संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अमावास्या हो, साथ ही व्यतीपात योग भी हो, तो उस समय वह अर्धोदययोग पुण्यदायक माना गया है। उस योगमें सेतुतीर्थमें किया हुआ स्नान सायुज्य मुक्तिका कारण है। पूर्वोक्त योगोंमेंसे यदि एक-एक भी मिल जाय तो वह स्नान, दान, जप और पूजनसे मोक्षदायक होता है। फिर तिथि, वार, नक्षत्र, योग और संक्रान्ति—ये पाँचों मिल जायँ तब तो पुण्यके विषयमें कहना ही क्या है? नक्षत्रोंमें श्रवण, तिथियोंमें अमावास्या, योगोंमें व्यतीपात और दिनोंमें रविवार यहाँके लिये श्रेष्ठ हैं। मकरराशिमें सूर्यके स्थित होनेपर यदि पूर्वोक्त चारोंका योग हो तो उस समय जो मनुष्य सेतुतीर्थमें स्नान करता है, वह मानव फिर कभी माताके गर्भमें नहीं जाता, अपितु सायुज्य मोक्षको पा लेता है। इस प्रकार उक्त महोदयकारक काल पुण्यकाल बताया गया है। इन पुण्य समयोंमें सेतुतीर्थके भीतर दानका विधान है।
जिस ब्राह्मणमें सदाचार, तप, वेद, वेदान्त-श्रवण, शिव-विष्णु आदिकी पूजा तथा पुराणार्थ-प्रवचनकी शक्ति हो, वह दानका उत्तम पात्र बताया गया है। यदि सेतुतीर्थमें सुपात्र ब्राह्मण मिल जाय तो उसीको दान देना चाहिये। फलको चाहनेवाले पुरुषोंके लिये उचित है कि वे अधम पात्रके लिये दान न दें।
एक समय राजा दिलीप ने श्रीवसिष्ठजीसे पूछा—पुरोहितजी! दान किसको देने चाहिये? यह यथार्थ रूपसे बतलाइये।
वसिष्ठजी बोले—वैदिक आचारके पालनमें लगा हुआ ब्राह्मण समस्त दानपात्रोंमें सर्वोत्तम है। वेद-पुराणोंके मन्त्र, शिव-विष्णु आदिका पूजन, वर्णाश्रमधर्मोंका अनुष्ठान—ये सब जिसमें सदा विद्यमान हों तथा जो दरिद्र और कुटुम्बी हो, वह दानका श्रेष्ठ पात्र कहलाता है। उस सत्पात्रको दिया हुआ दान धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधक होता है। पुण्यतीर्थोंमें विशेषतः सत्पात्रको दिया हुआ दान हितकारक होता है। दुष्ट पात्रको दान देनेसे नाना प्रकारके दोष प्राप्त होते हैं, अतः सब प्रकारके यत्न करके सत्पात्रको दान देना चाहिये। सत्पात्र तीर्थमें उपस्थित न हो तो किसी भी सत्पात्रको देनेका संकल्प करके तीर्थमें जल छोड़ देना चाहिये। यदि वह सत्पात्र जीवित न हो तो संकल्पित वस्तु उसके पुत्रको देनी चाहिये, परंतु तीर्थमें अधम पात्रको दान कदापि नहीं देना चाहिये।
श्रीसूतजी कहते हैं—वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर राजा दिलीप ने तबसे सदा सत्पात्रको ही उत्तम दान दिया। अयोध्या, दण्डकारण्य, विरूपाक्ष, वेंकटाचल, शालग्राम, प्रयाग, कांची, द्वारका, मदुरा, पद्मनाभ, काशी विश्वनाथपुरी, सब नदियाँ, समुद्र तथा भास्कर पर्वत—इन क्षेत्रोंमें मुण्डन और उपवास आवश्यक बताया गया है। जो मनुष्य मुण्डन और उपवास न करके अपने घरको चला जाता है, उसके साथ ही उसके पातक भी उसके घर लौट जाते हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो चौबीस तीर्थ हैं, उनमेंसे लक्ष्मणतीर्थमें मुनियोंने मुण्डन करानेका आदेश दिया है। लक्ष्मणतीर्थके तटपर केवल सिरके बाल बनवाने चाहिये। इस प्रकार सेतुमें सदा अर्धोदय योगमें स्नान करना चाहिये। सेतुमें अर्धोदयके समय अर्धोदय नामसे प्रसिद्ध निर्मल भगवान् जगन्नाथका पूजन करे। उससे श्रीविष्णु प्रसन्न होते हैं।
तत्पश्चात् निम्नांकित मन्त्र पढ़कर सूर्य और चन्द्रमाको अर्घ्य दे—
दिवाकर नमस्तेऽस्तु तेजोराशे जगत्पते।
अत्रिगोत्रसमुत्पन्न लक्ष्मीदेव्याः सहोदर॥
अर्घ्यं गृहाण भगवन् सुधाकुम्भ नमोऽस्तु ते।
'सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तेजोराशि दिवाकर! आपको नमस्कार है। लक्ष्मीदेवीके सहोदर सुधा-कलशरूप भगवन् चन्द्रदेव! आप अत्रिगोत्रमें