संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कालकी सन्ध्या नहीं करते, ब्रह्मयज्ञ, बलिवैश्वदेव और दोपहरके समय अतिथिपूजासे मुँह मोड़ते हैं, इसी प्रकार जो सायंकालमें भी अतिथियोंका उनकी इच्छाके अनुरूप सत्कार नहीं करते, उन सबके उन-उन कर्मोंके त्यागसे होनेवाले समस्त पाप धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य मध्याह्नकालमें संन्यासियोंको भिक्षा नहीं देते, जो कुत्सित बुद्धिवाले विप्र अपने पढ़े हुए तीनों वेदोंको भूल जाते अथवा वेद और वेदांगोंका अध्ययन नहीं करते, प्रत्येक वर्षमें माता-पिताका श्राद्ध नहीं करते तथा जो लोभवश महालयश्राद्ध, नित्यश्राद्ध, अष्टकाश्राद्ध और अन्य नैमित्तिक श्राद्धोंसे जी चुराते हैं, उनके भी पातक धनुष्कोटिमें नहानेसे दूर हो जाते हैं। कोई दुराचारी रहा हो अथवा उत्तम आचरणवाला हो, यदि वह धनुष्कोटि तीर्थका सेवन करता है, तो उसके संसारबन्धनका नाश और पुनर्जन्मका अभाव हो जाता है। जो संसारसमुद्रसे पार होना चाहता हो, उसे शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटिमें जाना चाहिये। मुनीश्वरो! तुम भी मुक्तिकी सिद्धिके लिये श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें जाओ।
विप्रवरो! इस प्रकार तुमसे मैंने सेतुतीर्थके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह अग्निष्टोम आदि यज्ञोंका पूर्ण फल पाता है। जो इसका दो बार पाठ या श्रवण करता है, वह श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो भगवान् शिवके समीप जाता है। जो तीन बार एकाग्रचित्तसे इसका पाठ या श्रवण करता है, वह शिवजीको प्रसन्न करके उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। जो बार-बार इस उत्तम माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह गिरिजापति महादेवजीका सायुज्य प्राप्त करता है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस माहात्म्यका एक श्लोक, आधा श्लोक, एक चरण, एक पद—अथवा एक अक्षर भी पढ़ता है, उसका उस दिनका किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। सेतुके मध्यमें विद्यमान अन्य तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल होता है, वह इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे प्राप्त हो जाता है। जिसके घरमें यह माहात्म्य हस्तलिखित पुस्तकके रूपमें विद्यमान है, वहाँ भूत, वेतालादिसे भय नहीं प्राप्त होता। शनैश्चर, मंगल आदि क्रूर ग्रहोंकी पीड़ा भी नहीं रहती। यह पवित्र एवं उत्तम माहात्म्य जिसके घरमें विद्यमान हो, उसके घरको रामसेतु तीर्थ जानना चाहिये। इस पुण्यदायक माहात्म्यको मठ अथवा देवालयमें पढ़ना चाहिये। नदी और सरोवरके किनारे अथवा पवित्र वनभूमि या श्रोत्रियोंके घरपर इसका पाठ करना चाहिये। विषुवयोगमें, अयनारम्भके दिन, पुण्यमय एकादशी तिथिको तथा अष्टमी और चतुर्दशीको इस माहात्म्यका विशेषरूपसे पाठ करना चाहिये। मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ही इस माहात्म्यको पढ़े तथा श्रोता भी शौच-सन्तोषादि नियमोंसे युक्त होकर ही इस उत्तम प्रसंगको सुने। यह पवित्र माहात्म्य वेदार्थोंके समावेशसे विस्तारको प्राप्त हुआ है। यह सब पापोंका नाश करनेवाला है। स्मृतिकारोंको यह मान्य है और मुनिवर व्यासजीको भी अत्यन्त प्रिय है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको इसका श्रवण और पाठ करना चाहिये। सुनानेवाले आचार्यको भी अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार जो कुछ बन सके, सुवर्ण आदि देना चाहिये; क्योंकि कथावाचकके पूजित होनेपर ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवता पूजित होते हैं और उनके पूजित होनेपर तीनों लोक पूजित हो जाते हैं। दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें भूतलपर अवतीर्ण हुए साक्षात् श्रीहरि