भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करे, वह समस्त पापों और नरकके क्लेशोंका नाश करनेवाला है।

तदनन्तर अति उत्तम अगस्त्यतीर्थमें स्नान करे। वहाँसे अग्नितीर्थमें जाकर स्नान, तर्पण और विधिपूर्वक श्राद्ध करे। चक्र आदि तीर्थ सब पातकोंका अपहरण करनेवाले हैं। वे क्रमशः यहाँ बताये गये हैं। उसी क्रमसे अथवा अपनी रुचिके अनुसार उन सब तीर्थोंमें नहाकर श्राद्ध आदि करे। तत्पश्चात् रामेश्वरमें पहुँचकर परमेश्वर भगवान् शिवकी सेवा करे। फिर सेतुमाधवमें आकर क्रमशः राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान् तथा अन्य कपिवरोंके तीर्थोंमें वहाँ जाकर नियमपूर्वक स्नान करे। फिर भगवान् रामेश्वर तथा श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार करके धनुष्कोटिमें नहानेके लिये जाय। वहाँ स्नान करके अपनी शक्तिके अनुसार धन-दान करे। उसके बाद कोटितीर्थमें आकर नियमपूर्वक स्नान करे और रामेश्वर नामक भगवान् शिवको प्रणाम करके अपने पास धन हो तो ब्राह्मणोंको सुवर्ण-दान करे। तिल, धान्य, गौ, क्षेत्र, वस्त्र, चावल आदि दान करे। धूप, दीप, नैवेद्य एवं पूजाके अन्य उपकरण भगवान् रामेश्वरको अर्पण करे। फिर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके आज्ञा ले सेतुमाधवके समीप जाय। उन्हें भी धूप, दीप आदि भेंट करके उनकी आज्ञा ले पूर्वोक्त नियमोंका पालन करते हुए अपने घर लौटे। घर आनेपर षड्रस भोजनके द्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करे। इससे भगवान् रामेश्वर प्रसन्न होकर उसे मनोवांछित वस्तु देते हैं। उसके लिये नरकका भय नहीं रहता और उसकी दरिद्रताका नाश हो जाता है। उस पुरुषकी सन्तति बढ़ती है और शीघ्र ही संसारबन्धनका नाश करके वह सायुज्य मोक्षको प्राप्त होता है। जो यहाँकी यात्रा करनेमें असमर्थ हो, वह श्रुति-स्मृति तथा आगम ग्रन्थोंमें जो सेतुमाहात्म्यसूचक परम पुण्यमय ग्रन्थ हो, उसका पाठ करावे अथवा स्वयं भक्तिपूर्वक उसका पाठ करे। ऐसा करनेसे वह सेतुस्नानके पुण्य-फलको निःसन्देह प्राप्त कर लेता है। मनीषी पुरुषोंने यह सुविधा अन्धे और पंगु मनुष्योंके लिये ही बतायी है। विप्रवरो! इस प्रकार यहाँ सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम बतलाया गया। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।

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सेतुतीर्थका माहात्म्य तथा इस खण्डका उपसंहार

श्रीसूतजी कहते हैं— मुनिवरो! सेतुतीर्थमें किया हुआ जप, होम, तप और दान सब अक्षय कहा जाता है। धनुष्कोटिमें स्नान करके भक्तिपूर्वक श्रीरामेश्वर शिवका दर्शन करते हुए मनुष्य तीन दिन यहाँ निवास करे। यहाँ आदि षडक्षर (ॐ नमः शिवाय) इस मन्त्रका भक्तिपूर्वक एक हजार आठ बार जप करके मनुष्य भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। इस सेतुतीर्थकी महिमाका वर्णन करनेके उद्देश्यसे 'द्वौ समुद्रौ०' इत्यादि श्रुति सनातन कालसे विद्यमान है, जो माताके समान आदरणीय है। इसी प्रकार 'अदो यद्दारु०' यह दूसरी श्रुति भी उसी विषयमें है। 'विष्णोः कर्माणि पश्यत्०' यह श्रुति भी सेतुतीर्थके वैभवका वर्णन करनेवाली है। 'तद्विष्णोः०' यह दूसरी श्रुति भी सेतुका माहात्म्य सूचित करती है। इन वैदिक श्रुतियोंके अतिरिक्त इतिहास, पुराण और स्मृतियाँ भी एक स्वरसे सेतुतीर्थकी महिमाका वर्णन करती हैं। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर सेतुतीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य तत्काल कोटि जन्मोंके पापका नाश कर