भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 626, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 626
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९७

देता है। विषुवयोग, उत्तरायण या दक्षिणायनके प्रारम्भ दिन, संक्रान्तिकाल, सोमवार तथा अमावास्या एवं पूर्णिमा तिथि—इन सभी अवसरोंपर सेतुतीर्थका दर्शन करनेमात्रसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। सूर्यनारायणके मकर राशिमें स्थित होनेपर सूर्योदयकालमें तीन दिनतक धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे मनुष्य पापहीन हो जाता है। जो मनुष्य माघ मासमें पंद्रह दिनोंतक धनुष्कोटिमें स्नान करता है, वह वैकुण्ठधामको पाता है। माघ मासमें रामसेतुतीर्थमें बीस दिनोंतक स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् शिवका सामीप्य प्राप्त करता और उन्हींके साथ आनन्दित होता है तथा तीस दिनोंतक वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। अतः माघ मासमें जब सूर्यका किंचिन्मात्र उदय हुआ हो, उस समय मनुष्य रामसेतुमें अवश्य स्नान करे। वह स्नान ब्रह्महत्यादि पातकोंका नाशक है। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा अर्धोदय योगमें धनुष्कोटि तीर्थमें स्नान करना अत्यन्त आवश्यक है। पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने रावणका विनाश करनेके लिये इस तीर्थमें स्नान किया था और उक्त योगोंमें स्नानका नियम बताया था। उस समय सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर, नाग, ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि, पितृसमुदाय तथा ब्रह्मा आदि देवसमुदाय भी धनुष्कोटि तीर्थका सेवन करते हैं। जो मनुष्य पुण्यमय रामसेतुका स्मरण करके जहाँ कहीं भी पोखरे आदिके जलमें स्नान करता है, उसका किंचिन्मात्र भी पाप कभी शेष नहीं रहता। सेतुके मध्यमें विद्यमान तीर्थोंमें मुट्ठीभर अन्न देनेसे भी सब रोग और भ्रूणहत्या आदि पाप नष्ट हो जाते हैं। धनुष्कोटिके दर्शनमात्रसे मनुष्य अपने समस्त कुलको तार देता है। श्रीरामचन्द्रजीके धनुषकी कोटिसे की हुई रेखामें स्नान करनेसे करोड़ों पातकोंका तत्काल नाश हो जाता है। जहाँ सीताजी अग्निमें समायी थीं, उस कुण्डमें स्नान करनेसे सैकड़ों भ्रूणहत्याएँ क्षणभरमें नष्ट हो जाती हैं। जैसे श्रीरामचन्द्रजी हैं, वैसा ही सेतुतीर्थ है। जैसे विष्णुभगवान् हैं, वैसे ही गंगा भी है। अतः 'हे गंगे! हे हरे! हे रामसेतुतीर्थ!' ऐसा उच्चारण करता हुआ जहाँ कहीं तीर्थके बाहर भी स्नान करता है, उससे वह परम गतिको प्राप्त होता है। गन्धमादन पर्वतपर सेतुमें अर्धोदय योगकी बेलामें स्नान करके जो पितरोंके उद्देश्यसे सरसोंभर भी पिण्डदान देता है, उसके पितर जबतक सूर्य और चन्द्रमा स्थिर रहते हैं, तबतक तृप्त रहते हैं। सेतु, पद्मनाभ, गोकर्ण और पुरुषोत्तम—इन तीर्थोंमें समुद्रके जलमें किया जानेवाला स्नान सभी समयोंमें अभीष्ट है। शुक्र, मंगल, शनैश्चरके दिन सन्तानकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सेतुतीर्थके सिवा और कहीं क्षारसमुद्रमें स्नान न करे। जिसकी पत्नी गर्भिणी हो, वह भी सेतुके सिवा अन्य स्थानोंमें समुद्रमें स्नान न करे। सेतुका स्नान सदैव उत्तम है। दिन, तिथि और नक्षत्रके नियम सेतुसे भिन्न तीर्थोंके लिये ही हैं। सेतुमें, नदी और समुद्रके संगममें, गंगा-सागर-संगममें, गोकर्ण क्षेत्रमें और पुरुषोत्तमतीर्थमें भी सदैव समुद्र-स्नानका विधान है। इन तीर्थोंके अतिरिक्त और कहीं बिना पर्वके समुद्रके जलका स्पर्श नहीं करे। सीता और लक्ष्मणके साथ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने यहाँ सब देवताओं, पितरों और मुनियोंके सुनते हुए यह प्रतिज्ञा की थी—'जो मनुष्य यहाँ मेरे द्वारा निर्मित सेतुमें स्नान करेंगे, वे यहाँ मेरे प्रसादसे फिर जन्म नहीं ग्रहण करेंगे। मेरे सेतुके दर्शनमात्रसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।' रामसेतुमें रक्षाके लिये भगवान् महाविष्णु सेतुमाधव नामसे प्रसिद्ध होकर निवास करते हैं। माघके महीनेमें जब सूर्यनारायण श्रवण नक्षत्रमें स्थित हों, तब रविवारके दिन सूर्यके अर्धोदय कालमें यदि नाग-करण रहित

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