संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९७
देता है। विषुवयोग, उत्तरायण या दक्षिणायनके प्रारम्भ दिन, संक्रान्तिकाल, सोमवार तथा अमावास्या एवं पूर्णिमा तिथि—इन सभी अवसरोंपर सेतुतीर्थका दर्शन करनेमात्रसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। सूर्यनारायणके मकर राशिमें स्थित होनेपर सूर्योदयकालमें तीन दिनतक धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे मनुष्य पापहीन हो जाता है। जो मनुष्य माघ मासमें पंद्रह दिनोंतक धनुष्कोटिमें स्नान करता है, वह वैकुण्ठधामको पाता है। माघ मासमें रामसेतुतीर्थमें बीस दिनोंतक स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् शिवका सामीप्य प्राप्त करता और उन्हींके साथ आनन्दित होता है तथा तीस दिनोंतक वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। अतः माघ मासमें जब सूर्यका किंचिन्मात्र उदय हुआ हो, उस समय मनुष्य रामसेतुमें अवश्य स्नान करे। वह स्नान ब्रह्महत्यादि पातकोंका नाशक है। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा अर्धोदय योगमें धनुष्कोटि तीर्थमें स्नान करना अत्यन्त आवश्यक है। पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने रावणका विनाश करनेके लिये इस तीर्थमें स्नान किया था और उक्त योगोंमें स्नानका नियम बताया था। उस समय सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर, नाग, ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि, पितृसमुदाय तथा ब्रह्मा आदि देवसमुदाय भी धनुष्कोटि तीर्थका सेवन करते हैं। जो मनुष्य पुण्यमय रामसेतुका स्मरण करके जहाँ कहीं भी पोखरे आदिके जलमें स्नान करता है, उसका किंचिन्मात्र भी पाप कभी शेष नहीं रहता। सेतुके मध्यमें विद्यमान तीर्थोंमें मुट्ठीभर अन्न देनेसे भी सब रोग और भ्रूणहत्या आदि पाप नष्ट हो जाते हैं। धनुष्कोटिके दर्शनमात्रसे मनुष्य अपने समस्त कुलको तार देता है। श्रीरामचन्द्रजीके धनुषकी कोटिसे की हुई रेखामें स्नान करनेसे करोड़ों पातकोंका तत्काल नाश हो जाता है। जहाँ सीताजी अग्निमें समायी थीं, उस कुण्डमें स्नान करनेसे सैकड़ों भ्रूणहत्याएँ क्षणभरमें नष्ट हो जाती हैं। जैसे श्रीरामचन्द्रजी हैं, वैसा ही सेतुतीर्थ है। जैसे विष्णुभगवान् हैं, वैसे ही गंगा भी है। अतः 'हे गंगे! हे हरे! हे रामसेतुतीर्थ!' ऐसा उच्चारण करता हुआ जहाँ कहीं तीर्थके बाहर भी स्नान करता है, उससे वह परम गतिको प्राप्त होता है। गन्धमादन पर्वतपर सेतुमें अर्धोदय योगकी बेलामें स्नान करके जो पितरोंके उद्देश्यसे सरसोंभर भी पिण्डदान देता है, उसके पितर जबतक सूर्य और चन्द्रमा स्थिर रहते हैं, तबतक तृप्त रहते हैं। सेतु, पद्मनाभ, गोकर्ण और पुरुषोत्तम—इन तीर्थोंमें समुद्रके जलमें किया जानेवाला स्नान सभी समयोंमें अभीष्ट है। शुक्र, मंगल, शनैश्चरके दिन सन्तानकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सेतुतीर्थके सिवा और कहीं क्षारसमुद्रमें स्नान न करे। जिसकी पत्नी गर्भिणी हो, वह भी सेतुके सिवा अन्य स्थानोंमें समुद्रमें स्नान न करे। सेतुका स्नान सदैव उत्तम है। दिन, तिथि और नक्षत्रके नियम सेतुसे भिन्न तीर्थोंके लिये ही हैं। सेतुमें, नदी और समुद्रके संगममें, गंगा-सागर-संगममें, गोकर्ण क्षेत्रमें और पुरुषोत्तमतीर्थमें भी सदैव समुद्र-स्नानका विधान है। इन तीर्थोंके अतिरिक्त और कहीं बिना पर्वके समुद्रके जलका स्पर्श नहीं करे। सीता और लक्ष्मणके साथ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने यहाँ सब देवताओं, पितरों और मुनियोंके सुनते हुए यह प्रतिज्ञा की थी—'जो मनुष्य यहाँ मेरे द्वारा निर्मित सेतुमें स्नान करेंगे, वे यहाँ मेरे प्रसादसे फिर जन्म नहीं ग्रहण करेंगे। मेरे सेतुके दर्शनमात्रसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।' रामसेतुमें रक्षाके लिये भगवान् महाविष्णु सेतुमाधव नामसे प्रसिद्ध होकर निवास करते हैं। माघके महीनेमें जब सूर्यनारायण श्रवण नक्षत्रमें स्थित हों, तब रविवारके दिन सूर्यके अर्धोदय कालमें यदि नाग-करण रहित
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अमावास्या हो, साथ ही व्यतीपात योग भी हो, तो उस समय वह अर्धोदययोग पुण्यदायक माना गया है। उस योगमें सेतुतीर्थमें किया हुआ स्नान सायुज्य मुक्तिका कारण है। पूर्वोक्त योगोंमेंसे यदि एक-एक भी मिल जाय तो वह स्नान, दान, जप और पूजनसे मोक्षदायक होता है। फिर तिथि, वार, नक्षत्र, योग और संक्रान्ति—ये पाँचों मिल जायँ तब तो पुण्यके विषयमें कहना ही क्या है? नक्षत्रोंमें श्रवण, तिथियोंमें अमावास्या, योगोंमें व्यतीपात और दिनोंमें रविवार यहाँके लिये श्रेष्ठ हैं। मकरराशिमें सूर्यके स्थित होनेपर यदि पूर्वोक्त चारोंका योग हो तो उस समय जो मनुष्य सेतुतीर्थमें स्नान करता है, वह मानव फिर कभी माताके गर्भमें नहीं जाता, अपितु सायुज्य मोक्षको पा लेता है। इस प्रकार उक्त महोदयकारक काल पुण्यकाल बताया गया है। इन पुण्य समयोंमें सेतुतीर्थके भीतर दानका विधान है।
जिस ब्राह्मणमें सदाचार, तप, वेद, वेदान्त-श्रवण, शिव-विष्णु आदिकी पूजा तथा पुराणार्थ-प्रवचनकी शक्ति हो, वह दानका उत्तम पात्र बताया गया है। यदि सेतुतीर्थमें सुपात्र ब्राह्मण मिल जाय तो उसीको दान देना चाहिये। फलको चाहनेवाले पुरुषोंके लिये उचित है कि वे अधम पात्रके लिये दान न दें।
एक समय राजा दिलीप ने श्रीवसिष्ठजीसे पूछा—पुरोहितजी! दान किसको देने चाहिये? यह यथार्थ रूपसे बतलाइये।
वसिष्ठजी बोले—वैदिक आचारके पालनमें लगा हुआ ब्राह्मण समस्त दानपात्रोंमें सर्वोत्तम है। वेद-पुराणोंके मन्त्र, शिव-विष्णु आदिका पूजन, वर्णाश्रमधर्मोंका अनुष्ठान—ये सब जिसमें सदा विद्यमान हों तथा जो दरिद्र और कुटुम्बी हो, वह दानका श्रेष्ठ पात्र कहलाता है। उस सत्पात्रको दिया हुआ दान धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधक होता है। पुण्यतीर्थोंमें विशेषतः सत्पात्रको दिया हुआ दान हितकारक होता है। दुष्ट पात्रको दान देनेसे नाना प्रकारके दोष प्राप्त होते हैं, अतः सब प्रकारके यत्न करके सत्पात्रको दान देना चाहिये। सत्पात्र तीर्थमें उपस्थित न हो तो किसी भी सत्पात्रको देनेका संकल्प करके तीर्थमें जल छोड़ देना चाहिये। यदि वह सत्पात्र जीवित न हो तो संकल्पित वस्तु उसके पुत्रको देनी चाहिये, परंतु तीर्थमें अधम पात्रको दान कदापि नहीं देना चाहिये।
श्रीसूतजी कहते हैं—वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर राजा दिलीप ने तबसे सदा सत्पात्रको ही उत्तम दान दिया। अयोध्या, दण्डकारण्य, विरूपाक्ष, वेंकटाचल, शालग्राम, प्रयाग, कांची, द्वारका, मदुरा, पद्मनाभ, काशी विश्वनाथपुरी, सब नदियाँ, समुद्र तथा भास्कर पर्वत—इन क्षेत्रोंमें मुण्डन और उपवास आवश्यक बताया गया है। जो मनुष्य मुण्डन और उपवास न करके अपने घरको चला जाता है, उसके साथ ही उसके पातक भी उसके घर लौट जाते हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो चौबीस तीर्थ हैं, उनमेंसे लक्ष्मणतीर्थमें मुनियोंने मुण्डन करानेका आदेश दिया है। लक्ष्मणतीर्थके तटपर केवल सिरके बाल बनवाने चाहिये। इस प्रकार सेतुमें सदा अर्धोदय योगमें स्नान करना चाहिये। सेतुमें अर्धोदयके समय अर्धोदय नामसे प्रसिद्ध निर्मल भगवान् जगन्नाथका पूजन करे। उससे श्रीविष्णु प्रसन्न होते हैं।
तत्पश्चात् निम्नांकित मन्त्र पढ़कर सूर्य और चन्द्रमाको अर्घ्य दे—
दिवाकर नमस्तेऽस्तु तेजोराशे जगत्पते।
अत्रिगोत्रसमुत्पन्न लक्ष्मीदेव्याः सहोदर॥
अर्घ्यं गृहाण भगवन् सुधाकुम्भ नमोऽस्तु ते।
'सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तेजोराशि दिवाकर! आपको नमस्कार है। लक्ष्मीदेवीके सहोदर सुधा-कलशरूप भगवन् चन्द्रदेव! आप अत्रिगोत्रमें
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उत्पन्न हुए हैं, आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य स्वीकार करें।'
व्यतीपात योगके लिये अर्घ्यदानका मन्त्र
व्यतीपात महायोगिन् महापातकनाशन ।
सहस्रबाहो सर्वात्मन् गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥
'महापातकोंका नाश करनेवाली महायोगी व्यतीपात! सहस्रबाहो! सर्वात्मन्! आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण करें।'
तिथि, वार, नक्षत्रके स्वामीको अर्घ्यदान-मन्त्र
तिथिनक्षत्रवाराणामधीश परमेश्वर ।
मासरूप गृहाणार्घ्यं कालरूप नमोऽस्तु ते ॥
'तिथि, नक्षत्र और दिनोंके अधीश्वर! मासरूप और कालरूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।'
इस प्रकार पृथक्-पृथक् मन्त्रोंसे अर्धोदय कालमें अर्घ्य देकर चौदह, बारह, आठ, सात, छः अथवा पाँच ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार अन्न-पान आदिसे पूजित करे। तत्पश्चात् भगवान् जगन्नाथ, चन्द्रमा, सूर्य, व्यतीपात एवं भगवान् विष्णुकी इस प्रकार प्रार्थना करे—'जगन्नाथ! केशव! श्रवण नक्षत्र, वामनावतारके समय आपके जन्म-समय जन्मनक्षत्र रहा है, इसमें मैंने याचकोंको जो कुछ दिया है, वह आपके लिये अक्षय हो। देवताओंको अमृत प्रदान करनेवाले रोहिणीवल्लभ कलाशेष नक्षत्राधिपते! आपको नमस्कार है। दीनानाथ! जगन्नाथ! कालनाथ! कृपानिधान! सूर्यदेव! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो। चन्द्रमा और सूर्यके पुत्र व्यतीपात! आपको नमस्कार है। आपकी उपस्थितिमें मैंने जो दान आदि कर्म किया है, वह अक्षय हो। भगवान् वासुदेव! जनार्दन! आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। मास, ऋतु, अयन और काल, सबके स्वामी हैं। हरे! मेरे पापोंको शान्त कीजिये।'
इस प्रकार पूजन और प्रार्थना करके श्राद्ध आरम्भ करे। अपनी रुचिके अनुसार हिरण्यश्राद्ध^१, आमश्राद्ध^२, अथवा पाक श्राद्ध^३ करे। उसके बाद पार्वणश्राद्ध भी करे। स्नानकालमें 'सेतु' 'सेतु' इस नामका उच्चस्वरसे उच्चारण करनेपर मनुष्योंके करोड़ों पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं और वे भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होते हैं। रामसेतु, धनुष्कोटि, राम, सीता और लक्ष्मण, रामेश्वर, हनुमान्, सुग्रीव आदि वानर, विभीषण, नारद, विश्वामित्र, अगस्त्य, वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि तथा कश्यप—इन सबका स्नानकालमें चिन्तन करनेवाला रामभक्त या अन्य पुरुष सब दुःखोंसे छूट जाता और परमपदको प्राप्त होता है। सत्यक्षेत्र, हरिक्षेत्र, कृष्णक्षेत्र, नैमिषक्षेत्र, शालग्रामतीर्थ, बदरिकाश्रम, हस्तिशैल (कालहस्ती), वृषाचल, शेषाद्रि, चित्रकूट, लक्ष्मीक्षेत्र, कुरंगक्षेत्र, कांची, कुम्भकोण, मोहिनीपुर, इन्द्राचल, श्वेताचल, पुण्यमय महास्थल पद्मनाभ, फुल्लग्राम, घटिकाद्रि, सारक्षेत्र, हरिस्थल, श्रीनिवासक्षेत्र, भक्तनाथ-महास्थल, अलिन्द नामक महाक्षेत्र, शुकक्षेत्र, वारुणक्षेत्र, मथुरा, श्रीगोष्ठी, पुरुषोत्तम, श्रीरंगक्षेत्र पुण्डरीकाक्ष तथा अन्य वैष्णवस्थलोंमें स्नान करनेसे जो पाप नष्ट होते हैं, वे सब केवल सेतुतीर्थमें स्नान करनेसे निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।
जो प्रातःकाल जलाशयमें जाकर स्नान और आचमन करके शुद्धचित्त हो प्रसन्न मनसे सन्ध्योपासनपूर्वक वेदमाता गायत्रीकी उपासना नहीं करता अथवा जो पापसे दूषित अन्तःकरणवाले मनुष्य आलस्य छोड़कर सायं, प्रातः एवं मध्याह्न-
१- श्राद्धमें प्रत्येक अवसरपर जो अन्न आदि सामग्री अपेक्षित होती है, उसकी पूर्ति तथा श्राद्ध-प्रतिष्ठाके लिये निष्क्रयरूपसे सुवर्ण दक्षिणामात्र दे देना हिरण्यश्राद्ध है।
२- कच्चा अन्न संकल्प करके श्राद्धमें दिया जाय तो वह आमश्राद्ध है।
३- जिसमें पाक बनाकर उसका पिण्ड दिया जाय और ब्राह्मणोंको पक्वान्न भोजन कराया जाय, वह पाक श्राद्ध कहलाता है।
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कालकी सन्ध्या नहीं करते, ब्रह्मयज्ञ, बलिवैश्वदेव और दोपहरके समय अतिथिपूजासे मुँह मोड़ते हैं, इसी प्रकार जो सायंकालमें भी अतिथियोंका उनकी इच्छाके अनुरूप सत्कार नहीं करते, उन सबके उन-उन कर्मोंके त्यागसे होनेवाले समस्त पाप धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य मध्याह्नकालमें संन्यासियोंको भिक्षा नहीं देते, जो कुत्सित बुद्धिवाले विप्र अपने पढ़े हुए तीनों वेदोंको भूल जाते अथवा वेद और वेदांगोंका अध्ययन नहीं करते, प्रत्येक वर्षमें माता-पिताका श्राद्ध नहीं करते तथा जो लोभवश महालयश्राद्ध, नित्यश्राद्ध, अष्टकाश्राद्ध और अन्य नैमित्तिक श्राद्धोंसे जी चुराते हैं, उनके भी पातक धनुष्कोटिमें नहानेसे दूर हो जाते हैं। कोई दुराचारी रहा हो अथवा उत्तम आचरणवाला हो, यदि वह धनुष्कोटि तीर्थका सेवन करता है, तो उसके संसारबन्धनका नाश और पुनर्जन्मका अभाव हो जाता है। जो संसारसमुद्रसे पार होना चाहता हो, उसे शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटिमें जाना चाहिये। मुनीश्वरो! तुम भी मुक्तिकी सिद्धिके लिये श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें जाओ।
विप्रवरो! इस प्रकार तुमसे मैंने सेतुतीर्थके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह अग्निष्टोम आदि यज्ञोंका पूर्ण फल पाता है। जो इसका दो बार पाठ या श्रवण करता है, वह श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो भगवान् शिवके समीप जाता है। जो तीन बार एकाग्रचित्तसे इसका पाठ या श्रवण करता है, वह शिवजीको प्रसन्न करके उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। जो बार-बार इस उत्तम माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह गिरिजापति महादेवजीका सायुज्य प्राप्त करता है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस माहात्म्यका एक श्लोक, आधा श्लोक, एक चरण, एक पद—अथवा एक अक्षर भी पढ़ता है, उसका उस दिनका किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। सेतुके मध्यमें विद्यमान अन्य तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल होता है, वह इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे प्राप्त हो जाता है। जिसके घरमें यह माहात्म्य हस्तलिखित पुस्तकके रूपमें विद्यमान है, वहाँ भूत, वेतालादिसे भय नहीं प्राप्त होता। शनैश्चर, मंगल आदि क्रूर ग्रहोंकी पीड़ा भी नहीं रहती। यह पवित्र एवं उत्तम माहात्म्य जिसके घरमें विद्यमान हो, उसके घरको रामसेतु तीर्थ जानना चाहिये। इस पुण्यदायक माहात्म्यको मठ अथवा देवालयमें पढ़ना चाहिये। नदी और सरोवरके किनारे अथवा पवित्र वनभूमि या श्रोत्रियोंके घरपर इसका पाठ करना चाहिये। विषुवयोगमें, अयनारम्भके दिन, पुण्यमय एकादशी तिथिको तथा अष्टमी और चतुर्दशीको इस माहात्म्यका विशेषरूपसे पाठ करना चाहिये। मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ही इस माहात्म्यको पढ़े तथा श्रोता भी शौच-सन्तोषादि नियमोंसे युक्त होकर ही इस उत्तम प्रसंगको सुने। यह पवित्र माहात्म्य वेदार्थोंके समावेशसे विस्तारको प्राप्त हुआ है। यह सब पापोंका नाश करनेवाला है। स्मृतिकारोंको यह मान्य है और मुनिवर व्यासजीको भी अत्यन्त प्रिय है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको इसका श्रवण और पाठ करना चाहिये। सुनानेवाले आचार्यको भी अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार जो कुछ बन सके, सुवर्ण आदि देना चाहिये; क्योंकि कथावाचकके पूजित होनेपर ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवता पूजित होते हैं और उनके पूजित होनेपर तीनों लोक पूजित हो जाते हैं। दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें भूतलपर अवतीर्ण हुए साक्षात् श्रीहरि
* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ६०१
सीता और लक्ष्मणके साथ कृपा करके इस महावाक्यके वक्ता और श्रोताओंको इहलोकमें भोग और परलोकमें मुक्ति प्रदान करते हैं।
नैमिषारण्यवासियो! तुमलोगोंने मुझसे इस वेदसम्मत गूढ़ माहात्म्यका भलीभाँति श्रवण किया। अब प्रतिदिन नियमपूर्वक रहकर आदरके साथ इस माहात्म्यको पढ़ो और अपने नियमपरायण शिष्योंको निरन्तर पढ़ाओ। ऐसा कहकर सूतजी रोमांचित शरीर होकर अपने गुरु श्रीव्यासजीका मन-ही-मन स्मरण करते हुए आँसू बहाने और नृत्य करने लगे। इसी बीचमें महाविद्वान् पराशरनन्दन महामुनि व्यास शिष्यपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वहाँ शीघ्र प्रकट हो गये। सत्यवतीनन्दन व्यासजीको वहाँ आया हुआ देख सूतजीने नैमिषारण्यवासी समस्त मुनियोंके साथ उनके चरणारविन्दोंमें दण्डकी भाँति गिरकर साष्टांग प्रणाम किया और आनन्दके आँसू बहाने लगे। चरणोंमें पड़े हुए अपने प्यारे शिष्यको व्यासजीने दोनों हाथोंसे उठाया तथा आशीर्वादसे प्रसन्न करते हुए बारंबार हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् मुनियोंके लाये हुए उत्तम आसनपर महातेजस्वी व्यासजी बैठे। उस समय उन्होंने शौनकादि मुनियोंसे कहा—'मुनिवरो! मैंने इस समय यह जान लिया था कि मेरे शिष्य सूतने तुमसे सेतुतीर्थका उत्तम माहात्म्य कहा है, जो बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। यह माहात्म्य बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। सब पुराणोंमें यही मुझे अधिक प्रिय है। धर्मराज युधिष्ठिर मेरी आज्ञा मानकर अपने पुरोहित धौम्यसे प्रतिदिन यह माहात्म्य सुनते हैं। अतः तुम भी इस उत्तम सेतु-माहात्म्यको सदा पढ़ो, सुनो और अपने शिष्योंको पढ़ाओ।' व्यासजीका यह वचन सुनकर मुनियोंने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। तदनन्तर व्यासजी भी अपने शिष्य सूतजीको साथ ले मुनियोंसे पूछकर कैलास पर्वतको चले गये।
सेतु-माहात्म्य सम्पूर्ण।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
१२. ब्राह्मखण्ड (धर्मारण्यखण्ड)
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धर्मारण्य-माहात्म्य
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धर्मकी तपस्यासे धर्मारण्यक्षेत्रकी प्रसिद्धि और उसका माहात्म्य
तर्तुं संसृतिवारिधिं त्रिजगतां नौर्नाम यस्य प्रभो-
र्यैनेदं सकलं विभाति सततं जातं स्थितं संसृतम्।
यश्चैतन्यघनप्रमाणविधुरो वेदान्तवेद्यो विभु-
स्तं वन्दे सहजप्रकाशममलं श्रीरामचन्द्रं परम्॥
दाराः पुत्रा धनं वा परिजनसहितो बन्धुवर्गः प्रियो वा
माता भ्राता पिता वा श्वशुरकुलजना भृत्य ऐश्वर्यवित्ते।
विद्या रूपं विमलभवनं यौवनं यौवतं वा
सर्वं व्यर्थं मरणसमये धर्म एकः सहायः॥
'जिन भगवान्का नाम तीनों लोकोंमें संसार-समुद्रसे पार होनेके लिये नौकारूप है, जिनसे उत्पन्न और पालित होकर यह सम्पूर्ण संसार सदैव शोभा पाता है, जो चैतन्यघनस्वरूप एवं प्रमाणसे परे हैं, वेदान्तशास्त्रके द्वारा जाननेके योग्य और सर्वत्र व्यापक हैं, उन सहज प्रकाशरूप निर्मल परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ। स्त्री, पुत्र, धन, परिजन, भाई, बन्धु, प्रिय, सुहृद्, माता, पिता, भ्राता, श्वशुर-कुलके लोग, भृत्यवर्ग, ऐश्वर्य, धन, विद्या, रूप, उज्ज्वल भवन, जवानी और युवतियोंका समुदाय—ये सभी मृत्युकालमें व्यर्थ सिद्ध होते हैं। उस समय एकमात्र धर्म ही सहायक होता है।'
एक समय सूतजीको आते हुए देख नैमिषारण्यवासी शौनक आदि महर्षियोंने बड़े हर्षसे जाकर उन्हें सब ओरसे घेर लिया। फिर जब वे सभी तपस्वी महात्मा बैठ गये, तब उनके बताये हुए आसनपर लोमहर्षणकुमार सूतजी भी विनयपूर्वक विराजमान हुए। तब उन ऋषियोंने सूतजीसे कहा—'मुने! आप पापोंका नाश करनेवाली कोई पुण्यमयी कथा कहिये।'
सूतजी बोले—मैं श्रीसरस्वतीजी, गणेशजीके तथा सम्पूर्ण देवताओंके युगल चरणारविन्दोंको नमस्कार करके और सबके नियन्ता धर्मस्वरूप परमेश्वरके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन सबके प्रसादसे तीर्थोंके उत्तम फलका वर्णन करता हूँ। एक समयकी बात है, सत्यवतीनन्दन व्यासजी राजा युधिष्ठिरके दरबारमें आये। उनके आनेका समाचार सुनकर सबको बड़ा हर्ष हुआ। भीमसेन आदि सब भाई धर्मराज युधिष्ठिरके साथ उठकर खड़े हो गये। तदनन्तर युधिष्ठिरने सामने जाकर भाइयोंसहित उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके उन्हें सिंहासनपर बिठाकर उनका कुशल-मंगल पूछा। तब धर्मज्ञ व्यासजीने उनसे पवित्र एवं दिव्य कथा सुनायी। कथाके अन्तमें राजा युधिष्ठिरने मुनिश्रेष्ठ व्याससे इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्! आपके प्रसादसे मैंने बहुत-सी उत्तम कथाएँ सुनी हैं। इस समय मैं धर्मारण्यके उत्तम माहात्म्यकी कथा सुनना चाहता हूँ।'
व्यासजीने कहा—नृपश्रेष्ठ! धर्मारण्य अनेक प्रकारके वृक्षोंसे युक्त तथा भाँति-भाँतिकी लताओं और गुल्मोंसे सुशोभित है। वह सदैव पुण्यदायक है तथा निरन्तर फलोंसे भरा रहता है। वहाँ किसीका किसीसे भी वैर नहीं होता। धर्मारण्य सर्वथा निर्भय स्थान है। वहाँ गौ और व्याघ्र, चूहे और बिलाव साथ-साथ क्रीडा करते हैं। मेढक साँपके साथ खेलता है, मनुष्य राक्षसोंके साथ विहार करते हैं। धर्मारण्य महानन्दमय, दिव्य एवं पावनसे भी पावन है। स्वर्गमें देवतालोग धर्मारण्यनिवासियोंकी प्रशंसा करते हैं।
युधिष्ठिरने पूछा—मुने! देवताओंने उस क्षेत्रका नाम धर्मारण्य कब रखा?
व्यासजी बोले—नृपश्रेष्ठ! एक समय धर्मराजने बड़ी कठिन तपस्या की। तपस्यामें लगे हुए
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०३
धर्मराजको देखकर ब्रह्मा और इन्द्र आदि सब देवता कैलास पर्वतपर गये। वहाँ भगवान् शंकर भगवती उमादेवीके साथ पारिजात वृक्षकी छायामें बैठे थे। उनके पास पहुँचकर ब्रह्माजीने इस प्रकार स्तवन किया—'नीलकण्ठ ! आपके अनन्तरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आपके इस स्वरूपका यथावत् ज्ञान किसीको नहीं है, आप कैवल्य एवं अमृतस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। देवता जिसका अन्त नहीं जानते, उन भगवान् शिवको नमस्कार है, नमस्कार है। वाणी जिनकी प्रशंसा (गुणगान) करनेमें असमर्थ है, उन चिदात्मा शिवको नमस्कार है। योगी समाधिमें निश्चल होकर अपने हृदयकमलके कोषमें जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, उन श्रीब्रह्मको नमस्कार है। जो कालसे परे, कालस्वरूप, स्वेच्छासे पुरुषरूप धारण करनेवाले, त्रिगुणस्वरूप तथा प्रकृतिरूप हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है। प्रभो ! आप भक्तजनोंपर कृपा करके स्वेच्छासे सगुण रूप धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। भगवन् ! आपके मनसे चन्द्रमा और नेत्रोंसे सूर्यकी उत्पत्ति हुई है। देव ! आप ही सब कुछ हैं, आपमें ही सबकी स्थिति है। इस लोकमें सब प्रकारकी स्तुतियोंके द्वारा स्तवन करने योग्य आप ही हैं। ईश्वर ! आपके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्वप्रपंच व्याप्त है, आपको पुनः-पुनः नमस्कार है।
इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके ब्रह्मा आदि देवता उनके आगे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। तब भगवान् शंकरने उनसे कहा—'देवताओ ! तुम क्या चाहते हो?'
**ब्रह्माजीने कहा—**सबके दुःखोंका नाश करनेवाले महादेव ! धर्मात्मा धर्मराजने बड़ी दुःसह तपस्या की है। न जाने वे देवताओंका कौन-सा उत्तम स्थान लेना चाहते हैं, यही सोचकर इन्द्र आदि सब देवता उनकी तपस्यासे थर्रा उठे हैं। देवेश ! आप उन्हें तपस्यासे उठाइये।
**महादेवजी बोले—**देवताओ ! मैं सच कहता हूँ, तुम्हें धर्मराजसे कोई भय नहीं है।
यह सुनकर सब देवता उठे और भगवान् शिवकी परिक्रमा एवं बारंबार नमस्कार करके अपने-अपने स्थानको चले गये। परंतु इन्द्रको नींद नहीं आयी, उनकी सुख-शान्ति खो गयी। वे मन-ही-मन सोचने लगे, 'मेरे लिये यह बड़ा भारी विघ्न उपस्थित हुआ। धर्मराजने मेरा इन्द्रपद हड़प लेनेके लिये ही यह अत्यन्त दुष्कर तप प्रारम्भ किया है।' ऐसा विचार करते हुए इन्द्रने देवताओंसे कहा—'मैंने बहुत क्लेश उठाकर जिसे प्राप्त किया है, उसीको धर्मराज क्या मुझसे छीन लेना चाहते हैं?' यह सुनकर बृहस्पतिजी बोले—'इनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये वहाँ उर्वशी आदि अप्सराओंको भेजा जाय।' तब इन्द्रने अप्सराओंसे कहा—'तुम सब लोग शीघ्र धर्मारण्यको जाओ और जहाँ धर्मराज दुष्कर तपस्यामें संलग्न हैं, वहाँ पहुँचकर उन्हें इस प्रकार लुभाओ, जिससे वे तपस्यासे भ्रष्ट हो जायें।' इन्द्रका यह वचन सुनकर वर्द्धिनी नामक अप्सराने कहा—'पाकशासन ! मैं देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये अपनी माया तथा रूपके बलसे पूरी चेष्टा करूँगी।' ऐसा कहकर वर्द्धिनी उस स्थानपर गयी, जहाँ धर्मराज तपस्या करते थे। वह अधिकाधिक वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित हो कपोलपर रोलीकी बेंदी और नयनोंमें काजर लगा मनोहर रूप बनाकर उनके सामने गयी और सबके मनको लुभानेवाला नृत्य करने लगी। उस समय धर्मराजका मन सहसा क्षुब्ध-सा हो उठा। राजन् ! भूतलमें नारीका योनिकुण्ड कुम्भीपाकके समान रचा गया है। वे रमणियाँ अपने नेत्ररूपी रज्जुसे दृढ़तापूर्वक बाँधकर मनस्वी पुरुषोंको नीचा दिखाती हैं। अज्ञानी पुरुषको अपने कुचरूपी महादण्डोंसे ताड़ित करके अचेत कर देतीं और शीघ्र ही उसे नरकमें गिरा देती हैं। तबतक ही मनकी स्थिरता, शास्त्रज्ञान तथा
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सत्य आदि गुण सुरक्षित रहते हैं, जबतक कि सचेत पुरुषोंके आगे बिछाये हुए जालकी भाँति रूप-यौवनके मदसे मतवाली युवती नहीं आती है। तभीतक तपस्याकी वृद्धि होती है, तभीतक दान, दया और इन्द्रियसंयम सूझते हैं तथा तभीतक स्वाध्याय, सदाचार, पवित्रता, धैर्य और व्रतकी रक्षा होती है, जबतक कि मनुष्य भयभीत हरिणीकी भाँति चंचल लोचनोंवाली चपला तरुणीको नेत्रोंसे नहीं देखता है।
वर्द्धिनीने धर्मराजसे पूछा—प्रभो! समस्त चराचर जगत् धर्ममें ही स्थित है। वही साक्षात् धर्मरूप होकर आप यह दुष्कर तप क्यों कर रहे हैं?
यमराजने कहा—भामिनि! मैं भगवान् महेश्वरके स्वरूपका दर्शन करना चाहता हूँ। इसीलिये कठिन तपस्या कर रहा हूँ।
वर्द्धिनी बोली—धर्म! इस तपस्याके ही कारण इन्द्र आपसे भयभीत हो गये हैं। उन्हींसे प्रेरित होकर मैं यहाँ आपकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये आयी हूँ।
वर्द्धिनीके इस सत्य भाषणसे सूर्यनन्दन यम बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने वर्द्धिनीसे इस प्रकार कहा—'मैं समस्त पापकर्म दुष्टात्मा प्राणियोंके लिये यमराज हूँ और सभी जितेन्द्रिय मनुष्योंके लिये धर्मस्वरूप हूँ। वही मैं तुम्हें दुर्लभ वर देता हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'
वर्द्धिनी बोली—धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ! मुझे लोकोंके हितके लिये इन्द्रलोकमें स्थिरतापूर्वक निवास प्रदान कीजिये।
यमराजने कहा—'एवमस्तु'। अब तुम शीघ्रतापूर्वक कोई दूसरा वर और माँगो।
वर्द्धिनी बोली—महामते! इस महाक्षेत्रमें इसी स्थानपर मेरे नामसे एक प्रसिद्ध तीर्थ हो, जो सब पापोंका नाश करनेवाला हो। उसमें किया हुआ दान, होम, तप और स्वाध्याय अक्षय हो।
'तथास्तु' कहकर भगवान् धर्मराज चुप हो गये। तब वर्द्धिनीने उनकी तीन बार परिक्रमा करके मस्तक नवाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। वहाँ जाकर वह देवराज इन्द्रसे इस प्रकार बोली—'देवेश! आप सूर्यनन्दन यमसे भय न कीजिये। वे यशके लिये तपस्या कर रहे हैं।' इतना कहकर वह इन्द्रको प्रणाम करके अपने स्थानको चली गयी। तदनन्तर धर्मराज विधिपूर्वक तपस्यामें स्थित हो गये। उनकी घोर तपस्या देखकर देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शंकर वृषभपर आरूढ़ हो अस्त्र-शस्त्र एवं सुन्दर कवच धारण करके उस स्थानको गये, जहाँ धर्मराज तपस्यामें स्थित थे। वहाँ पहुँचकर महादेवजी बोले—'धर्म! तुम्हारी इस तपस्यासे मेरा चित्त बहुत सन्तुष्ट है। तुम कोई वर माँगो, वर माँगो, वर माँगो।'
इस प्रकार सम्भाषण करते हुए भगवान् महेश्वरको देखकर धर्मराज बाँबीसे उठकर खड़े हो गये और दोनों हाथ जोड़कर शुद्ध वचनोंद्वारा उन्होंने लोकनाथ शिवका इस प्रकार स्तवन किया—'भगवन्! आप सबपर शासन करनेवाले ईश्वर हैं, आपको नमस्कार है। योगरूपी आप परमेश्वरको
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०५
नमस्कार है। नीलकण्ठ ! आपका स्वरूप तेजोमय है, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ध्यान करनेवाले मनुष्य आपके स्वरूपका जिस प्रकार चिन्तन करते हैं, उसके अनुरूप ही विग्रह धारण करके आप प्रकट होते हैं, आपको नमस्कार है। केवल भक्तिभावसे प्राप्त होनेवाले आप प्रभुको नमस्कार है। ब्रह्माजीके रूपमें आपको नमस्कार है। विष्णुरूपधारी प्रभो! आपको नमस्कार है। आप ही स्थूल और सूक्ष्म जगत् हैं, आपको नमस्कार है। अणुरूपधारी आपको नमस्कार है। कामरूपमें प्रकट हुए अथवा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप ही सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप नित्य, सौम्य, मृड (सुखस्वरूप) एवं श्रीहरि हैं, आपको बारंबार नमस्कार है, आप ही सब ओरसे तपानेवाले सूर्य तथा शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सृष्टिस्वरूप ! आपको नमस्कार है। लोकपाल ! आपको नमस्कार है। आप रुद्र, भीम एवं शान्तस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आपके रूप अनन्त हैं, आप सम्पूर्ण विश्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। चन्द्रशेखर ! आपके सब अंगोंमें भस्म लगा हुआ है, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आपके पाँच मुख एवं तीन नेत्र हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। सर्प आपके आभूषण हैं तथा आप दिशाओंको ही वस्त्रके रूपमें धारण करते हैं, आप अन्धकासुरका विनाश करनेवाले और दक्षके पापको हर लेनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। त्रिपुरारे ! आपने कामदेवको भस्म किया है, आपको नमस्कार है। मेरे द्वारा कहे हुए इन चालीस नामोंका जो पाठ करे और पवित्र होकर तीनों काल इसको पढ़े अथवा सुने, वह सब पापोंसे छूटकर कैलाशधामको जाय।'
इस प्रकार धर्मराजने प्रणाम करके जब बड़ी भक्तिसे भगवान् शिवका स्तवन किया, तब शिवजीने कहा—'महाभाग ! तुम्हारे मनमें जो कोई अभिलाषा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो।'
यमराजने कहा—देव! शंकर! यदि मुझे आप मनोवांछित वर देते हैं तो इस महाक्षेत्रमें आप मेरे नामसे प्रसिद्ध होकर निवास कीजिये। यह स्थान धर्मारण्यके नामसे तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि प्राप्त करे।
महादेवजी बोले—धर्मराज ! यह स्थान प्रत्येक युगमें सदा धर्मारण्यके नामसे विख्यात होगा। तुम्हारे मनमें और भी कोई इच्छा हो तो बताओ, उसे भी पूर्ण करूँगा।
धर्मराजने कहा—भगवन् ! दो योजन विस्तारवाला यह उत्तम स्थान मेरे नामसे प्रसिद्ध तीर्थ हो। यह समस्त देहधारियोंके लिये पावन एवं सनातन मोक्षस्थान हो।
महादेवजी बोले—'एवमस्तु' एक अंशसे इस तीर्थमें मेरी भी स्थिति होगी। तुम्हारे इस निर्मल स्थानको मैं कभी नहीं छोडूंगा। यहाँ मेरे नामसे विश्वेश्वर नामक महालिंग प्रकट होगा।
ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् वहाँ एक अद्भुत लिंग प्रकट हुआ। धर्मके द्वारा स्थापित किया हुआ वह लिंग धर्मेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका स्मरण और पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मराजने वहींपर एक धर्मवापीका निर्माण किया, जो बड़ी मनोरम है। उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य व्याधिदोषके नाश और क्लेशकी शान्तिके लिये उस धर्मवापीमें स्नान करके यमतर्पण करता है, उसको कोई उपद्रव नहीं होता। अँतरिया, तिजारी, चार दिनोंपर होनेवाला ज्वर, किसी नियत समयपर होनेवाला ज्वर तथा शीतज्वर आदि जितने भी रोग हैं, सभी उस मनुष्यको पीड़ा नहीं देते। जो मानव उस परम पुण्यमयी
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धर्मवापीमें स्नान करके शमीके पत्तेके बराबर भी पिण्डदान करता है, वह गर्भवासको नहीं प्राप्त होता है तथा महाभयंकर कुम्भीपाक, रौरव एवं अन्धतामिस्र आदि नरकसे भी छुटकारा पा जाता है। धर्मवापीमें तर्पण करनेसे बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, आज्यप और सोमप नामवाले पितर उत्तम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। जो मायासे मोहित होकर इस क्षेत्रमें अत्यन्त दूषित परस्त्रीगमन तथा सुवर्णकी चोरी आदि पाप करते हैं, वे सभी नरकमें पड़ते हैं। दूसरे क्षेत्रमें किया हुआ पाप धर्मारण्यमें नष्ट होता है; किंतु धर्मारण्यमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है। पुण्य, पाप या जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म होता है, वह सब सौ वर्षतक यहाँ नित्य बढ़ता रहता है। मनमें कामना रखनेवालोंके लिये यह पवित्र तीर्थ कामदायक है, योगियोंके लिये मुक्तिदायक है तथा सिद्धोंके लिये सदैव सिद्धिदायक बताया गया है।
सदाचार—शौच, स्नान, सन्ध्या, तर्पण, बलिवैश्वदेव आदिका महत्त्व
व्यासजी कहते हैं—धर्मारण्यमें शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुए अठारह हजार ब्राह्मण रहते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवजीके द्वारा उत्पन्न किये गये हैं। वे सभी सदाचारी, पवित्र तथा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। चार प्रकारके जीवोंमें प्राणधारी अति उत्तम हैं। प्राणधारियोंमें भी जो बुद्धिजीवी हैं, वे सभी श्रेष्ठ माने गये हैं। बुद्धिजीवी प्राणियोंमें भी मनुष्य श्रेष्ठ हैं। मनुष्योंसे भी ब्राह्मण, उनसे भी विद्वान्, विद्वानोंसे भी पवित्र बुद्धिवाले, उनसे भी कर्मठ, कर्मठोंसे भी ब्रह्मपरायण पुरुष सबसे श्रेष्ठ है। युधिष्ठिर ! ब्रह्मपरायण पुरुषोंसे श्रेष्ठ तीनों लोकोंमें कोई नहीं है। ब्रह्माजीने ब्राह्मणको सब प्राणियोंका स्वामी बनाया है। इसलिये संसारमें जो कुछ है, सबका योग्य अधिकारी ब्राह्मण ही है। सदाचारी ब्राह्मण ही सब कार्यों एवं अधिकारोंके योग्य होता है। जो आचारसे भ्रष्ट हो गया है, वह योग्य नहीं है। इसलिये ब्राह्मणको सदा आचारवान् होना चाहिये। राग और द्वेषसे रहित उत्तम बुद्धिवाले महापुरुष जिसका पालन करते हैं, उसीको विद्वानोंने धर्ममूलक सदाचार कहा है। जो अच्छे लक्षणोंसे हीन है, उस मनुष्यको भी चाहिये कि वह श्रद्धालु एवं अदोषदर्शी होकर भलीभाँति सदाचारका पालन करे; ऐसा करनेसे वह सौ वर्षोंतक (आयुभर) जीवित रह सकता है। अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें वेदों और स्मृतियोंद्वारा प्रतिपादित धर्ममूलक सदाचारका आलस्य छोड़कर सेवन करे। दुराचारी मनुष्य संसारमें निन्दनीय होता है। साथ ही वह अनेक प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हो अल्पायु तथा सदैव अतिशय दुःखका भागी होता है। जिस कर्मके करते समय अन्तरात्मामें सहज प्रसाद—निर्मलताका उदय होता है, उसी कर्मको करना चाहिये। इसके विपरीत कर्म कभी न करे। धर्मकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको यम-नियमोंके पालनके लिये ही विशेष यत्न करना चाहिये। सत्य, क्षमा, सरलता, ध्यान, क्रूरताका अभाव, हिंसाका सर्वथा त्याग, मन और इन्द्रियोंका संयम, सदा प्रसन्न रहना, मधुर बर्ताव करना और सबके प्रति कोमल भाव रखना—ये दस ‘यम’ कहे गये हैं। शौच, स्नान, तप, दान, मौन, यज्ञ, स्वाध्याय, व्रत, उपवास और उपस्थ-इन्द्रियका दमन—ये दस ‘नियम’ बताये गये हैं*। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और मात्सर्य—इन
* सत्यं क्षमाऽऽर्जवं ध्यानमानृशंस्यमहिंसनम्। दमः प्रसादो माधुर्यं मृदुतेति यमा दश॥
शौचं स्नानं तपो दानं मौनेज्याध्ययनं व्रतम्। उपोषणोपस्थदण्डौ दशैते नियमाः स्मृताः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। १९-२१)
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०७
छः वैरियोँको जीतकर मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। दूसरोंको कष्ट न देते हुए परलोकमें सहायता देनेवाले धर्मका धीरे-धीरे संग्रह करे। यदि धर्मकी भलीभाँति रक्षा की जाय तो वही परलोकमें सहायक होता है। पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बन्धुजनोंसे भी बढ़कर मनुष्यका सहायक धर्म ही है। जीव अकेला ही जन्म लेता, अकेला मरता, अकेला पुण्य भोगता और अकेला ही पापका उपभोग करता है। मृत्यु हो जानेपर इस शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी भाँति त्यागकर भाई-बन्धु मुँह फेर लेते हैं। परलोकमें जाते हुए जीवके साथ केवल उसका धर्म ही जाता है*। अतः धर्मका संग्रह अवश्य करे। धर्म ही इस लोक और परलोकमें सहायक होता है। धर्मकी सहायता पाकर जीव नरकके दुस्तर अन्धकारसे पार हो जाता है। बुद्धिमान् पुरुष सदा उत्तम-उत्तम पुरुषोंके साथ सम्बन्ध जोड़े। अधम कोटिके मनुष्योंका संग छोड़कर अपने कुलको उन्नतिशील बनावे। सद्धर्मके पालनसे ब्राह्मण श्रेष्ठताको प्राप्त होता है। जो स्वाध्याय नहीं करता, सदाचारका उल्लंघन करता है, आलसी और दूषित अन्न खानेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको यमराज कष्ट देते हैं। अतः ब्राह्मण प्रयत्नपूर्वक सदाचारका पालन करे।
रात्रिके अन्तमें आधे पहरका समय ब्राह्ममुहूर्त कहलाता है। उस समय उठकर विद्वान् पुरुष सर्वदा अपने हितका चिन्तन करे। फिर गणेश, शिव, पार्वती, श्रीरंग (विष्णु), लक्ष्मी, ब्रह्मा, इन्द्रादि देवता, वसिष्ठ आदि मुनि, गंगा आदि नदी, श्रीशैल आदि पर्वत, क्षीरसागर आदि समुद्र, मानसरोवर आदि तड़ाग, कामधेनु आदि गौ तथा प्रह्लाद आदि भगवद्भक्त पुरुषोंका स्मरण करे। माताके चरण सब तीर्थोंसे भी अधिक उत्तम हैं, अतः उनका स्मरण करके पिता और गुरुका भी हृदयमें ध्यान करे। तत्पश्चात् आवश्यक कार्य (शौच आदि) करनेके लिये नैर्ऋत्य कोणकी ओर जाय। गाँवसे सौ धनुष दूर जाना चाहिये और नगरसे चार सौ धनुष। वहाँ तिनकेसे पृथ्वीको आच्छादित करके अपने मस्तकको भी कपड़ेसे अच्छी तरह ढक ले। यज्ञोपवीतको कानपर चढ़ाकर उत्तरकी ओर मुँह किये हुए मौनभावसे बैठकर मल-मूत्रका त्याग करे। उत्तराभिमुख बैठनेका नियम दिनमें और दोनों सन्ध्याओंके समय है। रात्रिमें शौच आदिके लिये दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके बैठना चाहिये। खड़े होकर मल-मूत्रका त्याग न करे। इस कार्यमें जल्दबाजी भी न करे। ब्राह्मण, गौ, अग्नि तथा आती हुई वायुकी ओर मुँह करके भी शौचके लिये न बैठे। फालसे जोती हुई भूमिमें, सड़कपर और उठने-बैठनेके योग्य भूमिमें मल-मूत्रका त्याग न करे। मलोत्सर्गके समय चारों दिशाओंकी ओर न देखे। ग्रह और नक्षत्रोंकी ओर दृष्टि न डाले। ऊपर आकाशकी ओर न ताके। मलकी ओर भी दृष्टिपात न करे। मलत्यागके पश्चात् मनुष्य कंकड़ आदिसे रहित चिकनी मिट्टी ले। वह मिट्टी चूहोंकी खोदी हुई या शौचसे बची हुई या केश आदिसे मिली हुई नहीं होनी चाहिये। बायें हाथसे गुदामें एक बार मिट्टी लगाकर उसे जलसे धो डाले। इसी प्रकार पाँच बार मिट्टी लगाकर गुदाको धोये। एक-एक बार दोनों पैरोंमें मिट्टी लगाकर धोये और दोनों हाथोंको तीन-तीन बार मृत्तिकालेपनपूर्वक धोये। गृहस्थ पुरुष इसी प्रकार शौचकी शुद्धि करे।
* जायते चैकलः प्राणी म्रियते च तथैकलः। एकलः सुकृतं भुङ्क्ते भुङ्क्ते दुष्कृतमेकलः॥
देहे पञ्चत्वमापन्ने त्यक्त्वैकं काष्ठलोष्टवत्। बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मो यान्तमनुव्रजेत्॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। २४-२६)
| ६०८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|---|
| जबतक मलका लेप और दुर्गन्ध मिट न जाय, | तदनन्तर धर्मशास्त्रोंमें बताये हुए नियमोंके अनुसार |
| तबतक उसे धोना ही चाहिये। ब्रह्मचर्य आदि | दन्तधावन करे; क्योंकि आचमन करनेवाला |
| तीन आश्रमोंमें क्रमशः दुगुने शौचका विधान है। | मनुष्य भी यदि दन्तधावन न करे तो वह |
| दिनमें जो शौचका विधान है, उससे आधा रात्रिमें | अपवित्र ही माना गया है। प्रतिपदा, अमावास्या, |
| करना चाहिये। पराये गाँवमें उससे आधा और | षष्ठी, नवमी तथा रविवारको काठकी दाँतन |
| मार्गमें उससे भी आधे शौचका विधान है। | न करे। जिस दिन दाँतन निषिद्ध है, उस दिन |
| रोगीके लिये उससे भी आधे शौचका नियम | मुखकी शुद्धिके लिये बारह बार कुल्ला करना |
| है। परंतु जब मनुष्य स्वस्थ हो जाय, तब | चाहिये। कनिष्ठा अंगुलीके बराबर मोटी, बारह |
| शौचसम्बन्धी नियमोंके पूर्ण पालनमें कमी न | अंगुल लंबी, हरी, गीली लकड़ी, जिसका |
| करे। हाथ-पैरोंकी शुद्धिके पश्चात् मनुष्य पवित्र | छिलका उतारा न गया हो तथा जिसमें छेद |
| भूमिमें बैठकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके | या रोग न हो, दाँतनके लिये उपयुक्त मानी |
| जलसे कुल्ला करे। उस जलमें भूसी, कोयला, | गयी है। दन्तधावनके काष्ठका अग्रभाग एक |
| अस्थि एवं भस्मका संसर्ग नहीं रहना चाहिये। | अंगुलतक चबाना चाहिये फिर उसीके कूँचेसे |
| अत्यन्त शुद्ध एवं स्वच्छ जलसे आचमन करे। | दाँतोंको रगड़कर साफ करना और जलसे कुल्ला |
| आचमनमें इतना जल पीये कि वह हृदयतक | करना चाहिये। शरीरशुद्धिके लिये प्रातःकाल |
| पहुँच सके। इस कार्यमें जल्दी नहीं करनी | स्नान करना चाहिये। यदि तीर्थ (तालाब या |
| चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे। आचमनके | नदी)-का जल मिल जाय तो विशेष उत्तम है। |
| लिये जल लेते समय उसे भलीभाँति दृष्टि | शरीरके नौ छिद्रोंसे दिन-रात मल निकलता |
| डालकर देख ले। वह पवित्र हो तभी उसका | रहता है, अतः वह सदा मलिन है। प्रातःकाल |
| उपयोग करे। यदि दोनों पैरोंको न धोये तो | स्नान करनेसे इसकी शुद्धि होती है। प्रातःकालका |
| आचमन करनेपर भी मनुष्य अशुद्ध ही माना | स्नान प्राजापत्य व्रतके समान पापनाशक माना |
| जाता है। अपनी शुद्धिके लिये मनुष्य तीन बार | गया है। वह उत्साह, मेधा, सौभाग्य, रूप तथा |
| जल पीकर आँख, कान आदि इन्द्रियछिद्रोंका | सम्पदाको बढ़ानेवाला है। वह दरिद्रता, पाप, |
| स्पर्शद्वारा शुद्ध करे। अंगूठेके मूल भागसे अपने | ग्लानि, अपवित्रता और दुःस्वप्नका नाश करनेवाला |
| ओठोंको पोंछे, जलसे हृदयका स्पर्श करके | है तथा तुष्टि और पुष्टि प्रदान करनेवाला है। |
| समस्त अंगुलियोंसे मस्तकका स्पर्श करे। जलसहित | नृपश्रेष्ठ! अब मैं प्रसंगवश स्नानकी विधिका |
| अंगुलियोंके अग्रभागसे दोनों कन्धोंका स्पर्श | वर्णन करता हूँ; क्योंकि विद्वानोंने विधिपूर्वक |
| करे। सड़क या गलीमें घूम आनेपर आचमन | किये हुए स्नानका महत्त्व साधारण स्नानसे |
| किया हुआ मनुष्य भी फिर आचमन करे। स्नान, | सौगुना अधिक बताया है। विशुद्ध कुशा लेकर |
| भोजन और जलपान करनेपर, शुभ कर्मके | पवित्र स्थानपर रखे और आचमन करके स्नान |
| प्रारम्भमें, सोकर उठनेपर, वस्त्र बदलने या नूतन | करे। हाथमें कुश लेकर, शिखा बाँधकर जलके |
| वस्त्र धारण करनेपर, कोई अमांगलिक वस्तु | भीतर प्रवेश करे और अपनी शाखामें बतायी |
| दीख जानेपर अथवा भूलसे किसी अपवित्र | हुई विधिके अनुसार विधिपूर्वक स्नान करे। इस |
| वस्तुको छू लेने या उसकी याद कर लेनेपर | प्रकार स्नानकार्य समाप्त करके वस्त्र निचोड़कर |
| दो बार आचमन करनेसे मनुष्य शुद्ध होता है। | दो नूतन वस्त्र धारण करे। फिर आचमन करके |
| * ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * | ६०९ |
|---|
कुश हाथमें लिये हुए ही प्रातःकालकी सन्ध्या करे। अपने मनको दृढ़तापूर्वक संयममें रखकर प्राणायाम करनेवाला ब्राह्मण दिन और रातमें किये हुए पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। यदि मनको संयममें रखकर दस या बारह बार प्राणायाम कर लिये जायँ तो ऐसा मानना चाहिये कि उस पुरुषने बड़ी भारी तपस्या कर ली। व्याहृति और प्रणवके साथ किये हुए सोलह प्राणायाम यदि प्रतिदिन होते रहें तो एक मासमें वे भ्रूणहत्या करनेवाले पापीको भी पवित्र कर देते हैं। जैसे पार्थिव धातुओंका मल आगमें तपानेसे जल जाता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंद्वारा किये हुए दोष प्राणायामसे भस्म हो जाते हैं। नृपश्रेष्ठ! प्रणव परब्रह्म है। प्राणायाम उत्तम तपस्या है और गायत्रीसे बढ़कर दूसरा कोई पवित्र करनेवाला मन्त्र नहीं है। मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा रातमें जो पाप करता है, वह प्रातःसन्ध्याकी उपासना करते हुए प्राणायामोंके द्वारा शुद्ध कर देता है। इसी प्रकार मन, वाणी और क्रियाद्वारा दिनमें जो पाप करता है, उसे सायंकालकी सन्ध्योपासनामें प्राणायामोंके द्वारा नष्ट कर डालता है। सायंकालकी सन्ध्या करनेवाला पुरुष दिनमें किये हुए पापका नाश करता है। जो प्रातःकाल और सायंकालकी सन्ध्या नहीं करता, वह समस्त ब्राह्मणोचित कर्मोंसे शूद्रकी भाँति बाहर कर देने योग्य है*।
प्राणायामके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। फिर 'आपो हिष्ठा मयो भुवः' इत्यादि तीन ऋचाओंद्वारा मार्जन करे। पृथ्वीपर, मस्तकपर, आकाशमें, आकाशमें, पृथ्वीपर, मस्तकपर, मस्तकपर, आकाशमें तथा भूमिपर—इस तरह नौ बार नौ स्थानोंमें जल छिड़कना चाहिये। यहाँ भूमि या पृथ्वी शब्दसे दोनों चरण लिये गये हैं। आकाशका अर्थ हृदय माना गया है। सिर या मस्तक शब्द अपने प्रसिद्ध अर्थमें ही है। इस प्रकार इन्हीं अंगोंका मार्जन उक्त मन्त्रोंद्वारा बताया गया है। स्नान छः प्रकारके होते हैं—वारुण स्नान (जलसे किया हुआ स्नान), आग्नेय स्नान (अग्निकी लपटोंसे अपने अंगोंको तपाना या सर्वांगसे धूप-सेवन करना), वायव्य स्नान (स्वच्छ वायुका सेवन), ऐन्द्र स्नान (वर्षाके जलसे नहाना), मन्त्र स्नान (मन्त्रोच्चारण और श्रवणसे अपनेको शुद्ध करना) तथा ब्राह्म स्नान (वेद-मन्त्रोंद्वारा मार्जन या अभिषेक)। इनमें पूर्वोक्त सभी स्नानोंकी अपेक्षा यह ब्राह्म-स्नान (मार्जन) अधिक उत्तम है। जो ब्राह्म-स्नानकी विधिसे स्नान करता है, वह बाहर और भीतरसे भी शुद्ध हो जाता है तथा सर्वत्र देवपूजा आदि कर्मोंमें सम्मिलित होनेकी योग्यता प्राप्त कर लेता है; क्योंकि इससे अन्तःशुद्धि एवं भावशुद्धि हो जाती है। केवल जलस्नानसे ही कोई परम शुद्ध नहीं माना जाता। जो भावसे दूषित हैं, वे सैकड़ों बार स्नान करके भी शुद्ध नहीं होते। जिसका चित्त निर्मल है, उसीने सब तीर्थोंमें स्नान किया है, वही सब प्रकारके मलोंसे रहित है और उसीने सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया है।
चित्त जिस प्रकार निर्मल होता है, वह
* एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः। गायत्र्यास्तु परं नास्ति पावनं च नृपोत्तम ॥
कर्मणा मनसा वाचा यद्रात्रौ कुरुते त्वघम्। उत्तिष्ठन् पूर्वसन्ध्यायां प्राणायामैर्विशोधयेत् ॥
यदह्ना कुरुते पापं मनोवाक्कायकर्मभिः। आसीनः पश्चिमां सन्ध्यां प्राणायामैर्व्यपोहति ॥
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम्। नोपतिष्ठेत्तु यः पूर्वा नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम् ॥
स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः।
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। ७३–७६)
६१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बतलाता हूँ, सुनो। यदि भगवान् विश्वनाथ प्रसन्न हो जायें तो चित्त शुद्ध होता है। अतएव चित्तकी शुद्धिके लिये काशीपति विश्वनाथकी शरण लेनी चाहिये। जो ऐसा करता है, वह इस शरीरका त्याग करनेके बाद परब्रह्मको प्राप्त होता है। पूर्वोक्त मार्जन करनेके अनन्तर 'द्रुपदादिव मुमुचानः०' इत्यादि मन्त्रका जप करते हुए जलको अभिमन्त्रित करे और उस जलको सिरपर छिड़क ले। उसके बाद हाथमें जल लेकर विधिज्ञ पुरुष 'ऋतञ्च सत्यञ्च०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अघमर्षण करे। जो विद्वान् जलमें गोता लगाकर तीन बार अघमर्षण मन्त्रका जप करता है अथवा स्थलमें भी बैठकर हाथमें जल ले अघमर्षण मन्त्रका जप करता है, उसकी पापराशि उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार। अघमर्षणके पश्चात् प्रणव तथा महाव्याहृतिके साथ गायत्री-मन्त्रका जप करते हुए खड़ा होकर सूर्यके लिये तीन अंजलि जल दे। वह जल वज्रके समान होकर उन्हें प्राप्त होता है और उसके द्वारा मन्देह नामक राक्षस शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, जो कि पर्वताकार शरीर धारण करके सूर्यके तेजको आच्छादित किया करते हैं। प्रातःकाल गायत्री-जप करते हुए तबतक खड़ा रहे, जबतक कि सूर्यका दर्शन न हो जाय। इसी प्रकार सायंकालमें बैठकर तबतक गायत्री-जप करना चाहिये, जबतक नक्षत्रोंका दर्शन न होने लगे। अपना हित चाहनेवाले द्विजको सन्ध्योपासनाके कालका लोप नहीं करना चाहिये। जब सूर्यका आधा उदय या आधा अस्त हुआ हो, उस समय उनके लिये अंजलिका वज्रोदक डालना चाहिये। विधिपूर्वक की हुई सन्ध्या भी समय बिताकर करनेसे निष्फल हो जाती है*। बायाँ हाथ जलमें डालकर द्विजोंद्वारा जो सन्ध्या की जाती है, वह वृषली (शूद्रा) जानने योग्य है। वह राक्षसगणोंको आनन्द देनेवाली मानी गयी है। सूर्यार्घ्य देनेके पश्चात् अपनी शाखामें बतायी हुई विधिके अनुसार सूर्यका उपस्थान करे। एक हजार अथवा एक सौ अथवा दस बार गायत्री-मन्त्रके जपद्वारा सूर्योपस्थान करना चाहिये। जो अधिक-से-अधिक एक हजार, मध्यम श्रेणीमें एक सौ अथवा कम-से-कम दस बार प्रतिदिन, गायत्रीमन्त्रका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता। लाल चन्दनमिश्रित जल, फूल और कुशोंके द्वारा वेदोक्त अथवा आगमोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये†। जिसने भगवान् सूर्यदेवका पूजन किया, उसने तीनों लोकोंकी पूजा कर ली। भगवान् सूर्य पूजित होनेपर पुत्र, पशु और धन देते हैं, रोग हर लेते हैं, पूरी आयु देते हैं और मनोवांछित कामनाओंको पूर्ण करते हैं।
इस प्रकार सन्ध्योपासना पूर्ण होनेपर अपनी शाखामें कही हुई विधिके अनुसार चन्दन, अगरु, कपूर, सुगन्धित पुष्प एवं शुद्ध जलसे 'तृप्यन्तु' का उच्चारण करते हुए ब्रह्मा आदि देवताओं, मरीचि आदि मुनियों तथा अन्य ऋषि, देवता और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। निवीती होकर अर्थात् यज्ञोपवीतको गलेमें मालाकी भाँति करके सनकादि मनुष्योंका जौ मिले हुए जलसे तर्पण करे। यह तर्पण सीधे एवं उत्तराग्र कुशद्वारा प्राजापत्य तीर्थसे होना चाहिये। फिर प्राचीनावीती होकर अर्थात् जनेऊको दाहिने कंधेपर करके
* विधिनापि कृता सन्ध्या कालातीताऽफला भवेत्। (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५।९४)
† रक्तचन्दनमिश्राभिरद्भिश्च कुसुमैः कुशैः। वेदोक्तैरागमरोक्तैर्वा मन्त्रैरर्घ्यं प्रदापयेत्॥ (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५।९८-९९)
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य *
६११
दुहरे मुड़े हुए कुशों एवं तिलमिश्रित जलसे पितृतीर्थसे कव्यवाट्, अनल आदि दिव्य पितरोंका तर्पण करे। रविवार, शुक्ल पक्षकी त्रयोदशी, सप्तमी तिथि, रात्रि एवं दोनों सन्ध्याकालमें कल्याणकी इच्छा रखनेवाला ब्राह्मण कभी तिलसे तर्पण न करे। यदि करना ही पड़े तो सफेद तिलोंसे ही तर्पण करे। तत्पश्चात् चौदह यमोंके नामोंका उच्चारण करते हुए उनके लिये तर्पण करे। यमतर्पणके बाद अपना बायाँ घुटना जमीनपर रखकर मौन हो अपने गोत्रका उच्चारण करते हुए अपने पितरोंका पितृतीर्थसे प्रसन्नतापूर्वक तर्पण करे। तर्पणमें देवता एक-एक अंजलि, सनकादि दो-दो अंजलि तथा पितर तीन-तीन अंजलि जल चाहते हैं। पितृवर्गमें जो स्त्रियाँ हैं, वे एक-एक अंजलि जलकी ही इच्छा रखती हैं। अंगुलियोंका अग्रभाग देवतीर्थ है; अंगुलियोंका मूलभाग ऋषितीर्थ है; अंगूठेके मूलमें ब्राह्मतीर्थ है और हाथके बीचमें प्रजापतितीर्थ है। अंगुष्ठ और तर्जनीके बीचके भागको पितृतीर्थ कहते हैं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त जो भी देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर, पिता, माता, मातामह आदि हैं, वे सब तृप्त हों—ऐसा कहकर अथवा और भी जो वैदिक या पौराणिक मन्त्र हैं, उनका उच्चारण करके पितरोंका सांग तर्पण करना चाहिये। वह पितरोंको सुख देनेवाला है।
तत्पश्चात् अग्निहोत्र करके वेदाभ्यास करना चाहिये। वेदाभ्यास पाँच प्रकारसे किया जाता है—(१) स्वीकार (गुरुसे ग्रहण), (२) अर्थ-विचार, (३) मन्त्र-पाठका अभ्यास, (४) जप (वेदानुसार आचरण) और (५) शिष्योंको पढ़ाना। प्राप्तकी रक्षा और अप्राप्तकी प्राप्तिके लिये यह द्विजातियोंका प्रातःकालिक कृत्य बताया गया है। अथवा प्रातःकाल उठकर शौचादि आवश्यक कार्योंसे निवृत्त हो हाथ-पैरोंकी शुद्धि एवं आचमन करके दन्तधावन करे। सारे शरीरकी शुद्धि करके प्रातःसन्ध्या करे। वेदार्थोंका विचार करे। नाना प्रकारके शास्त्रोंको पढ़े और अपने हितमें लगे हुए पवित्र एवं बुद्धिमान् शिष्योंको पढ़ावे तथा योग-क्षेम आदिकी सिद्धिके लिये परमेश्वरकी शरण ले। तत्पश्चात् मध्याह्नकालके नियमोंकी सिद्धिके लिये पुनः पूर्वोक्त रीतिसे स्नान करे, स्नान करके मध्याह्न-सन्ध्या करे। देवताकी पूजा करके नैमित्तिक कृत्योंका पालन करे। अग्निको प्रज्वलित करके बलिवैश्वदेव करे। निष्पाव, कोदो, उड़द, मटर और चनाका वैश्वदेव-होममें त्याग करे। तेलका पका, बिना पका तथा नमक मिलाया हुआ सब अन्न छोड़ दे। अरहर, मसूर, गोलधान्यसे बना हुआ भोजन, दूसरोंके खानेसे बचा हुआ भोजन अथवा बासी अन्नको भी वैश्वदेव-होममें त्याग दे। हाथमें कुश धारण करके आचमन और प्राणायाम करे। फिर 'पृष्टो दिवि०' इत्यादि मन्त्रसे दो बार अग्निका पर्युक्षण करके कुशास्तरण करे। फिर वैदिक मन्त्रसे अग्निको अपने अभिमुख करके गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिके द्वारा पूजा करे। फिर अपनी शाखामें बतायी हुई विधिके अनुसार विद्वान् पुरुष होम करे। राह चलनेवाला पथिक, जिसकी जीविका नष्ट हो गयी हो ऐसा पुरुष, विद्यार्थी, गुरुका पालन-पोषण करनेवाला पुरुष, संन्यासी और ब्रह्मचारी—ये छः धर्मभिक्षुक माने गये हैं*। चाण्डाल और कुत्तेको भी दिया हुआ अन्न निष्फल नहीं होता। अतः अन्नकी याचना करनेके लिये कोई आवे तो उसके अपाय होनेका विचार नहीं करना चाहिये। कुत्ते, पतित, चाण्डाल, पापरोगी, काक और कीड़ोंके लिये घरसे बाहर पृथ्वीपर अन्न डाल देना चाहिये। कौओंको
* अध्वगः क्षीणवृत्तिश्च विद्यार्थी गुरुपोषकः। यतिश्च ब्रह्मचारी च षडेते धर्मभिक्षुकाः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। १२६)
६१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अन्नका भाग देते हुए इस प्रकार कहना चाहिये— 'पूर्व, पश्चिम, उत्तर, वायव्य और नैर्ऋत्य कोणमें रहनेवाले जो कौए हैं, वे सब भूमिपर मेरे द्वारा समर्पित किये हुए अन्नके ग्रासको ग्रहण करें।' इस प्रकार पंचभूतोंके लिये बलि अर्पण करके जितनी देरमें गाय दुही जाती है, उतनी देरतक किसी अतिथिके आनेकी राह देखे। यदि कोई आ जाय तो उसे भोजन देनेके लिये रसोईघरमें प्रवेश करे। काकबलि न करके नित्यश्राद्ध करे। नित्यश्राद्धमें अपनी शक्तिके अनुसार तीन, दो अथवा एक ब्राह्मणको भोजन करावे। पितृयज्ञके लिये जल निकालकर देवे। नित्यश्राद्ध विश्वेदेव तथा नियमोंसे रहित होता है। उसमें दक्षिणाकी भी आवश्यकता नहीं होती। यह नित्यश्राद्ध दाता और भोक्ता दोनोंको परम तृप्त करनेवाला है। इस प्रकार पितृयज्ञ करके स्वस्थबुद्धिसे आतुरभावका परित्याग करके पवित्र आसनपर बैठकर भोजन करे। उत्तम गन्धसे युक्त माला और दो शुद्ध वस्त्र धारण करके प्रसन्नचित्त हो पूर्व या उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके भोजन करना चाहिये। भोजनके पहले आचमन करके भोजनके बाद भी आचमन करना चाहिये। नीचे और ऊपरसे जलद्वारा आच्छादित होनेके कारण अन्न नग्न नहीं रहता। इस प्रकार आचमनकी विधिसे उत्तम बुद्धिवाला पुरुष भोजन करे। भोजन प्रारम्भ करनेसे पूर्व भूमिपर तीन ग्रास बलि अर्पण करे। फिर उसके ऊपर जल गिरा दे। तत्पश्चात् एक बार आचमन करके प्राणाग्निहोत्र करे। 'प्राणाय स्वाहा०' इत्यादि मन्त्रोंसे अपने उदरकुण्डकी अग्निमें अन्नकी पाँच आहुतियाँ डाले। उस समय हाथमें कुशकी पवित्री पहने रहे और चित्तको प्रसन्न रखे। जो अपने एक हाथमें कुश धारण किये हुए दूसरे हाथसे भोजन करता है, उसे केश और कीट आदिके स्पर्शसे उत्पन्न दोष नहीं लगता। अतः कुशधारणपूर्वक ही भोजन करे। भोजन करते समय मौन रहे। दाँतोंको परस्पर रगड़े नहीं। धोने योग्य जूठे हाथके अँगूठेके मूलसे जल गिराते हुए रौरवनरकके पापमय आश्रयमें रहनेवाले और उच्छिष्ट जल चाहनेवाले नरकनिवासी जीवोंको अक्षय्योदक दे। मनमें यह भाव रखे कि यह जल उन जीवोंको प्राप्त हो। तदनन्तर आचमन करके पवित्र हो मेधावी पुरुष मुखशुद्धि करके पुराण-श्रवण आदिके द्वारा दिनका शेष भाग व्यतीत करे। तत्पश्चात् सायंकालमें पुनः सन्ध्योपासना करे। इस प्रकार यह नित्यकर्मका विधान संक्षेपसे बताया गया है। इसका पालन करनेवाला ब्राह्मण कभी दुःखी नहीं होता।
वेदोंके स्वाध्याय, बलिवैश्वदेव, अतिथिसेवा, आठ प्रकारके विवाह, पंचयज्ञ तथा व्यावहारिक शिष्टाचारोंका कथन
व्यासजी कहते हैं— गृहस्थ-आश्रममें निवास करनेवाले साधुपुरुषोंके उपकारके लिये जिस प्रकार धर्मका अनुष्ठान किया जाता है, उसका मैं यथावत् रूपसे वर्णन करता हूँ। युधिष्ठिर! गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर मनुष्य इस सम्पूर्ण जगत्का पोषण करता है। इसलिये वह मनोवांछित लोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है। देवता, पितर, मनुष्य, भूतप्राणी, कृमि, कीट, पतंग, पक्षी और असुर—ये सभी गृहस्थके सहारे जीवननिर्वाह करते हैं और उसीसे उनकी तृप्ति होती है। युधिष्ठिर! ऋक्, साम और यजुः—इन तीन वेदरूप शरीरवाली एक धेनु है, जो सबकी आधारभूत है। उस वेदत्रयीरूपा
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६१३
धेनुमें ही सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है। वही इस विश्वका कारण मानी गयी है। ऋग्वेद उसकी पीठ है, यजुर्वेद मध्यभाग है और सामवेद उसकी कुक्षि एवं स्तन हैं। इष्ट (यज्ञ-याग आदि) और आपूर्त (वापी, कूप, तड़ाग, उद्यानादि)—ये दो उस धेनुके सींग हैं। वेदोंके जो उत्तम सूक्त हैं, वे ही इस गौके रोम हैं। शान्तिकर्म और पुष्टिकर्म उसके गोबर और मूत्र हैं। अक्षर ही उसके चरण हैं। पद, क्रम, जटा और घन पाठके द्वारा वह जगत्के लिये उपजीव्य होती है। स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार और हन्तकार—ये उस धेनुके चार स्तन हैं। स्वाहाकाररूपी स्तनको देवता, स्वधाकारको पितर, वषट्कारको देवता, भूत, ऋषि, मुनि एवं सुरेश्वरगण तथा हन्तकाररूपी स्तनको मनुष्य सदा पान करते हैं। इस प्रकार यह त्रयीरूपा धेनु सम्पूर्ण जगत्को तृप्त करती है। जो पुरुष इन वेदोंका उच्छेद करनेवाला है, वह असंख्य पाप करनेवाला मानव अन्धतामिस्र नामक अन्धकारमय नरकमें डूबता है। जो इस गौको अपने देवतादि बछड़ोंसे उचित समयपर संयोग कराकर दुग्धपानका अवसर देता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। इसलिये मनुष्यको प्रतिदिन अपने शरीरकी ही भाँति देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य एवं अन्य प्राणियोंका पोषण करना चाहिये। स्नान करके पवित्र हो ब्रह्मयज्ञके अन्तमें एकाग्रचित्तसे जलद्वारा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पुष्प, गन्ध और धूप आदिसे देवताओंकी पूजा करके अग्निहोत्रके द्वारा अग्निका तर्पण करे। उसके बाद बलिवैश्वदेव करे। राक्षसों और भूतोंके लिये आकाशमें बलि अर्पण करे और पितरोंके लिये दक्षिणाभिमुख होकर अन्न दे। तदनन्तर गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्त हो जल हाथमें लेकर उन सबकी आचमनक्रियाके लिये उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्हीं-उन्हीं देवताओंका नाम लेकर जल छोड़े। इस प्रकार घरमें बलि अर्पण करके गृहस्थ पुरुष पवित्र हो आचमन करे। तत्पश्चात् घरके दरवाजेकी ओर देखे और कुछ समयतक अतिथिके आगमनकी प्रतीक्षा करे। यदि कोई अतिथि आ जाय तो अर्घ्य और पाद्यके जलसे उसका सत्कार करे। खानेकी इच्छासे आये हुए थके-माँदे अकिंचन याचक ब्राह्मणको अतिथि कहा गया है। ऐसे अतिथिकी यथाशक्ति पूजा करके उसके आचरण और स्वाध्यायके विषयमें प्रश्न न करे। वह सुन्दर हो या असुन्दर, उसे साक्षात् प्रजापति समझे। वह नित्य स्थित नहीं रहता, इसीलिये अतिथि कहलाता है। ऐसे अतिथिको देकर जो भोजन करता है, वह अमृत भोजन करता है। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौटता है, वह उसे अपना पाप देकर बदलेमें उसका पुण्य ले जाता है*। अतः साग देकर अथवा
* अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिर्वर्तते। स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ६। २३-२४)
| ६९४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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केवल जल ही देकर अपनी शक्तिके अनुसार मनुष्य अतिथिका पूजन करे। तभी वह उसके ऋणसे मुक्त होता है।
युधिष्ठिर बोले— मुने! आठ प्रकारके विवाह बतलाये जाते हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। इन विवाहोंकी विधि तथा इनमें करने योग्य कार्यका यथावत् वर्णन कीजिये।
व्यासजीने कहा— जहाँ वरको बुलाकर वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत हुई अपनी कन्या दी जाती है, वह ब्राह्म-विवाह है। यज्ञमें वरण किये हुए ऋत्विजके लिये जो कन्यादान किया जाता है, वह दैव-विवाह है। वरसे एक गाय और एक बैल लेकर जो उसको कन्या दी जाती है, वह आर्ष-विवाह है। जहाँ वर और कन्याको यह कहकर कि तुम दोनों साथ-साथ रहकर धर्मका पालन करो, विवाह-बन्धनमें आबद्ध किया जाता है, वह प्राजापत्य-विवाह कहा गया है। जहाँ एक-दूसरेसे मैत्री होनेके कारण वर और वधूमें स्वेच्छासे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, वह गान्धर्व-विवाह कहलाता है। बलपूर्वक कन्याको अपहरण कर लेनेसे राक्षस-विवाह होता है, जो सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित है। छलसे कन्याका अपहरण करनेपर पैशाच-विवाह माना गया है, यह अत्यन्त निन्दित है। [कन्याके माता-पिताको धन देकर जो कन्या खरीद ली जाती है और उससे विवाह किया जाता है, ऐसे विवाहको आसुर-विवाह कहते हैं।] यह आठवाँ जो पैशाच विवाह है, वह अत्यन्त पापिष्ठ है। ऐसे विवाहसे पापिष्ठ सन्तानोंकी ही उत्पत्ति होती है। अपने समान वर्णकी स्त्रियोंसे ही पाणिग्रहण करना चाहिये, यह विधि है। धर्मानुकूल विवाहमें धार्मिक एवं सौ वर्षोंतक जीवित रहनेवाले पुत्र पैदा होते हैं तथा अधार्मिक विवाहसे धर्मरहित, मन्दभाग्य, धनहीन और अल्पायु सन्तान उत्पन्न होती हैं। ऋतुकाल आनेपर स्त्रीके साथ समागम करना गृहस्थके लिये श्रेष्ठ धर्म है। दिनमें स्त्रीके साथ समागम पुरुषके लिये बड़ा भारी आयुका नाशक माना गया है। श्राद्धके दिन तथा सभी पर्वोंके दिन बुद्धिमान् पुरुषोंको स्त्रीसम्भोग नहीं करना चाहिये। उन अवसरोंपर मोहवश स्त्री-समागम करनेवाला पुरुष धर्मसे गिर जाता है। जो केवल ऋतुकालमें स्त्री-समागम करता और सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखता है, वह गृहस्थ रहनेपर भी सदा ब्रह्मचारी ही जानने योग्य है*। आर्ष-विवाहमें जो दो गौ लेनेकी बात कही गयी है, वह उत्तम नहीं है। क्योंकि कन्याका थोड़ा भी शुल्क लिया जाय, तो वह कन्या-विक्रयरूपी पापका कारण बनता है। कन्या-विक्रय करनेसे मनुष्य एक कल्पतक विष्ठा एवं कृमिभोजन नामक नरकमें निवास करता है। अतः कन्याके थोड़े-से धनका भी मनुष्यको अपने जीवनमें उपयोग नहीं करना चाहिये। वाणिज्य, नीच पुरुषोंकी सेवा, वेदाध्ययनका अभाव, निन्दित विवाह और क्रियालोप—ये कुलमें पतनके हेतु बनते हैं। गृहस्थ पुरुष वैवाहिक अग्निमें प्रतिदिन गृह्यकर्मका अनुष्ठान करे। प्रतिदिन पंचयज्ञका अनुष्ठान तथा पाकयज्ञ करे। गृहस्थ पुरुषसे प्रतिदिन पाँच प्रकारके हिंसापूर्ण कर्म बनते हैं। ओखली, चक्की, चूल्हा, जलका घड़ा और झाडू—इनसे होनेवाली पाँच प्रकारकी हिंसाओंके निवारणके लिये पाँच यज्ञ बताये गये हैं, जो गृहस्थके कल्याणकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं। वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होम देवयज्ञ है, बलि भूतयज्ञ है और अतिथि-सत्कार मनुष्ययज्ञ है।
* ऋतुकालाभिगामी यः स्वदारनिरतश्च यः। स सदा ब्रह्मचारी हि विज्ञेयः स गृहाश्रमी ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ६। ३७)
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६१५
जो बलिवैश्वदेव कर्मके भीतर आ जाय अथवा सूर्यके मध्याह्नकालमें आनेपर भूख और तापसे सन्तप्त हो द्वारपर आ जाय, वह अतिथि माना गया है। देवता, पितर और अतिथियोंको देकर जो गृहस्थ भोजन करता है, वह अमृतभोजी है। जो इन सबको अन्न दिये बिना ही भोजन करता है, वह केवल अपना पेट भरनेवाला है [शास्त्रोंमें ऐसे मनुष्यको पापभोजी बताया गया है]। जो वैश्वदेवसे हीन और आतिथ्यसे वर्जित हैं, वे वेदोंके विद्वान् हों तो भी उन्हें शूद्र ही समझना चाहिये। जो अधम द्विज बलिवैश्वदेव न करके भोजन कर लेते हैं, वे इस लोकमें अन्नहीन होते हैं और मरनेपर कौवेकी योनिमें जाते हैं। वेदोक्त कर्मका ज्ञान प्राप्त करके नित्य आलस्य छोड़कर यदि उसका यथाशक्ति पालन करे, तो मनुष्य परम सद्गतिको प्राप्त होता है।
उदय और अस्त होते हुए तथा मध्याह्नकालके सूर्यको न देखे। सूर्यग्रहणके समय तथा उदयके पहले अण्डस्थ (अण्डाकारमें स्थित) सूर्यपर दृष्टिपात न करे। जलमें अपनी परछाहीं न देखे, कीचड़में न दौड़े, नंगी स्त्रीकी ओर न देखे और नंगा होकर जलमें न घुसे। देवमन्दिर, ब्राह्मण, गौ, मधु, मिट्टीका ढेर, उत्तम जाति, अवस्थामें बड़े और विद्यामें बड़े मनुष्य, अश्वत्थ-वृक्ष, चैत्य-वृक्ष, गुरु, जलसे भरे हुए घड़े, तैयार अन्न, दही और सरसों आदिको अपनेसे दाहिने करके जाना चाहिये। रजस्वला स्त्रीका सेवन न करे, स्त्रीके साथ बैठकर न खाय, एक वस्त्र धारण करके भोजन न करे और जिसपर आरामसे बैठ न सकें ऐसे आसनपर भोजन न करे। तेजकी इच्छा रखनेवाला श्रेष्ठ द्विज अपवित्र स्त्रीकी ओर न देखे, देवताओं और पितरोंको तृप्त किये बिना कहीं कदापि अन्न ग्रहण नहीं करे। गोशालामें, बाँबीमें तथा राखमें कभी मूत्रत्याग न करे, जिस गड्ढेमें जीव रहते हों उसमें भी पेशाब न करे, खड़ा होकर या चलते-चलते मूत्रत्याग न करे, ब्राह्मण, सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, नक्षत्र और गुरुजनोंकी ओर देखते हुए मल-मूत्रका त्याग न करे। मुखसे आग न फूँके, वस्त्रहीन अवस्थामें स्त्रीकी ओर न देखे, अपने पैरोंको आगमें न तपावे तथा कोई अपवित्र वस्तु अग्निमें न डाले तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करे। दोनों सन्ध्याओंके समय भोजन न करे। प्रातःकाल और सायंकालकी गोधूलि वेलामें विद्वान् पुरुष शयन न करे। दूध पिलाती हुई गायको देखकर भी किसीसे न कहे। इन्द्रधनुष किसीको न दिखावे। कहीं शून्यस्थानमें अकेला न सोवे। किसी सोये हुए मनुष्यको न जगावे, अकेला रास्ता न चले और अंजलिसे जल न पीये। जिसकी मलाई उतार ली गयी हो, ऐसे दहीको दिनमें न खाय और रात्रिमें तो दहीका सर्वथा निषेध है। रजस्वला स्त्रीसे बातचीत न करे, रात्रिमें भरपेट भोजन न करे। नाचने-गाने और बाजा बजानेके प्रेमी न हो। काँसेके बरतनमें पैर न धुलावे। जो अज्ञानी मनुष्य अपने घर श्राद्ध करके फिर दूसरे घर भोजन करता है, उसमें दाताको श्राद्धका फल नहीं मिलता और भोजन करनेवाला पापका भागी होता है। दूसरेके पहने हुए वस्त्र और जूते न पहने, फूटे हुए बरतनमें न खाय और आगसे जले हुए आसनपर न बैठे। जो दीर्घकालतक जीवित रहना चाहता हो, वह गाय-बैलोंकी पीठपर न चढ़े, चिताका धूम अपने अंगमें न लगने दे, (गिरनेकी आशंकावाले) नदीके तटपर न बैठे, उदयकालीन सूर्यकी किरणोंका स्पर्श न करे और दिनका सोना छोड़ दे। स्नान कर लेनेपर शरीरका मार्जन न करे, रास्तेमें शिखा खोलकर न चले, हाथ और सिरको न कँपाये। पैरसे आसन खींचकर न बैठे, हाथसे शरीरको न पोंछे अथवा स्नानकालमें पहने हुए वस्त्रसे भी न पोंछे। स्नानकालीन वस्त्रसे शरीर पोंछनेपर कुत्तेसे चाटे हुएके समान अशुद्ध हो जाता है।
६१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उस दशामें पुनः स्नान करनेसे ही शुद्धि होती है। दाँतसे कभी नख या रोएँको न काटे। यदि शुभकी इच्छा हो तो नखसे नखको न काटे। अपने घरमें भी कभी बिना दरवाजेके (दीवार फाँदकर) न जाय, धर्मघातीके साथ न बैठे, कभी नग्न होकर न सोवे और हाथमें भोजन रखकर न खाय। हाथ, पैर और मुख भीगे रखकर भोजन करनेवाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है। भीगे हुए पैरोंवाला मनुष्य शयन न करे, जूठे मुँह कहीं न जाय, शय्यापर बैठकर न खाय और न जल ही पीये। जूता पहने हुए न बैठे, खड़ा होकर पानी न पीये, आरोग्यकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सब खट्टी वस्तुओंको त्याग दे। जूठे हाथसे सिरका स्पर्श न करे, भूसी, अंगार, भस्म, केश और कपालके ऊपर खड़ा न हो। पतित मनुष्योंके साथ निवास करना पतनका ही कारण होता है। शूद्रके लिये ऊँचा आसन और मंच न दे। द्विजोंकी सेवा करना शूद्रोंके लिये परम धर्म माना गया है। दोनों हाथोंसे सिर खुजलाना शुभ नहीं है। शूद्रको कभी वैदिक मन्त्रका उपदेश नहीं करना चाहिये, उसे वेदोपदेश करनेवाला ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है, और शूद्र भी स्वधर्मसे भ्रष्ट हो जाता है। दोनों हाथोंसे किसीको पीटना, निन्दा करना, बाल नोचना, शास्त्रके विपरीत बर्ताव करना और लोभीसे दान लेना— यह सब करनेवाला ब्राह्मण इक्कीस नरकोंमें पड़ता है।
असमयमें मेघकी गर्जना सुनायी दे, वर्षा-ऋतुमें धूल बरसानेवाली आँधी चले तथा रात्रिमें बालकोंके रोनेकी विशेष ध्वनि हो, तब अनध्याय बताया गया है। उल्कापात, भूकम्प और दिग्दाह (अग्निकाण्ड) होनेपर, अर्धरात्रिमें, दोनों सन्ध्या-कालमें, शूद्रके समीप, राज्यके अपहरण होनेपर, सूतकमें, दस अष्टकाओंमें, चतुर्दशीको, श्राद्धके दिन, प्रतिपदा तिथिमें, पूर्णिमामें, अष्टमीमें, कुत्तेके रोनेपर, राज्यभंग होनेपर, वेदोंके उपाकर्म और उत्सर्गके दिन, कल्पादि एवं युगादि तिथियोंमें, आरण्यकका अध्ययन पूरा होनेपर, बाण और सामकी ध्वनि सुनायी देनेपर अनध्याय होता है। इन अनध्यायोंमें कदापि स्वाध्याय नहीं करना चाहिये।
चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या और पूर्णिमाको सदा ब्रह्मचर्यका पालन करे। परायी स्त्रीसे सम्बन्ध रखना इस लोकमें आयुका विनाश करनेवाला है, अतः पर-स्त्री-संसर्ग दूरसे ही त्याग दे। शत्रुओंका सेवन भी दूरसे ही त्याग देना चाहिये। सत्य बोले, प्रिय बोले, अप्रिय सत्य कभी न बोले, प्रिय भी असत्य हो तो न बोले। यह धर्म वेद-शास्त्रोंद्वारा विहित है*। वाणी, मन और जिह्वाके वेगको रोके, गुप्तांगोंमें जो रोएँ हैं, उनका त्याग करे; क्योंकि उनके स्पर्शसे मनुष्य अशुद्ध हो जाता है। पैरोंके धोवनका जल, मूत्र और पीनेसे बचा हुआ जूठा जल, थूक तथा कफ— इन सबको घरसे दूर फेंकना चाहिये। दिन-रात वैदिक मन्त्रके जपसे, शौच और सदाचारके सेवनसे तथा द्रोहरहित बुद्धिसे मनुष्य अपने पूर्वजन्मका स्मरण कर लेता है। बड़े-बूढ़े पुरुषोंको यत्नपूर्वक प्रणाम करे, उन्हें बैठनेके लिये अपना आसन दे, उनके सामने नतमस्तक होकर रहे और जब वे जाने लगें, तब उनके पीछे-पीछे जाय। वेद, ब्राह्मण, देवता, राजा, साधु, तपस्वी और पतिव्रता स्त्रियोंकी कभी निन्दा न करे। दूसरेके जलाशयमें स्नान करना हो तो उसमेंसे पाँच ढेला मिट्टी निकाल करके स्नान करे। उत्तम देश और उत्तम कालमें किसी सुपात्रको पाकर
* सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मो विधीयते॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ६।८८)