भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 644
  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६१५

जो बलिवैश्वदेव कर्मके भीतर आ जाय अथवा सूर्यके मध्याह्नकालमें आनेपर भूख और तापसे सन्तप्त हो द्वारपर आ जाय, वह अतिथि माना गया है। देवता, पितर और अतिथियोंको देकर जो गृहस्थ भोजन करता है, वह अमृतभोजी है। जो इन सबको अन्न दिये बिना ही भोजन करता है, वह केवल अपना पेट भरनेवाला है [शास्त्रोंमें ऐसे मनुष्यको पापभोजी बताया गया है]। जो वैश्वदेवसे हीन और आतिथ्यसे वर्जित हैं, वे वेदोंके विद्वान् हों तो भी उन्हें शूद्र ही समझना चाहिये। जो अधम द्विज बलिवैश्वदेव न करके भोजन कर लेते हैं, वे इस लोकमें अन्नहीन होते हैं और मरनेपर कौवेकी योनिमें जाते हैं। वेदोक्त कर्मका ज्ञान प्राप्त करके नित्य आलस्य छोड़कर यदि उसका यथाशक्ति पालन करे, तो मनुष्य परम सद्गतिको प्राप्त होता है।

उदय और अस्त होते हुए तथा मध्याह्नकालके सूर्यको न देखे। सूर्यग्रहणके समय तथा उदयके पहले अण्डस्थ (अण्डाकारमें स्थित) सूर्यपर दृष्टिपात न करे। जलमें अपनी परछाहीं न देखे, कीचड़में न दौड़े, नंगी स्त्रीकी ओर न देखे और नंगा होकर जलमें न घुसे। देवमन्दिर, ब्राह्मण, गौ, मधु, मिट्टीका ढेर, उत्तम जाति, अवस्थामें बड़े और विद्यामें बड़े मनुष्य, अश्वत्थ-वृक्ष, चैत्य-वृक्ष, गुरु, जलसे भरे हुए घड़े, तैयार अन्न, दही और सरसों आदिको अपनेसे दाहिने करके जाना चाहिये। रजस्वला स्त्रीका सेवन न करे, स्त्रीके साथ बैठकर न खाय, एक वस्त्र धारण करके भोजन न करे और जिसपर आरामसे बैठ न सकें ऐसे आसनपर भोजन न करे। तेजकी इच्छा रखनेवाला श्रेष्ठ द्विज अपवित्र स्त्रीकी ओर न देखे, देवताओं और पितरोंको तृप्त किये बिना कहीं कदापि अन्न ग्रहण नहीं करे। गोशालामें, बाँबीमें तथा राखमें कभी मूत्रत्याग न करे, जिस गड्ढेमें जीव रहते हों उसमें भी पेशाब न करे, खड़ा होकर या चलते-चलते मूत्रत्याग न करे, ब्राह्मण, सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, नक्षत्र और गुरुजनोंकी ओर देखते हुए मल-मूत्रका त्याग न करे। मुखसे आग न फूँके, वस्त्रहीन अवस्थामें स्त्रीकी ओर न देखे, अपने पैरोंको आगमें न तपावे तथा कोई अपवित्र वस्तु अग्निमें न डाले तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करे। दोनों सन्ध्याओंके समय भोजन न करे। प्रातःकाल और सायंकालकी गोधूलि वेलामें विद्वान् पुरुष शयन न करे। दूध पिलाती हुई गायको देखकर भी किसीसे न कहे। इन्द्रधनुष किसीको न दिखावे। कहीं शून्यस्थानमें अकेला न सोवे। किसी सोये हुए मनुष्यको न जगावे, अकेला रास्ता न चले और अंजलिसे जल न पीये। जिसकी मलाई उतार ली गयी हो, ऐसे दहीको दिनमें न खाय और रात्रिमें तो दहीका सर्वथा निषेध है। रजस्वला स्त्रीसे बातचीत न करे, रात्रिमें भरपेट भोजन न करे। नाचने-गाने और बाजा बजानेके प्रेमी न हो। काँसेके बरतनमें पैर न धुलावे। जो अज्ञानी मनुष्य अपने घर श्राद्ध करके फिर दूसरे घर भोजन करता है, उसमें दाताको श्राद्धका फल नहीं मिलता और भोजन करनेवाला पापका भागी होता है। दूसरेके पहने हुए वस्त्र और जूते न पहने, फूटे हुए बरतनमें न खाय और आगसे जले हुए आसनपर न बैठे। जो दीर्घकालतक जीवित रहना चाहता हो, वह गाय-बैलोंकी पीठपर न चढ़े, चिताका धूम अपने अंगमें न लगने दे, (गिरनेकी आशंकावाले) नदीके तटपर न बैठे, उदयकालीन सूर्यकी किरणोंका स्पर्श न करे और दिनका सोना छोड़ दे। स्नान कर लेनेपर शरीरका मार्जन न करे, रास्तेमें शिखा खोलकर न चले, हाथ और सिरको न कँपाये। पैरसे आसन खींचकर न बैठे, हाथसे शरीरको न पोंछे अथवा स्नानकालमें पहने हुए वस्त्रसे भी न पोंछे। स्नानकालीन वस्त्रसे शरीर पोंछनेपर कुत्तेसे चाटे हुएके समान अशुद्ध हो जाता है।