भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 628
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९९

उत्पन्न हुए हैं, आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य स्वीकार करें।'

व्यतीपात योगके लिये अर्घ्यदानका मन्त्र

व्यतीपात महायोगिन् महापातकनाशन ।
सहस्रबाहो सर्वात्मन् गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥

'महापातकोंका नाश करनेवाली महायोगी व्यतीपात! सहस्रबाहो! सर्वात्मन्! आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण करें।'

तिथि, वार, नक्षत्रके स्वामीको अर्घ्यदान-मन्त्र

तिथिनक्षत्रवाराणामधीश परमेश्वर ।
मासरूप गृहाणार्घ्यं कालरूप नमोऽस्तु ते ॥

'तिथि, नक्षत्र और दिनोंके अधीश्वर! मासरूप और कालरूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।'

इस प्रकार पृथक्-पृथक् मन्त्रोंसे अर्धोदय कालमें अर्घ्य देकर चौदह, बारह, आठ, सात, छः अथवा पाँच ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार अन्न-पान आदिसे पूजित करे। तत्पश्चात् भगवान् जगन्नाथ, चन्द्रमा, सूर्य, व्यतीपात एवं भगवान् विष्णुकी इस प्रकार प्रार्थना करे—'जगन्नाथ! केशव! श्रवण नक्षत्र, वामनावतारके समय आपके जन्म-समय जन्मनक्षत्र रहा है, इसमें मैंने याचकोंको जो कुछ दिया है, वह आपके लिये अक्षय हो। देवताओंको अमृत प्रदान करनेवाले रोहिणीवल्लभ कलाशेष नक्षत्राधिपते! आपको नमस्कार है। दीनानाथ! जगन्नाथ! कालनाथ! कृपानिधान! सूर्यदेव! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो। चन्द्रमा और सूर्यके पुत्र व्यतीपात! आपको नमस्कार है। आपकी उपस्थितिमें मैंने जो दान आदि कर्म किया है, वह अक्षय हो। भगवान् वासुदेव! जनार्दन! आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। मास, ऋतु, अयन और काल, सबके स्वामी हैं। हरे! मेरे पापोंको शान्त कीजिये।'

इस प्रकार पूजन और प्रार्थना करके श्राद्ध आरम्भ करे। अपनी रुचिके अनुसार हिरण्यश्राद्ध^१, आमश्राद्ध^२, अथवा पाक श्राद्ध^३ करे। उसके बाद पार्वणश्राद्ध भी करे। स्नानकालमें 'सेतु' 'सेतु' इस नामका उच्चस्वरसे उच्चारण करनेपर मनुष्योंके करोड़ों पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं और वे भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होते हैं। रामसेतु, धनुष्कोटि, राम, सीता और लक्ष्मण, रामेश्वर, हनुमान्, सुग्रीव आदि वानर, विभीषण, नारद, विश्वामित्र, अगस्त्य, वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि तथा कश्यप—इन सबका स्नानकालमें चिन्तन करनेवाला रामभक्त या अन्य पुरुष सब दुःखोंसे छूट जाता और परमपदको प्राप्त होता है। सत्यक्षेत्र, हरिक्षेत्र, कृष्णक्षेत्र, नैमिषक्षेत्र, शालग्रामतीर्थ, बदरिकाश्रम, हस्तिशैल (कालहस्ती), वृषाचल, शेषाद्रि, चित्रकूट, लक्ष्मीक्षेत्र, कुरंगक्षेत्र, कांची, कुम्भकोण, मोहिनीपुर, इन्द्राचल, श्वेताचल, पुण्यमय महास्थल पद्मनाभ, फुल्लग्राम, घटिकाद्रि, सारक्षेत्र, हरिस्थल, श्रीनिवासक्षेत्र, भक्तनाथ-महास्थल, अलिन्द नामक महाक्षेत्र, शुकक्षेत्र, वारुणक्षेत्र, मथुरा, श्रीगोष्ठी, पुरुषोत्तम, श्रीरंगक्षेत्र पुण्डरीकाक्ष तथा अन्य वैष्णवस्थलोंमें स्नान करनेसे जो पाप नष्ट होते हैं, वे सब केवल सेतुतीर्थमें स्नान करनेसे निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।

जो प्रातःकाल जलाशयमें जाकर स्नान और आचमन करके शुद्धचित्त हो प्रसन्न मनसे सन्ध्योपासनपूर्वक वेदमाता गायत्रीकी उपासना नहीं करता अथवा जो पापसे दूषित अन्तःकरणवाले मनुष्य आलस्य छोड़कर सायं, प्रातः एवं मध्याह्न-


१- श्राद्धमें प्रत्येक अवसरपर जो अन्न आदि सामग्री अपेक्षित होती है, उसकी पूर्ति तथा श्राद्ध-प्रतिष्ठाके लिये निष्क्रयरूपसे सुवर्ण दक्षिणामात्र दे देना हिरण्यश्राद्ध है।
२- कच्चा अन्न संकल्प करके श्राद्धमें दिया जाय तो वह आमश्राद्ध है।
३- जिसमें पाक बनाकर उसका पिण्ड दिया जाय और ब्राह्मणोंको पक्वान्न भोजन कराया जाय, वह पाक श्राद्ध कहलाता है।