संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अन्नका भाग देते हुए इस प्रकार कहना चाहिये— 'पूर्व, पश्चिम, उत्तर, वायव्य और नैर्ऋत्य कोणमें रहनेवाले जो कौए हैं, वे सब भूमिपर मेरे द्वारा समर्पित किये हुए अन्नके ग्रासको ग्रहण करें।' इस प्रकार पंचभूतोंके लिये बलि अर्पण करके जितनी देरमें गाय दुही जाती है, उतनी देरतक किसी अतिथिके आनेकी राह देखे। यदि कोई आ जाय तो उसे भोजन देनेके लिये रसोईघरमें प्रवेश करे। काकबलि न करके नित्यश्राद्ध करे। नित्यश्राद्धमें अपनी शक्तिके अनुसार तीन, दो अथवा एक ब्राह्मणको भोजन करावे। पितृयज्ञके लिये जल निकालकर देवे। नित्यश्राद्ध विश्वेदेव तथा नियमोंसे रहित होता है। उसमें दक्षिणाकी भी आवश्यकता नहीं होती। यह नित्यश्राद्ध दाता और भोक्ता दोनोंको परम तृप्त करनेवाला है। इस प्रकार पितृयज्ञ करके स्वस्थबुद्धिसे आतुरभावका परित्याग करके पवित्र आसनपर बैठकर भोजन करे। उत्तम गन्धसे युक्त माला और दो शुद्ध वस्त्र धारण करके प्रसन्नचित्त हो पूर्व या उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके भोजन करना चाहिये। भोजनके पहले आचमन करके भोजनके बाद भी आचमन करना चाहिये। नीचे और ऊपरसे जलद्वारा आच्छादित होनेके कारण अन्न नग्न नहीं रहता। इस प्रकार आचमनकी विधिसे उत्तम बुद्धिवाला पुरुष भोजन करे। भोजन प्रारम्भ करनेसे पूर्व भूमिपर तीन ग्रास बलि अर्पण करे। फिर उसके ऊपर जल गिरा दे। तत्पश्चात् एक बार आचमन करके प्राणाग्निहोत्र करे। 'प्राणाय स्वाहा०' इत्यादि मन्त्रोंसे अपने उदरकुण्डकी अग्निमें अन्नकी पाँच आहुतियाँ डाले। उस समय हाथमें कुशकी पवित्री पहने रहे और चित्तको प्रसन्न रखे। जो अपने एक हाथमें कुश धारण किये हुए दूसरे हाथसे भोजन करता है, उसे केश और कीट आदिके स्पर्शसे उत्पन्न दोष नहीं लगता। अतः कुशधारणपूर्वक ही भोजन करे। भोजन करते समय मौन रहे। दाँतोंको परस्पर रगड़े नहीं। धोने योग्य जूठे हाथके अँगूठेके मूलसे जल गिराते हुए रौरवनरकके पापमय आश्रयमें रहनेवाले और उच्छिष्ट जल चाहनेवाले नरकनिवासी जीवोंको अक्षय्योदक दे। मनमें यह भाव रखे कि यह जल उन जीवोंको प्राप्त हो। तदनन्तर आचमन करके पवित्र हो मेधावी पुरुष मुखशुद्धि करके पुराण-श्रवण आदिके द्वारा दिनका शेष भाग व्यतीत करे। तत्पश्चात् सायंकालमें पुनः सन्ध्योपासना करे। इस प्रकार यह नित्यकर्मका विधान संक्षेपसे बताया गया है। इसका पालन करनेवाला ब्राह्मण कभी दुःखी नहीं होता।
वेदोंके स्वाध्याय, बलिवैश्वदेव, अतिथिसेवा, आठ प्रकारके विवाह, पंचयज्ञ तथा व्यावहारिक शिष्टाचारोंका कथन
व्यासजी कहते हैं— गृहस्थ-आश्रममें निवास करनेवाले साधुपुरुषोंके उपकारके लिये जिस प्रकार धर्मका अनुष्ठान किया जाता है, उसका मैं यथावत् रूपसे वर्णन करता हूँ। युधिष्ठिर! गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर मनुष्य इस सम्पूर्ण जगत्का पोषण करता है। इसलिये वह मनोवांछित लोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है। देवता, पितर, मनुष्य, भूतप्राणी, कृमि, कीट, पतंग, पक्षी और असुर—ये सभी गृहस्थके सहारे जीवननिर्वाह करते हैं और उसीसे उनकी तृप्ति होती है। युधिष्ठिर! ऋक्, साम और यजुः—इन तीन वेदरूप शरीरवाली एक धेनु है, जो सबकी आधारभूत है। उस वेदत्रयीरूपा