भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 643
६९४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

केवल जल ही देकर अपनी शक्तिके अनुसार मनुष्य अतिथिका पूजन करे। तभी वह उसके ऋणसे मुक्त होता है।

युधिष्ठिर बोले— मुने! आठ प्रकारके विवाह बतलाये जाते हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। इन विवाहोंकी विधि तथा इनमें करने योग्य कार्यका यथावत् वर्णन कीजिये।

व्यासजीने कहा— जहाँ वरको बुलाकर वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत हुई अपनी कन्या दी जाती है, वह ब्राह्म-विवाह है। यज्ञमें वरण किये हुए ऋत्विजके लिये जो कन्यादान किया जाता है, वह दैव-विवाह है। वरसे एक गाय और एक बैल लेकर जो उसको कन्या दी जाती है, वह आर्ष-विवाह है। जहाँ वर और कन्याको यह कहकर कि तुम दोनों साथ-साथ रहकर धर्मका पालन करो, विवाह-बन्धनमें आबद्ध किया जाता है, वह प्राजापत्य-विवाह कहा गया है। जहाँ एक-दूसरेसे मैत्री होनेके कारण वर और वधूमें स्वेच्छासे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, वह गान्धर्व-विवाह कहलाता है। बलपूर्वक कन्याको अपहरण कर लेनेसे राक्षस-विवाह होता है, जो सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित है। छलसे कन्याका अपहरण करनेपर पैशाच-विवाह माना गया है, यह अत्यन्त निन्दित है। [कन्याके माता-पिताको धन देकर जो कन्या खरीद ली जाती है और उससे विवाह किया जाता है, ऐसे विवाहको आसुर-विवाह कहते हैं।] यह आठवाँ जो पैशाच विवाह है, वह अत्यन्त पापिष्ठ है। ऐसे विवाहसे पापिष्ठ सन्तानोंकी ही उत्पत्ति होती है। अपने समान वर्णकी स्त्रियोंसे ही पाणिग्रहण करना चाहिये, यह विधि है। धर्मानुकूल विवाहमें धार्मिक एवं सौ वर्षोंतक जीवित रहनेवाले पुत्र पैदा होते हैं तथा अधार्मिक विवाहसे धर्मरहित, मन्दभाग्य, धनहीन और अल्पायु सन्तान उत्पन्न होती हैं। ऋतुकाल आनेपर स्त्रीके साथ समागम करना गृहस्थके लिये श्रेष्ठ धर्म है। दिनमें स्त्रीके साथ समागम पुरुषके लिये बड़ा भारी आयुका नाशक माना गया है। श्राद्धके दिन तथा सभी पर्वोंके दिन बुद्धिमान् पुरुषोंको स्त्रीसम्भोग नहीं करना चाहिये। उन अवसरोंपर मोहवश स्त्री-समागम करनेवाला पुरुष धर्मसे गिर जाता है। जो केवल ऋतुकालमें स्त्री-समागम करता और सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखता है, वह गृहस्थ रहनेपर भी सदा ब्रह्मचारी ही जानने योग्य है*। आर्ष-विवाहमें जो दो गौ लेनेकी बात कही गयी है, वह उत्तम नहीं है। क्योंकि कन्याका थोड़ा भी शुल्क लिया जाय, तो वह कन्या-विक्रयरूपी पापका कारण बनता है। कन्या-विक्रय करनेसे मनुष्य एक कल्पतक विष्ठा एवं कृमिभोजन नामक नरकमें निवास करता है। अतः कन्याके थोड़े-से धनका भी मनुष्यको अपने जीवनमें उपयोग नहीं करना चाहिये। वाणिज्य, नीच पुरुषोंकी सेवा, वेदाध्ययनका अभाव, निन्दित विवाह और क्रियालोप—ये कुलमें पतनके हेतु बनते हैं। गृहस्थ पुरुष वैवाहिक अग्निमें प्रतिदिन गृह्यकर्मका अनुष्ठान करे। प्रतिदिन पंचयज्ञका अनुष्ठान तथा पाकयज्ञ करे। गृहस्थ पुरुषसे प्रतिदिन पाँच प्रकारके हिंसापूर्ण कर्म बनते हैं। ओखली, चक्की, चूल्हा, जलका घड़ा और झाडू—इनसे होनेवाली पाँच प्रकारकी हिंसाओंके निवारणके लिये पाँच यज्ञ बताये गये हैं, जो गृहस्थके कल्याणकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं। वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होम देवयज्ञ है, बलि भूतयज्ञ है और अतिथि-सत्कार मनुष्ययज्ञ है।


* ऋतुकालाभिगामी यः स्वदारनिरतश्च यः। स सदा ब्रह्मचारी हि विज्ञेयः स गृहाश्रमी ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ६। ३७)