भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 642
  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६१३

धेनुमें ही सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है। वही इस विश्वका कारण मानी गयी है। ऋग्वेद उसकी पीठ है, यजुर्वेद मध्यभाग है और सामवेद उसकी कुक्षि एवं स्तन हैं। इष्ट (यज्ञ-याग आदि) और आपूर्त (वापी, कूप, तड़ाग, उद्यानादि)—ये दो उस धेनुके सींग हैं। वेदोंके जो उत्तम सूक्त हैं, वे ही इस गौके रोम हैं। शान्तिकर्म और पुष्टिकर्म उसके गोबर और मूत्र हैं। अक्षर ही उसके चरण हैं। पद, क्रम, जटा और घन पाठके द्वारा वह जगत्‌के लिये उपजीव्य होती है। स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार और हन्तकार—ये उस धेनुके चार स्तन हैं। स्वाहाकाररूपी स्तनको देवता, स्वधाकारको पितर, वषट्कारको देवता, भूत, ऋषि, मुनि एवं सुरेश्वरगण तथा हन्तकाररूपी स्तनको मनुष्य सदा पान करते हैं। इस प्रकार यह त्रयीरूपा धेनु सम्पूर्ण जगत्‌को तृप्त करती है। जो पुरुष इन वेदोंका उच्छेद करनेवाला है, वह असंख्य पाप करनेवाला मानव अन्धतामिस्र नामक अन्धकारमय नरकमें डूबता है। जो इस गौको अपने देवतादि बछड़ोंसे उचित समयपर संयोग कराकर दुग्धपानका अवसर देता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। इसलिये मनुष्यको प्रतिदिन अपने शरीरकी ही भाँति देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य एवं अन्य प्राणियोंका पोषण करना चाहिये। स्नान करके पवित्र हो ब्रह्मयज्ञके अन्तमें एकाग्रचित्तसे जलद्वारा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पुष्प, गन्ध और धूप आदिसे देवताओंकी पूजा करके अग्निहोत्रके द्वारा अग्निका तर्पण करे। उसके बाद बलिवैश्वदेव करे। राक्षसों और भूतोंके लिये आकाशमें बलि अर्पण करे और पितरोंके लिये दक्षिणाभिमुख होकर अन्न दे। तदनन्तर गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्त हो जल हाथमें लेकर उन सबकी आचमनक्रियाके लिये उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्हीं-उन्हीं देवताओंका नाम लेकर जल छोड़े। इस प्रकार घरमें बलि अर्पण करके गृहस्थ पुरुष पवित्र हो आचमन करे। तत्पश्चात् घरके दरवाजेकी ओर देखे और कुछ समयतक अतिथिके आगमनकी प्रतीक्षा करे। यदि कोई अतिथि आ जाय तो अर्घ्य और पाद्यके जलसे उसका सत्कार करे। खानेकी इच्छासे आये हुए थके-माँदे अकिंचन याचक ब्राह्मणको अतिथि कहा गया है। ऐसे अतिथिकी यथाशक्ति पूजा करके उसके आचरण और स्वाध्यायके विषयमें प्रश्न न करे। वह सुन्दर हो या असुन्दर, उसे साक्षात् प्रजापति समझे। वह नित्य स्थित नहीं रहता, इसीलिये अतिथि कहलाता है। ऐसे अतिथिको देकर जो भोजन करता है, वह अमृत भोजन करता है। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौटता है, वह उसे अपना पाप देकर बदलेमें उसका पुण्य ले जाता है*। अतः साग देकर अथवा


* अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिर्वर्तते। स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ६। २३-२४)