रसिद्ध होकर निवास करते हैं। माघके महीनेमें जब सूर्यनारायण श्रवण नक्षत्रमें स्थित हों, तब रविवारके दिन सूर्यके अर्धोदय कालमें यदि नाग-करण रहित

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अमावास्या हो, साथ ही व्यतीपात योग भी हो, तो उस समय वह अर्धोदययोग पुण्यदायक माना गया है। उस योगमें सेतुतीर्थमें किया हुआ स्नान सायुज्य मुक्तिका कारण है। पूर्वोक्त योगोंमेंसे यदि एक-एक भी मिल जाय तो वह स्नान, दान, जप और पूजनसे मोक्षदायक होता है। फिर तिथि, वार, नक्षत्र, योग और संक्रान्ति—ये पाँचों मिल जायँ तब तो पुण्यके विषयमें कहना ही क्या है? नक्षत्रोंमें श्रवण, तिथियोंमें अमावास्या, योगोंमें व्यतीपात और दिनोंमें रविवार यहाँके लिये श्रेष्ठ हैं। मकरराशिमें सूर्यके स्थित होनेपर यदि पूर्वोक्त चारोंका योग हो तो उस समय जो मनुष्य सेतुतीर्थमें स्नान करता है, वह मानव फिर कभी माताके गर्भमें नहीं जाता, अपितु सायुज्य मोक्षको पा लेता है। इस प्रकार उक्त महोदयकारक काल पुण्यकाल बताया गया है। इन पुण्य समयोंमें सेतुतीर्थके भीतर दानका विधान है।

जिस ब्राह्मणमें सदाचार, तप, वेद, वेदान्त-श्रवण, शिव-विष्णु आदिकी पूजा तथा पुराणार्थ-प्रवचनकी शक्ति हो, वह दानका उत्तम पात्र बताया गया है। यदि सेतुतीर्थमें सुपात्र ब्राह्मण मिल जाय तो उसीको दान देना चाहिये। फलको चाहनेवाले पुरुषोंके लिये उचित है कि वे अधम पात्रके लिये दान न दें।

एक समय राजा दिलीप ने श्रीवसिष्ठजीसे पूछा—पुरोहितजी! दान किसको देने चाहिये? यह यथार्थ रूपसे बतलाइये।

वसिष्ठजी बोले—वैदिक आचारके पालनमें लगा हुआ ब्राह्मण समस्त दानपात्रोंमें सर्वोत्तम है। वेद-पुराणोंके मन्त्र, शिव-विष्णु आदिका पूजन, वर्णाश्रमधर्मोंका अनुष्ठान—ये सब जिसमें सदा विद्यमान हों तथा जो दरिद्र और कुटुम्बी हो, वह दानका श्रेष्ठ पात्र कहलाता है। उस सत्पात्रको दिया हुआ दान धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधक होता है। पुण्यतीर्थोंमें विशेषतः सत्पात्रको दिया हुआ दान हितकारक होता है। दुष्ट पात्रको दान देनेसे नाना प्रकारके दोष प्राप्त होते हैं, अतः सब प्रकारके यत्न करके सत्पात्रको दान देना चाहिये। सत्पात्र तीर्थमें उपस्थित न हो तो किसी भी सत्पात्रको देनेका संकल्प करके तीर्थमें जल छोड़ देना चाहिये। यदि वह सत्पात्र जीवित न हो तो संकल्पित वस्तु उसके पुत्रको देनी चाहिये, परंतु तीर्थमें अधम पात्रको दान कदापि नहीं देना चाहिये।

श्रीसूतजी कहते हैं—वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर राजा दिलीप ने तबसे सदा सत्पात्रको ही उत्तम दान दिया। अयोध्या, दण्डकारण्य, विरूपाक्ष, वेंकटाचल, शालग्राम, प्रयाग, कांची, द्वारका, मदुरा, पद्मनाभ, काशी विश्वनाथपुरी, सब नदियाँ, समुद्र तथा भास्कर पर्वत—इन क्षेत्रोंमें मुण्डन और उपवास आवश्यक बताया गया है। जो मनुष्य मुण्डन और उपवास न करके अपने घरको चला जाता है, उसके साथ ही उसके पातक भी उसके घर लौट जाते हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो चौबीस तीर्थ हैं, उनमेंसे लक्ष्मणतीर्थमें मुनियोंने मुण्डन करानेका आदेश दिया है। लक्ष्मणतीर्थके तटपर केवल सिरके बाल बनवाने चाहिये। इस प्रकार सेतुमें सदा अर्धोदय योगमें स्नान करना चाहिये। सेतुमें अर्धोदयके समय अर्धोदय नामसे प्रसिद्ध निर्मल भगवान् जगन्नाथका पूजन करे। उससे श्रीविष्णु प्रसन्न होते हैं।

तत्पश्चात् निम्नांकित मन्त्र पढ़कर सूर्य और चन्द्रमाको अर्घ्य दे—

दिवाकर नमस्तेऽस्तु तेजोराशे जगत्पते।
अत्रिगोत्रसमुत्पन्न लक्ष्मीदेव्याः सहोदर॥
अर्घ्यं गृहाण भगवन् सुधाकुम्भ नमोऽस्तु ते।

'सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी तेजोराशि दिवाकर! आपको नमस्कार है। लक्ष्मीदेवीके सहोदर सुधा-कलशरूप भगवन् चन्द्रदेव! आप अत्रिगोत्रमें

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९९

उत्पन्न हुए हैं, आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य स्वीकार करें।'

व्यतीपात योगके लिये अर्घ्यदानका मन्त्र

व्यतीपात महायोगिन् महापातकनाशन ।
सहस्रबाहो सर्वात्मन् गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥

'महापातकोंका नाश करनेवाली महायोगी व्यतीपात! सहस्रबाहो! सर्वात्मन्! आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण करें।'

तिथि, वार, नक्षत्रके स्वामीको अर्घ्यदान-मन्त्र

तिथिनक्षत्रवाराणामधीश परमेश्वर ।
मासरूप गृहाणार्घ्यं कालरूप नमोऽस्तु ते ॥

'तिथि, नक्षत्र और दिनोंके अधीश्वर! मासरूप और कालरूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।'

इस प्रकार पृथक्-पृथक् मन्त्रोंसे अर्धोदय कालमें अर्घ्य देकर चौदह, बारह, आठ, सात, छः अथवा पाँच ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार अन्न-पान आदिसे पूजित करे। तत्पश्चात् भगवान् जगन्नाथ, चन्द्रमा, सूर्य, व्यतीपात एवं भगवान् विष्णुकी इस प्रकार प्रार्थना करे—'जगन्नाथ! केशव! श्रवण नक्षत्र, वामनावतारके समय आपके जन्म-समय जन्मनक्षत्र रहा है, इसमें मैंने याचकोंको जो कुछ दिया है, वह आपके लिये अक्षय हो। देवताओंको अमृत प्रदान करनेवाले रोहिणीवल्लभ कलाशेष नक्षत्राधिपते! आपको नमस्कार है। दीनानाथ! जगन्नाथ! कालनाथ! कृपानिधान! सूर्यदेव! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो। चन्द्रमा और सूर्यके पुत्र व्यतीपात! आपको नमस्कार है। आपकी उपस्थितिमें मैंने जो दान आदि कर्म किया है, वह अक्षय हो। भगवान् वासुदेव! जनार्दन! आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। मास, ऋतु, अयन और काल, सबके स्वामी हैं। हरे! मेरे पापोंको शान्त कीजिये।'

इस प्रकार पूजन और प्रार्थना करके श्राद्ध आरम्भ करे। अपनी रुचिके अनुसार हिरण्यश्राद्ध^१, आमश्राद्ध^२, अथवा पाक श्राद्ध^३ करे। उसके बाद पार्वणश्राद्ध भी करे। स्नानकालमें 'सेतु' 'सेतु' इस नामका उच्चस्वरसे उच्चारण करनेपर मनुष्योंके करोड़ों पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं और वे भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होते हैं। रामसेतु, धनुष्कोटि, राम, सीता और लक्ष्मण, रामेश्वर, हनुमान्, सुग्रीव आदि वानर, विभीषण, नारद, विश्वामित्र, अगस्त्य, वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि तथा कश्यप—इन सबका स्नानकालमें चिन्तन करनेवाला रामभक्त या अन्य पुरुष सब दुःखोंसे छूट जाता और परमपदको प्राप्त होता है। सत्यक्षेत्र, हरिक्षेत्र, कृष्णक्षेत्र, नैमिषक्षेत्र, शालग्रामतीर्थ, बदरिकाश्रम, हस्तिशैल (कालहस्ती), वृषाचल, शेषाद्रि, चित्रकूट, लक्ष्मीक्षेत्र, कुरंगक्षेत्र, कांची, कुम्भकोण, मोहिनीपुर, इन्द्राचल, श्वेताचल, पुण्यमय महास्थल पद्मनाभ, फुल्लग्राम, घटिकाद्रि, सारक्षेत्र, हरिस्थल, श्रीनिवासक्षेत्र, भक्तनाथ-महास्थल, अलिन्द नामक महाक्षेत्र, शुकक्षेत्र, वारुणक्षेत्र, मथुरा, श्रीगोष्ठी, पुरुषोत्तम, श्रीरंगक्षेत्र पुण्डरीकाक्ष तथा अन्य वैष्णवस्थलोंमें स्नान करनेसे जो पाप नष्ट होते हैं, वे सब केवल सेतुतीर्थमें स्नान करनेसे निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।

जो प्रातःकाल जलाशयमें जाकर स्नान और आचमन करके शुद्धचित्त हो प्रसन्न मनसे सन्ध्योपासनपूर्वक वेदमाता गायत्रीकी उपासना नहीं करता अथवा जो पापसे दूषित अन्तःकरणवाले मनुष्य आलस्य छोड़कर सायं, प्रातः एवं मध्याह्न-


१- श्राद्धमें प्रत्येक अवसरपर जो अन्न आदि सामग्री अपेक्षित होती है, उसकी पूर्ति तथा श्राद्ध-प्रतिष्ठाके लिये निष्क्रयरूपसे सुवर्ण दक्षिणामात्र दे देना हिरण्यश्राद्ध है।
२- कच्चा अन्न संकल्प करके श्राद्धमें दिया जाय तो वह आमश्राद्ध है।
३- जिसमें पाक बनाकर उसका पिण्ड दिया जाय और ब्राह्मणोंको पक्वान्न भोजन कराया जाय, वह पाक श्राद्ध कहलाता है।

६००
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कालकी सन्ध्या नहीं करते, ब्रह्मयज्ञ, बलिवैश्वदेव और दोपहरके समय अतिथिपूजासे मुँह मोड़ते हैं, इसी प्रकार जो सायंकालमें भी अतिथियोंका उनकी इच्छाके अनुरूप सत्कार नहीं करते, उन सबके उन-उन कर्मोंके त्यागसे होनेवाले समस्त पाप धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य मध्याह्नकालमें संन्यासियोंको भिक्षा नहीं देते, जो कुत्सित बुद्धिवाले विप्र अपने पढ़े हुए तीनों वेदोंको भूल जाते अथवा वेद और वेदांगोंका अध्ययन नहीं करते, प्रत्येक वर्षमें माता-पिताका श्राद्ध नहीं करते तथा जो लोभवश महालयश्राद्ध, नित्यश्राद्ध, अष्टकाश्राद्ध और अन्य नैमित्तिक श्राद्धोंसे जी चुराते हैं, उनके भी पातक धनुष्कोटिमें नहानेसे दूर हो जाते हैं। कोई दुराचारी रहा हो अथवा उत्तम आचरणवाला हो, यदि वह धनुष्कोटि तीर्थका सेवन करता है, तो उसके संसारबन्धनका नाश और पुनर्जन्मका अभाव हो जाता है। जो संसारसमुद्रसे पार होना चाहता हो, उसे शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटिमें जाना चाहिये। मुनीश्वरो! तुम भी मुक्तिकी सिद्धिके लिये श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें जाओ।

विप्रवरो! इस प्रकार तुमसे मैंने सेतुतीर्थके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह अग्निष्टोम आदि यज्ञोंका पूर्ण फल पाता है। जो इसका दो बार पाठ या श्रवण करता है, वह श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो भगवान् शिवके समीप जाता है। जो तीन बार एकाग्रचित्तसे इसका पाठ या श्रवण करता है, वह शिवजीको प्रसन्न करके उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। जो बार-बार इस उत्तम माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह गिरिजापति महादेवजीका सायुज्य प्राप्त करता है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस माहात्म्यका एक श्लोक, आधा श्लोक, एक चरण, एक पद—अथवा एक अक्षर भी पढ़ता है, उसका उस दिनका किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। सेतुके मध्यमें विद्यमान अन्य तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल होता है, वह इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे प्राप्त हो जाता है। जिसके घरमें यह माहात्म्य हस्तलिखित पुस्तकके रूपमें विद्यमान है, वहाँ भूत, वेतालादिसे भय नहीं प्राप्त होता। शनैश्चर, मंगल आदि क्रूर ग्रहोंकी पीड़ा भी नहीं रहती। यह पवित्र एवं उत्तम माहात्म्य जिसके घरमें विद्यमान हो, उसके घरको रामसेतु तीर्थ जानना चाहिये। इस पुण्यदायक माहात्म्यको मठ अथवा देवालयमें पढ़ना चाहिये। नदी और सरोवरके किनारे अथवा पवित्र वनभूमि या श्रोत्रियोंके घरपर इसका पाठ करना चाहिये। विषुवयोगमें, अयनारम्भके दिन, पुण्यमय एकादशी तिथिको तथा अष्टमी और चतुर्दशीको इस माहात्म्यका विशेषरूपसे पाठ करना चाहिये। मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ही इस माहात्म्यको पढ़े तथा श्रोता भी शौच-सन्तोषादि नियमोंसे युक्त होकर ही इस उत्तम प्रसंगको सुने। यह पवित्र माहात्म्य वेदार्थोंके समावेशसे विस्तारको प्राप्त हुआ है। यह सब पापोंका नाश करनेवाला है। स्मृतिकारोंको यह मान्य है और मुनिवर व्यासजीको भी अत्यन्त प्रिय है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको इसका श्रवण और पाठ करना चाहिये। सुनानेवाले आचार्यको भी अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार जो कुछ बन सके, सुवर्ण आदि देना चाहिये; क्योंकि कथावाचकके पूजित होनेपर ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवता पूजित होते हैं और उनके पूजित होनेपर तीनों लोक पूजित हो जाते हैं। दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें भूतलपर अवतीर्ण हुए साक्षात् श्रीहरि

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ६०१


सीता और लक्ष्मणके साथ कृपा करके इस महावाक्यके वक्ता और श्रोताओंको इहलोकमें भोग और परलोकमें मुक्ति प्रदान करते हैं।

नैमिषारण्यवासियो! तुमलोगोंने मुझसे इस वेदसम्मत गूढ़ माहात्म्यका भलीभाँति श्रवण किया। अब प्रतिदिन नियमपूर्वक रहकर आदरके साथ इस माहात्म्यको पढ़ो और अपने नियमपरायण शिष्योंको निरन्तर पढ़ाओ। ऐसा कहकर सूतजी रोमांचित शरीर होकर अपने गुरु श्रीव्यासजीका मन-ही-मन स्मरण करते हुए आँसू बहाने और नृत्य करने लगे। इसी बीचमें महाविद्वान् पराशरनन्दन महामुनि व्यास शिष्यपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वहाँ शीघ्र प्रकट हो गये। सत्यवतीनन्दन व्यासजीको वहाँ आया हुआ देख सूतजीने नैमिषारण्यवासी समस्त मुनियोंके साथ उनके चरणारविन्दोंमें दण्डकी भाँति गिरकर साष्टांग प्रणाम किया और आनन्दके आँसू बहाने लगे। चरणोंमें पड़े हुए अपने प्यारे शिष्यको व्यासजीने दोनों हाथोंसे उठाया तथा आशीर्वादसे प्रसन्न करते हुए बारंबार हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् मुनियोंके लाये हुए उत्तम आसनपर महातेजस्वी व्यासजी बैठे। उस समय उन्होंने शौनकादि मुनियोंसे कहा—'मुनिवरो! मैंने इस समय यह जान लिया था कि मेरे शिष्य सूतने तुमसे सेतुतीर्थका उत्तम माहात्म्य कहा है, जो बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। यह माहात्म्य बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। सब पुराणोंमें यही मुझे अधिक प्रिय है। धर्मराज युधिष्ठिर मेरी आज्ञा मानकर अपने पुरोहित धौम्यसे प्रतिदिन यह माहात्म्य सुनते हैं। अतः तुम भी इस उत्तम सेतु-माहात्म्यको सदा पढ़ो, सुनो और अपने शिष्योंको पढ़ाओ।' व्यासजीका यह वचन सुनकर मुनियोंने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। तदनन्तर व्यासजी भी अपने शिष्य सूतजीको साथ ले मुनियोंसे पूछकर कैलास पर्वतको चले गये।

सेतु-माहात्म्य सम्पूर्ण।

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१२. ब्राह्मखण्ड (धर्मारण्यखण्ड)

६०२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

धर्मारण्य-माहात्म्य

~~ ० ~~

धर्मकी तपस्यासे धर्मारण्यक्षेत्रकी प्रसिद्धि और उसका माहात्म्य

तर्तुं संसृतिवारिधिं त्रिजगतां नौर्नाम यस्य प्रभो-
 र्यैनेदं सकलं विभाति सततं जातं स्थितं संसृतम्।
यश्चैतन्यघनप्रमाणविधुरो वेदान्तवेद्यो विभु-
 स्तं वन्दे सहजप्रकाशममलं श्रीरामचन्द्रं परम्॥
दाराः पुत्रा धनं वा परिजनसहितो बन्धुवर्गः प्रियो वा
माता भ्राता पिता वा श्वशुरकुलजना भृत्य ऐश्वर्यवित्ते।
विद्या रूपं विमलभवनं यौवनं यौवतं वा
 सर्वं व्यर्थं मरणसमये धर्म एकः सहायः॥

'जिन भगवान्‌का नाम तीनों लोकोंमें संसार-समुद्रसे पार होनेके लिये नौकारूप है, जिनसे उत्पन्न और पालित होकर यह सम्पूर्ण संसार सदैव शोभा पाता है, जो चैतन्यघनस्वरूप एवं प्रमाणसे परे हैं, वेदान्तशास्त्रके द्वारा जाननेके योग्य और सर्वत्र व्यापक हैं, उन सहज प्रकाशरूप निर्मल परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ। स्त्री, पुत्र, धन, परिजन, भाई, बन्धु, प्रिय, सुहृद्, माता, पिता, भ्राता, श्वशुर-कुलके लोग, भृत्यवर्ग, ऐश्वर्य, धन, विद्या, रूप, उज्ज्वल भवन, जवानी और युवतियोंका समुदाय—ये सभी मृत्युकालमें व्यर्थ सिद्ध होते हैं। उस समय एकमात्र धर्म ही सहायक होता है।'

एक समय सूतजीको आते हुए देख नैमिषारण्यवासी शौनक आदि महर्षियोंने बड़े हर्षसे जाकर उन्हें सब ओरसे घेर लिया। फिर जब वे सभी तपस्वी महात्मा बैठ गये, तब उनके बताये हुए आसनपर लोमहर्षणकुमार सूतजी भी विनयपूर्वक विराजमान हुए। तब उन ऋषियोंने सूतजीसे कहा—'मुने! आप पापोंका नाश करनेवाली कोई पुण्यमयी कथा कहिये।'

सूतजी बोले—मैं श्रीसरस्वतीजी, गणेशजीके तथा सम्पूर्ण देवताओंके युगल चरणारविन्दोंको नमस्कार करके और सबके नियन्ता धर्मस्वरूप परमेश्वरके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन सबके प्रसादसे तीर्थोंके उत्तम फलका वर्णन करता हूँ। एक समयकी बात है, सत्यवतीनन्दन व्यासजी राजा युधिष्ठिरके दरबारमें आये। उनके आनेका समाचार सुनकर सबको बड़ा हर्ष हुआ। भीमसेन आदि सब भाई धर्मराज युधिष्ठिरके साथ उठकर खड़े हो गये। तदनन्तर युधिष्ठिरने सामने जाकर भाइयोंसहित उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके उन्हें सिंहासनपर बिठाकर उनका कुशल-मंगल पूछा। तब धर्मज्ञ व्यासजीने उनसे पवित्र एवं दिव्य कथा सुनायी। कथाके अन्तमें राजा युधिष्ठिरने मुनिश्रेष्ठ व्याससे इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्! आपके प्रसादसे मैंने बहुत-सी उत्तम कथाएँ सुनी हैं। इस समय मैं धर्मारण्यके उत्तम माहात्म्यकी कथा सुनना चाहता हूँ।'

व्यासजीने कहा—नृपश्रेष्ठ! धर्मारण्य अनेक प्रकारके वृक्षोंसे युक्त तथा भाँति-भाँतिकी लताओं और गुल्मोंसे सुशोभित है। वह सदैव पुण्यदायक है तथा निरन्तर फलोंसे भरा रहता है। वहाँ किसीका किसीसे भी वैर नहीं होता। धर्मारण्य सर्वथा निर्भय स्थान है। वहाँ गौ और व्याघ्र, चूहे और बिलाव साथ-साथ क्रीडा करते हैं। मेढक साँपके साथ खेलता है, मनुष्य राक्षसोंके साथ विहार करते हैं। धर्मारण्य महानन्दमय, दिव्य एवं पावनसे भी पावन है। स्वर्गमें देवतालोग धर्मारण्यनिवासियोंकी प्रशंसा करते हैं।

युधिष्ठिरने पूछा—मुने! देवताओंने उस क्षेत्रका नाम धर्मारण्य कब रखा?

व्यासजी बोले—नृपश्रेष्ठ! एक समय धर्मराजने बड़ी कठिन तपस्या की। तपस्यामें लगे हुए

  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०३

धर्मराजको देखकर ब्रह्मा और इन्द्र आदि सब देवता कैलास पर्वतपर गये। वहाँ भगवान् शंकर भगवती उमादेवीके साथ पारिजात वृक्षकी छायामें बैठे थे। उनके पास पहुँचकर ब्रह्माजीने इस प्रकार स्तवन किया—'नीलकण्ठ ! आपके अनन्तरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आपके इस स्वरूपका यथावत् ज्ञान किसीको नहीं है, आप कैवल्य एवं अमृतस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। देवता जिसका अन्त नहीं जानते, उन भगवान् शिवको नमस्कार है, नमस्कार है। वाणी जिनकी प्रशंसा (गुणगान) करनेमें असमर्थ है, उन चिदात्मा शिवको नमस्कार है। योगी समाधिमें निश्चल होकर अपने हृदयकमलके कोषमें जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, उन श्रीब्रह्मको नमस्कार है। जो कालसे परे, कालस्वरूप, स्वेच्छासे पुरुषरूप धारण करनेवाले, त्रिगुणस्वरूप तथा प्रकृतिरूप हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है। प्रभो ! आप भक्तजनोंपर कृपा करके स्वेच्छासे सगुण रूप धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। भगवन् ! आपके मनसे चन्द्रमा और नेत्रोंसे सूर्यकी उत्पत्ति हुई है। देव ! आप ही सब कुछ हैं, आपमें ही सबकी स्थिति है। इस लोकमें सब प्रकारकी स्तुतियोंके द्वारा स्तवन करने योग्य आप ही हैं। ईश्वर ! आपके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्वप्रपंच व्याप्त है, आपको पुनः-पुनः नमस्कार है।

इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके ब्रह्मा आदि देवता उनके आगे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। तब भगवान् शंकरने उनसे कहा—'देवताओ ! तुम क्या चाहते हो?'

**ब्रह्माजीने कहा—**सबके दुःखोंका नाश करनेवाले महादेव ! धर्मात्मा धर्मराजने बड़ी दुःसह तपस्या की है। न जाने वे देवताओंका कौन-सा उत्तम स्थान लेना चाहते हैं, यही सोचकर इन्द्र आदि सब देवता उनकी तपस्यासे थर्रा उठे हैं। देवेश ! आप उन्हें तपस्यासे उठाइये।

**महादेवजी बोले—**देवताओ ! मैं सच कहता हूँ, तुम्हें धर्मराजसे कोई भय नहीं है।

यह सुनकर सब देवता उठे और भगवान् शिवकी परिक्रमा एवं बारंबार नमस्कार करके अपने-अपने स्थानको चले गये। परंतु इन्द्रको नींद नहीं आयी, उनकी सुख-शान्ति खो गयी। वे मन-ही-मन सोचने लगे, 'मेरे लिये यह बड़ा भारी विघ्न उपस्थित हुआ। धर्मराजने मेरा इन्द्रपद हड़प लेनेके लिये ही यह अत्यन्त दुष्कर तप प्रारम्भ किया है।' ऐसा विचार करते हुए इन्द्रने देवताओंसे कहा—'मैंने बहुत क्लेश उठाकर जिसे प्राप्त किया है, उसीको धर्मराज क्या मुझसे छीन लेना चाहते हैं?' यह सुनकर बृहस्पतिजी बोले—'इनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये वहाँ उर्वशी आदि अप्सराओंको भेजा जाय।' तब इन्द्रने अप्सराओंसे कहा—'तुम सब लोग शीघ्र धर्मारण्यको जाओ और जहाँ धर्मराज दुष्कर तपस्यामें संलग्न हैं, वहाँ पहुँचकर उन्हें इस प्रकार लुभाओ, जिससे वे तपस्यासे भ्रष्ट हो जायें।' इन्द्रका यह वचन सुनकर वर्द्धिनी नामक अप्सराने कहा—'पाकशासन ! मैं देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये अपनी माया तथा रूपके बलसे पूरी चेष्टा करूँगी।' ऐसा कहकर वर्द्धिनी उस स्थानपर गयी, जहाँ धर्मराज तपस्या करते थे। वह अधिकाधिक वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित हो कपोलपर रोलीकी बेंदी और नयनोंमें काजर लगा मनोहर रूप बनाकर उनके सामने गयी और सबके मनको लुभानेवाला नृत्य करने लगी। उस समय धर्मराजका मन सहसा क्षुब्ध-सा हो उठा। राजन् ! भूतलमें नारीका योनिकुण्ड कुम्भीपाकके समान रचा गया है। वे रमणियाँ अपने नेत्ररूपी रज्जुसे दृढ़तापूर्वक बाँधकर मनस्वी पुरुषोंको नीचा दिखाती हैं। अज्ञानी पुरुषको अपने कुचरूपी महादण्डोंसे ताड़ित करके अचेत कर देतीं और शीघ्र ही उसे नरकमें गिरा देती हैं। तबतक ही मनकी स्थिरता, शास्त्रज्ञान तथा

६०४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सत्य आदि गुण सुरक्षित रहते हैं, जबतक कि सचेत पुरुषोंके आगे बिछाये हुए जालकी भाँति रूप-यौवनके मदसे मतवाली युवती नहीं आती है। तभीतक तपस्याकी वृद्धि होती है, तभीतक दान, दया और इन्द्रियसंयम सूझते हैं तथा तभीतक स्वाध्याय, सदाचार, पवित्रता, धैर्य और व्रतकी रक्षा होती है, जबतक कि मनुष्य भयभीत हरिणीकी भाँति चंचल लोचनोंवाली चपला तरुणीको नेत्रोंसे नहीं देखता है।

वर्द्धिनीने धर्मराजसे पूछा—प्रभो! समस्त चराचर जगत् धर्ममें ही स्थित है। वही साक्षात् धर्मरूप होकर आप यह दुष्कर तप क्यों कर रहे हैं?

यमराजने कहा—भामिनि! मैं भगवान् महेश्वरके स्वरूपका दर्शन करना चाहता हूँ। इसीलिये कठिन तपस्या कर रहा हूँ।

वर्द्धिनी बोली—धर्म! इस तपस्याके ही कारण इन्द्र आपसे भयभीत हो गये हैं। उन्हींसे प्रेरित होकर मैं यहाँ आपकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये आयी हूँ।

वर्द्धिनीके इस सत्य भाषणसे सूर्यनन्दन यम बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने वर्द्धिनीसे इस प्रकार कहा—'मैं समस्त पापकर्म दुष्टात्मा प्राणियोंके लिये यमराज हूँ और सभी जितेन्द्रिय मनुष्योंके लिये धर्मस्वरूप हूँ। वही मैं तुम्हें दुर्लभ वर देता हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'

वर्द्धिनी बोली—धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ! मुझे लोकोंके हितके लिये इन्द्रलोकमें स्थिरतापूर्वक निवास प्रदान कीजिये।

यमराजने कहा—'एवमस्तु'। अब तुम शीघ्रतापूर्वक कोई दूसरा वर और माँगो।

वर्द्धिनी बोली—महामते! इस महाक्षेत्रमें इसी स्थानपर मेरे नामसे एक प्रसिद्ध तीर्थ हो, जो सब पापोंका नाश करनेवाला हो। उसमें किया हुआ दान, होम, तप और स्वाध्याय अक्षय हो।

'तथास्तु' कहकर भगवान् धर्मराज चुप हो गये। तब वर्द्धिनीने उनकी तीन बार परिक्रमा करके मस्तक नवाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। वहाँ जाकर वह देवराज इन्द्रसे इस प्रकार बोली—'देवेश! आप सूर्यनन्दन यमसे भय न कीजिये। वे यशके लिये तपस्या कर रहे हैं।' इतना कहकर वह इन्द्रको प्रणाम करके अपने स्थानको चली गयी। तदनन्तर धर्मराज विधिपूर्वक तपस्यामें स्थित हो गये। उनकी घोर तपस्या देखकर देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शंकर वृषभपर आरूढ़ हो अस्त्र-शस्त्र एवं सुन्दर कवच धारण करके उस स्थानको गये, जहाँ धर्मराज तपस्यामें स्थित थे। वहाँ पहुँचकर महादेवजी बोले—'धर्म! तुम्हारी इस तपस्यासे मेरा चित्त बहुत सन्तुष्ट है। तुम कोई वर माँगो, वर माँगो, वर माँगो।'

इस प्रकार सम्भाषण करते हुए भगवान् महेश्वरको देखकर धर्मराज बाँबीसे उठकर खड़े हो गये और दोनों हाथ जोड़कर शुद्ध वचनोंद्वारा उन्होंने लोकनाथ शिवका इस प्रकार स्तवन किया—'भगवन्! आप सबपर शासन करनेवाले ईश्वर हैं, आपको नमस्कार है। योगरूपी आप परमेश्वरको

  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०५

नमस्कार है। नीलकण्ठ ! आपका स्वरूप तेजोमय है, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ध्यान करनेवाले मनुष्य आपके स्वरूपका जिस प्रकार चिन्तन करते हैं, उसके अनुरूप ही विग्रह धारण करके आप प्रकट होते हैं, आपको नमस्कार है। केवल भक्तिभावसे प्राप्त होनेवाले आप प्रभुको नमस्कार है। ब्रह्माजीके रूपमें आपको नमस्कार है। विष्णुरूपधारी प्रभो! आपको नमस्कार है। आप ही स्थूल और सूक्ष्म जगत् हैं, आपको नमस्कार है। अणुरूपधारी आपको नमस्कार है। कामरूपमें प्रकट हुए अथवा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप ही सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप नित्य, सौम्य, मृड (सुखस्वरूप) एवं श्रीहरि हैं, आपको बारंबार नमस्कार है, आप ही सब ओरसे तपानेवाले सूर्य तथा शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सृष्टिस्वरूप ! आपको नमस्कार है। लोकपाल ! आपको नमस्कार है। आप रुद्र, भीम एवं शान्तस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आपके रूप अनन्त हैं, आप सम्पूर्ण विश्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। चन्द्रशेखर ! आपके सब अंगोंमें भस्म लगा हुआ है, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आपके पाँच मुख एवं तीन नेत्र हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। सर्प आपके आभूषण हैं तथा आप दिशाओंको ही वस्त्रके रूपमें धारण करते हैं, आप अन्धकासुरका विनाश करनेवाले और दक्षके पापको हर लेनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। त्रिपुरारे ! आपने कामदेवको भस्म किया है, आपको नमस्कार है। मेरे द्वारा कहे हुए इन चालीस नामोंका जो पाठ करे और पवित्र होकर तीनों काल इसको पढ़े अथवा सुने, वह सब पापोंसे छूटकर कैलाशधामको जाय।'

इस प्रकार धर्मराजने प्रणाम करके जब बड़ी भक्तिसे भगवान् शिवका स्तवन किया, तब शिवजीने कहा—'महाभाग ! तुम्हारे मनमें जो कोई अभिलाषा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो।'

यमराजने कहा—देव! शंकर! यदि मुझे आप मनोवांछित वर देते हैं तो इस महाक्षेत्रमें आप मेरे नामसे प्रसिद्ध होकर निवास कीजिये। यह स्थान धर्मारण्यके नामसे तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि प्राप्त करे।

महादेवजी बोले—धर्मराज ! यह स्थान प्रत्येक युगमें सदा धर्मारण्यके नामसे विख्यात होगा। तुम्हारे मनमें और भी कोई इच्छा हो तो बताओ, उसे भी पूर्ण करूँगा।

धर्मराजने कहा—भगवन् ! दो योजन विस्तारवाला यह उत्तम स्थान मेरे नामसे प्रसिद्ध तीर्थ हो। यह समस्त देहधारियोंके लिये पावन एवं सनातन मोक्षस्थान हो।

महादेवजी बोले—'एवमस्तु' एक अंशसे इस तीर्थमें मेरी भी स्थिति होगी। तुम्हारे इस निर्मल स्थानको मैं कभी नहीं छोडूंगा। यहाँ मेरे नामसे विश्वेश्वर नामक महालिंग प्रकट होगा।

ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् वहाँ एक अद्भुत लिंग प्रकट हुआ। धर्मके द्वारा स्थापित किया हुआ वह लिंग धर्मेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका स्मरण और पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मराजने वहींपर एक धर्मवापीका निर्माण किया, जो बड़ी मनोरम है। उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य व्याधिदोषके नाश और क्लेशकी शान्तिके लिये उस धर्मवापीमें स्नान करके यमतर्पण करता है, उसको कोई उपद्रव नहीं होता। अँतरिया, तिजारी, चार दिनोंपर होनेवाला ज्वर, किसी नियत समयपर होनेवाला ज्वर तथा शीतज्वर आदि जितने भी रोग हैं, सभी उस मनुष्यको पीड़ा नहीं देते। जो मानव उस परम पुण्यमयी

६०६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

धर्मवापीमें स्नान करके शमीके पत्तेके बराबर भी पिण्डदान करता है, वह गर्भवासको नहीं प्राप्त होता है तथा महाभयंकर कुम्भीपाक, रौरव एवं अन्धतामिस्र आदि नरकसे भी छुटकारा पा जाता है। धर्मवापीमें तर्पण करनेसे बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, आज्यप और सोमप नामवाले पितर उत्तम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। जो मायासे मोहित होकर इस क्षेत्रमें अत्यन्त दूषित परस्त्रीगमन तथा सुवर्णकी चोरी आदि पाप करते हैं, वे सभी नरकमें पड़ते हैं। दूसरे क्षेत्रमें किया हुआ पाप धर्मारण्यमें नष्ट होता है; किंतु धर्मारण्यमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है। पुण्य, पाप या जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म होता है, वह सब सौ वर्षतक यहाँ नित्य बढ़ता रहता है। मनमें कामना रखनेवालोंके लिये यह पवित्र तीर्थ कामदायक है, योगियोंके लिये मुक्तिदायक है तथा सिद्धोंके लिये सदैव सिद्धिदायक बताया गया है।


सदाचार—शौच, स्नान, सन्ध्या, तर्पण, बलिवैश्वदेव आदिका महत्त्व

व्यासजी कहते हैं—धर्मारण्यमें शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुए अठारह हजार ब्राह्मण रहते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवजीके द्वारा उत्पन्न किये गये हैं। वे सभी सदाचारी, पवित्र तथा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। चार प्रकारके जीवोंमें प्राणधारी अति उत्तम हैं। प्राणधारियोंमें भी जो बुद्धिजीवी हैं, वे सभी श्रेष्ठ माने गये हैं। बुद्धिजीवी प्राणियोंमें भी मनुष्य श्रेष्ठ हैं। मनुष्योंसे भी ब्राह्मण, उनसे भी विद्वान्, विद्वानोंसे भी पवित्र बुद्धिवाले, उनसे भी कर्मठ, कर्मठोंसे भी ब्रह्मपरायण पुरुष सबसे श्रेष्ठ है। युधिष्ठिर ! ब्रह्मपरायण पुरुषोंसे श्रेष्ठ तीनों लोकोंमें कोई नहीं है। ब्रह्माजीने ब्राह्मणको सब प्राणियोंका स्वामी बनाया है। इसलिये संसारमें जो कुछ है, सबका योग्य अधिकारी ब्राह्मण ही है। सदाचारी ब्राह्मण ही सब कार्यों एवं अधिकारोंके योग्य होता है। जो आचारसे भ्रष्ट हो गया है, वह योग्य नहीं है। इसलिये ब्राह्मणको सदा आचारवान् होना चाहिये। राग और द्वेषसे रहित उत्तम बुद्धिवाले महापुरुष जिसका पालन करते हैं, उसीको विद्वानोंने धर्ममूलक सदाचार कहा है। जो अच्छे लक्षणोंसे हीन है, उस मनुष्यको भी चाहिये कि वह श्रद्धालु एवं अदोषदर्शी होकर भलीभाँति सदाचारका पालन करे; ऐसा करनेसे वह सौ वर्षोंतक (आयुभर) जीवित रह सकता है। अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें वेदों और स्मृतियोंद्वारा प्रतिपादित धर्ममूलक सदाचारका आलस्य छोड़कर सेवन करे। दुराचारी मनुष्य संसारमें निन्दनीय होता है। साथ ही वह अनेक प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हो अल्पायु तथा सदैव अतिशय दुःखका भागी होता है। जिस कर्मके करते समय अन्तरात्मामें सहज प्रसाद—निर्मलताका उदय होता है, उसी कर्मको करना चाहिये। इसके विपरीत कर्म कभी न करे। धर्मकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको यम-नियमोंके पालनके लिये ही विशेष यत्न करना चाहिये। सत्य, क्षमा, सरलता, ध्यान, क्रूरताका अभाव, हिंसाका सर्वथा त्याग, मन और इन्द्रियोंका संयम, सदा प्रसन्न रहना, मधुर बर्ताव करना और सबके प्रति कोमल भाव रखना—ये दस ‘यम’ कहे गये हैं। शौच, स्नान, तप, दान, मौन, यज्ञ, स्वाध्याय, व्रत, उपवास और उपस्थ-इन्द्रियका दमन—ये दस ‘नियम’ बताये गये हैं*। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और मात्सर्य—इन


* सत्यं क्षमाऽऽर्जवं ध्यानमानृशंस्यमहिंसनम्। दमः प्रसादो माधुर्यं मृदुतेति यमा दश॥
शौचं स्नानं तपो दानं मौनेज्याध्ययनं व्रतम्। उपोषणोपस्थदण्डौ दशैते नियमाः स्मृताः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। १९-२१)

* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०७


छः वैरियोँको जीतकर मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। दूसरोंको कष्ट न देते हुए परलोकमें सहायता देनेवाले धर्मका धीरे-धीरे संग्रह करे। यदि धर्मकी भलीभाँति रक्षा की जाय तो वही परलोकमें सहायक होता है। पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बन्धुजनोंसे भी बढ़कर मनुष्यका सहायक धर्म ही है। जीव अकेला ही जन्म लेता, अकेला मरता, अकेला पुण्य भोगता और अकेला ही पापका उपभोग करता है। मृत्यु हो जानेपर इस शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी भाँति त्यागकर भाई-बन्धु मुँह फेर लेते हैं। परलोकमें जाते हुए जीवके साथ केवल उसका धर्म ही जाता है*। अतः धर्मका संग्रह अवश्य करे। धर्म ही इस लोक और परलोकमें सहायक होता है। धर्मकी सहायता पाकर जीव नरकके दुस्तर अन्धकारसे पार हो जाता है। बुद्धिमान् पुरुष सदा उत्तम-उत्तम पुरुषोंके साथ सम्बन्ध जोड़े। अधम कोटिके मनुष्योंका संग छोड़कर अपने कुलको उन्नतिशील बनावे। सद्धर्मके पालनसे ब्राह्मण श्रेष्ठताको प्राप्त होता है। जो स्वाध्याय नहीं करता, सदाचारका उल्लंघन करता है, आलसी और दूषित अन्न खानेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको यमराज कष्ट देते हैं। अतः ब्राह्मण प्रयत्नपूर्वक सदाचारका पालन करे।

रात्रिके अन्तमें आधे पहरका समय ब्राह्ममुहूर्त कहलाता है। उस समय उठकर विद्वान् पुरुष सर्वदा अपने हितका चिन्तन करे। फिर गणेश, शिव, पार्वती, श्रीरंग (विष्णु), लक्ष्मी, ब्रह्मा, इन्द्रादि देवता, वसिष्ठ आदि मुनि, गंगा आदि नदी, श्रीशैल आदि पर्वत, क्षीरसागर आदि समुद्र, मानसरोवर आदि तड़ाग, कामधेनु आदि गौ तथा प्रह्लाद आदि भगवद्भक्त पुरुषोंका स्मरण करे। माताके चरण सब तीर्थोंसे भी अधिक उत्तम हैं, अतः उनका स्मरण करके पिता और गुरुका भी हृदयमें ध्यान करे। तत्पश्चात् आवश्यक कार्य (शौच आदि) करनेके लिये नैर्ऋत्य कोणकी ओर जाय। गाँवसे सौ धनुष दूर जाना चाहिये और नगरसे चार सौ धनुष। वहाँ तिनकेसे पृथ्वीको आच्छादित करके अपने मस्तकको भी कपड़ेसे अच्छी तरह ढक ले। यज्ञोपवीतको कानपर चढ़ाकर उत्तरकी ओर मुँह किये हुए मौनभावसे बैठकर मल-मूत्रका त्याग करे। उत्तराभिमुख बैठनेका नियम दिनमें और दोनों सन्ध्याओंके समय है। रात्रिमें शौच आदिके लिये दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके बैठना चाहिये। खड़े होकर मल-मूत्रका त्याग न करे। इस कार्यमें जल्दबाजी भी न करे। ब्राह्मण, गौ, अग्नि तथा आती हुई वायुकी ओर मुँह करके भी शौचके लिये न बैठे। फालसे जोती हुई भूमिमें, सड़कपर और उठने-बैठनेके योग्य भूमिमें मल-मूत्रका त्याग न करे। मलोत्सर्गके समय चारों दिशाओंकी ओर न देखे। ग्रह और नक्षत्रोंकी ओर दृष्टि न डाले। ऊपर आकाशकी ओर न ताके। मलकी ओर भी दृष्टिपात न करे। मलत्यागके पश्चात् मनुष्य कंकड़ आदिसे रहित चिकनी मिट्टी ले। वह मिट्टी चूहोंकी खोदी हुई या शौचसे बची हुई या केश आदिसे मिली हुई नहीं होनी चाहिये। बायें हाथसे गुदामें एक बार मिट्टी लगाकर उसे जलसे धो डाले। इसी प्रकार पाँच बार मिट्टी लगाकर गुदाको धोये। एक-एक बार दोनों पैरोंमें मिट्टी लगाकर धोये और दोनों हाथोंको तीन-तीन बार मृत्तिकालेपनपूर्वक धोये। गृहस्थ पुरुष इसी प्रकार शौचकी शुद्धि करे।


* जायते चैकलः प्राणी म्रियते च तथैकलः। एकलः सुकृतं भुङ्क्ते भुङ्क्ते दुष्कृतमेकलः॥
देहे पञ्चत्वमापन्ने त्यक्त्वैकं काष्ठलोष्टवत्। बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मो यान्तमनुव्रजेत्॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। २४-२६)

६०८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जबतक मलका लेप और दुर्गन्ध मिट न जाय,तदनन्तर धर्मशास्त्रोंमें बताये हुए नियमोंके अनुसार
तबतक उसे धोना ही चाहिये। ब्रह्मचर्य आदिदन्तधावन करे; क्योंकि आचमन करनेवाला
तीन आश्रमोंमें क्रमशः दुगुने शौचका विधान है।मनुष्य भी यदि दन्तधावन न करे तो वह
दिनमें जो शौचका विधान है, उससे आधा रात्रिमेंअपवित्र ही माना गया है। प्रतिपदा, अमावास्या,
करना चाहिये। पराये गाँवमें उससे आधा औरषष्ठी, नवमी तथा रविवारको काठकी दाँतन
मार्गमें उससे भी आधे शौचका विधान है।न करे। जिस दिन दाँतन निषिद्ध है, उस दिन
रोगीके लिये उससे भी आधे शौचका नियममुखकी शुद्धिके लिये बारह बार कुल्ला करना
है। परंतु जब मनुष्य स्वस्थ हो जाय, तबचाहिये। कनिष्ठा अंगुलीके बराबर मोटी, बारह
शौचसम्बन्धी नियमोंके पूर्ण पालनमें कमी नअंगुल लंबी, हरी, गीली लकड़ी, जिसका
करे। हाथ-पैरोंकी शुद्धिके पश्चात् मनुष्य पवित्रछिलका उतारा न गया हो तथा जिसमें छेद
भूमिमें बैठकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करकेया रोग न हो, दाँतनके लिये उपयुक्त मानी
जलसे कुल्ला करे। उस जलमें भूसी, कोयला,गयी है। दन्तधावनके काष्ठका अग्रभाग एक
अस्थि एवं भस्मका संसर्ग नहीं रहना चाहिये।अंगुलतक चबाना चाहिये फिर उसीके कूँचेसे
अत्यन्त शुद्ध एवं स्वच्छ जलसे आचमन करे।दाँतोंको रगड़कर साफ करना और जलसे कुल्ला
आचमनमें इतना जल पीये कि वह हृदयतककरना चाहिये। शरीरशुद्धिके लिये प्रातःकाल
पहुँच सके। इस कार्यमें जल्दी नहीं करनीस्नान करना चाहिये। यदि तीर्थ (तालाब या
चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे। आचमनकेनदी)-का जल मिल जाय तो विशेष उत्तम है।
लिये जल लेते समय उसे भलीभाँति दृष्टिशरीरके नौ छिद्रोंसे दिन-रात मल निकलता
डालकर देख ले। वह पवित्र हो तभी उसकारहता है, अतः वह सदा मलिन है। प्रातःकाल
उपयोग करे। यदि दोनों पैरोंको न धोये तोस्नान करनेसे इसकी शुद्धि होती है। प्रातःकालका
आचमन करनेपर भी मनुष्य अशुद्ध ही मानास्नान प्राजापत्य व्रतके समान पापनाशक माना
जाता है। अपनी शुद्धिके लिये मनुष्य तीन बारगया है। वह उत्साह, मेधा, सौभाग्य, रूप तथा
जल पीकर आँख, कान आदि इन्द्रियछिद्रोंकासम्पदाको बढ़ानेवाला है। वह दरिद्रता, पाप,
स्पर्शद्वारा शुद्ध करे। अंगूठेके मूल भागसे अपनेग्लानि, अपवित्रता और दुःस्वप्नका नाश करनेवाला
ओठोंको पोंछे, जलसे हृदयका स्पर्श करकेहै तथा तुष्टि और पुष्टि प्रदान करनेवाला है।
समस्त अंगुलियोंसे मस्तकका स्पर्श करे। जलसहितनृपश्रेष्ठ! अब मैं प्रसंगवश स्नानकी विधिका
अंगुलियोंके अग्रभागसे दोनों कन्धोंका स्पर्शवर्णन करता हूँ; क्योंकि विद्वानोंने विधिपूर्वक
करे। सड़क या गलीमें घूम आनेपर आचमनकिये हुए स्नानका महत्त्व साधारण स्नानसे
किया हुआ मनुष्य भी फिर आचमन करे। स्नान,सौगुना अधिक बताया है। विशुद्ध कुशा लेकर
भोजन और जलपान करनेपर, शुभ कर्मकेपवित्र स्थानपर रखे और आचमन करके स्नान
प्रारम्भमें, सोकर उठनेपर, वस्त्र बदलने या नूतनकरे। हाथमें कुश लेकर, शिखा बाँधकर जलके
वस्त्र धारण करनेपर, कोई अमांगलिक वस्तुभीतर प्रवेश करे और अपनी शाखामें बतायी
दीख जानेपर अथवा भूलसे किसी अपवित्रहुई विधिके अनुसार विधिपूर्वक स्नान करे। इस
वस्तुको छू लेने या उसकी याद कर लेनेपरप्रकार स्नानकार्य समाप्त करके वस्त्र निचोड़कर
दो बार आचमन करनेसे मनुष्य शुद्ध होता है।दो नूतन वस्त्र धारण करे। फिर आचमन करके
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य *६०९

कुश हाथमें लिये हुए ही प्रातःकालकी सन्ध्या करे। अपने मनको दृढ़तापूर्वक संयममें रखकर प्राणायाम करनेवाला ब्राह्मण दिन और रातमें किये हुए पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। यदि मनको संयममें रखकर दस या बारह बार प्राणायाम कर लिये जायँ तो ऐसा मानना चाहिये कि उस पुरुषने बड़ी भारी तपस्या कर ली। व्याहृति और प्रणवके साथ किये हुए सोलह प्राणायाम यदि प्रतिदिन होते रहें तो एक मासमें वे भ्रूणहत्या करनेवाले पापीको भी पवित्र कर देते हैं। जैसे पार्थिव धातुओंका मल आगमें तपानेसे जल जाता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंद्वारा किये हुए दोष प्राणायामसे भस्म हो जाते हैं। नृपश्रेष्ठ! प्रणव परब्रह्म है। प्राणायाम उत्तम तपस्या है और गायत्रीसे बढ़कर दूसरा कोई पवित्र करनेवाला मन्त्र नहीं है। मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा रातमें जो पाप करता है, वह प्रातःसन्ध्याकी उपासना करते हुए प्राणायामोंके द्वारा शुद्ध कर देता है। इसी प्रकार मन, वाणी और क्रियाद्वारा दिनमें जो पाप करता है, उसे सायंकालकी सन्ध्योपासनामें प्राणायामोंके द्वारा नष्ट कर डालता है। सायंकालकी सन्ध्या करनेवाला पुरुष दिनमें किये हुए पापका नाश करता है। जो प्रातःकाल और सायंकालकी सन्ध्या नहीं करता, वह समस्त ब्राह्मणोचित कर्मोंसे शूद्रकी भाँति बाहर कर देने योग्य है*।

प्राणायामके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। फिर 'आपो हिष्ठा मयो भुवः' इत्यादि तीन ऋचाओंद्वारा मार्जन करे। पृथ्वीपर, मस्तकपर, आकाशमें, आकाशमें, पृथ्वीपर, मस्तकपर, मस्तकपर, आकाशमें तथा भूमिपर—इस तरह नौ बार नौ स्थानोंमें जल छिड़कना चाहिये। यहाँ भूमि या पृथ्वी शब्दसे दोनों चरण लिये गये हैं। आकाशका अर्थ हृदय माना गया है। सिर या मस्तक शब्द अपने प्रसिद्ध अर्थमें ही है। इस प्रकार इन्हीं अंगोंका मार्जन उक्त मन्त्रोंद्वारा बताया गया है। स्नान छः प्रकारके होते हैं—वारुण स्नान (जलसे किया हुआ स्नान), आग्नेय स्नान (अग्निकी लपटोंसे अपने अंगोंको तपाना या सर्वांगसे धूप-सेवन करना), वायव्य स्नान (स्वच्छ वायुका सेवन), ऐन्द्र स्नान (वर्षाके जलसे नहाना), मन्त्र स्नान (मन्त्रोच्चारण और श्रवणसे अपनेको शुद्ध करना) तथा ब्राह्म स्नान (वेद-मन्त्रोंद्वारा मार्जन या अभिषेक)। इनमें पूर्वोक्त सभी स्नानोंकी अपेक्षा यह ब्राह्म-स्नान (मार्जन) अधिक उत्तम है। जो ब्राह्म-स्नानकी विधिसे स्नान करता है, वह बाहर और भीतरसे भी शुद्ध हो जाता है तथा सर्वत्र देवपूजा आदि कर्मोंमें सम्मिलित होनेकी योग्यता प्राप्त कर लेता है; क्योंकि इससे अन्तःशुद्धि एवं भावशुद्धि हो जाती है। केवल जलस्नानसे ही कोई परम शुद्ध नहीं माना जाता। जो भावसे दूषित हैं, वे सैकड़ों बार स्नान करके भी शुद्ध नहीं होते। जिसका चित्त निर्मल है, उसीने सब तीर्थोंमें स्नान किया है, वही सब प्रकारके मलोंसे रहित है और उसीने सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया है।

चित्त जिस प्रकार निर्मल होता है, वह


* एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः। गायत्र्यास्तु परं नास्ति पावनं च नृपोत्तम ॥
कर्मणा मनसा वाचा यद्रात्रौ कुरुते त्वघम्। उत्तिष्ठन् पूर्वसन्ध्यायां प्राणायामैर्विशोधयेत् ॥
यदह्ना कुरुते पापं मनोवाक्कायकर्मभिः। आसीनः पश्चिमां सन्ध्यां प्राणायामैर्व्यपोहति ॥
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम्। नोपतिष्ठेत्तु यः पूर्वा नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम् ॥
स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः।
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। ७३–७६)

६१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बतलाता हूँ, सुनो। यदि भगवान् विश्वनाथ प्रसन्न हो जायें तो चित्त शुद्ध होता है। अतएव चित्तकी शुद्धिके लिये काशीपति विश्वनाथकी शरण लेनी चाहिये। जो ऐसा करता है, वह इस शरीरका त्याग करनेके बाद परब्रह्मको प्राप्त होता है। पूर्वोक्त मार्जन करनेके अनन्तर 'द्रुपदादिव मुमुचानः०' इत्यादि मन्त्रका जप करते हुए जलको अभिमन्त्रित करे और उस जलको सिरपर छिड़क ले। उसके बाद हाथमें जल लेकर विधिज्ञ पुरुष 'ऋतञ्च सत्यञ्च०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अघमर्षण करे। जो विद्वान् जलमें गोता लगाकर तीन बार अघमर्षण मन्त्रका जप करता है अथवा स्थलमें भी बैठकर हाथमें जल ले अघमर्षण मन्त्रका जप करता है, उसकी पापराशि उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार। अघमर्षणके पश्चात् प्रणव तथा महाव्याहृतिके साथ गायत्री-मन्त्रका जप करते हुए खड़ा होकर सूर्यके लिये तीन अंजलि जल दे। वह जल वज्रके समान होकर उन्हें प्राप्त होता है और उसके द्वारा मन्देह नामक राक्षस शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, जो कि पर्वताकार शरीर धारण करके सूर्यके तेजको आच्छादित किया करते हैं। प्रातःकाल गायत्री-जप करते हुए तबतक खड़ा रहे, जबतक कि सूर्यका दर्शन न हो जाय। इसी प्रकार सायंकालमें बैठकर तबतक गायत्री-जप करना चाहिये, जबतक नक्षत्रोंका दर्शन न होने लगे। अपना हित चाहनेवाले द्विजको सन्ध्योपासनाके कालका लोप नहीं करना चाहिये। जब सूर्यका आधा उदय या आधा अस्त हुआ हो, उस समय उनके लिये अंजलिका वज्रोदक डालना चाहिये। विधिपूर्वक की हुई सन्ध्या भी समय बिताकर करनेसे निष्फल हो जाती है*। बायाँ हाथ जलमें डालकर द्विजोंद्वारा जो सन्ध्या की जाती है, वह वृषली (शूद्रा) जानने योग्य है। वह राक्षसगणोंको आनन्द देनेवाली मानी गयी है। सूर्यार्घ्य देनेके पश्चात् अपनी शाखामें बतायी हुई विधिके अनुसार सूर्यका उपस्थान करे। एक हजार अथवा एक सौ अथवा दस बार गायत्री-मन्त्रके जपद्वारा सूर्योपस्थान करना चाहिये। जो अधिक-से-अधिक एक हजार, मध्यम श्रेणीमें एक सौ अथवा कम-से-कम दस बार प्रतिदिन, गायत्रीमन्त्रका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता। लाल चन्दनमिश्रित जल, फूल और कुशोंके द्वारा वेदोक्त अथवा आगमोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये†। जिसने भगवान् सूर्यदेवका पूजन किया, उसने तीनों लोकोंकी पूजा कर ली। भगवान् सूर्य पूजित होनेपर पुत्र, पशु और धन देते हैं, रोग हर लेते हैं, पूरी आयु देते हैं और मनोवांछित कामनाओंको पूर्ण करते हैं।

इस प्रकार सन्ध्योपासना पूर्ण होनेपर अपनी शाखामें कही हुई विधिके अनुसार चन्दन, अगरु, कपूर, सुगन्धित पुष्प एवं शुद्ध जलसे 'तृप्यन्तु' का उच्चारण करते हुए ब्रह्मा आदि देवताओं, मरीचि आदि मुनियों तथा अन्य ऋषि, देवता और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। निवीती होकर अर्थात् यज्ञोपवीतको गलेमें मालाकी भाँति करके सनकादि मनुष्योंका जौ मिले हुए जलसे तर्पण करे। यह तर्पण सीधे एवं उत्तराग्र कुशद्वारा प्राजापत्य तीर्थसे होना चाहिये। फिर प्राचीनावीती होकर अर्थात् जनेऊको दाहिने कंधेपर करके


* विधिनापि कृता सन्ध्या कालातीताऽफला भवेत्। (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५।९४)
† रक्तचन्दनमिश्राभिरद्भिश्च कुसुमैः कुशैः। वेदोक्तैरागमरोक्तैर्वा मन्त्रैरर्घ्यं प्रदापयेत्॥ (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५।९८-९९)