संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य *
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दुहरे मुड़े हुए कुशों एवं तिलमिश्रित जलसे पितृतीर्थसे कव्यवाट्, अनल आदि दिव्य पितरोंका तर्पण करे। रविवार, शुक्ल पक्षकी त्रयोदशी, सप्तमी तिथि, रात्रि एवं दोनों सन्ध्याकालमें कल्याणकी इच्छा रखनेवाला ब्राह्मण कभी तिलसे तर्पण न करे। यदि करना ही पड़े तो सफेद तिलोंसे ही तर्पण करे। तत्पश्चात् चौदह यमोंके नामोंका उच्चारण करते हुए उनके लिये तर्पण करे। यमतर्पणके बाद अपना बायाँ घुटना जमीनपर रखकर मौन हो अपने गोत्रका उच्चारण करते हुए अपने पितरोंका पितृतीर्थसे प्रसन्नतापूर्वक तर्पण करे। तर्पणमें देवता एक-एक अंजलि, सनकादि दो-दो अंजलि तथा पितर तीन-तीन अंजलि जल चाहते हैं। पितृवर्गमें जो स्त्रियाँ हैं, वे एक-एक अंजलि जलकी ही इच्छा रखती हैं। अंगुलियोंका अग्रभाग देवतीर्थ है; अंगुलियोंका मूलभाग ऋषितीर्थ है; अंगूठेके मूलमें ब्राह्मतीर्थ है और हाथके बीचमें प्रजापतितीर्थ है। अंगुष्ठ और तर्जनीके बीचके भागको पितृतीर्थ कहते हैं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त जो भी देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर, पिता, माता, मातामह आदि हैं, वे सब तृप्त हों—ऐसा कहकर अथवा और भी जो वैदिक या पौराणिक मन्त्र हैं, उनका उच्चारण करके पितरोंका सांग तर्पण करना चाहिये। वह पितरोंको सुख देनेवाला है।
तत्पश्चात् अग्निहोत्र करके वेदाभ्यास करना चाहिये। वेदाभ्यास पाँच प्रकारसे किया जाता है—(१) स्वीकार (गुरुसे ग्रहण), (२) अर्थ-विचार, (३) मन्त्र-पाठका अभ्यास, (४) जप (वेदानुसार आचरण) और (५) शिष्योंको पढ़ाना। प्राप्तकी रक्षा और अप्राप्तकी प्राप्तिके लिये यह द्विजातियोंका प्रातःकालिक कृत्य बताया गया है। अथवा प्रातःकाल उठकर शौचादि आवश्यक कार्योंसे निवृत्त हो हाथ-पैरोंकी शुद्धि एवं आचमन करके दन्तधावन करे। सारे शरीरकी शुद्धि करके प्रातःसन्ध्या करे। वेदार्थोंका विचार करे। नाना प्रकारके शास्त्रोंको पढ़े और अपने हितमें लगे हुए पवित्र एवं बुद्धिमान् शिष्योंको पढ़ावे तथा योग-क्षेम आदिकी सिद्धिके लिये परमेश्वरकी शरण ले। तत्पश्चात् मध्याह्नकालके नियमोंकी सिद्धिके लिये पुनः पूर्वोक्त रीतिसे स्नान करे, स्नान करके मध्याह्न-सन्ध्या करे। देवताकी पूजा करके नैमित्तिक कृत्योंका पालन करे। अग्निको प्रज्वलित करके बलिवैश्वदेव करे। निष्पाव, कोदो, उड़द, मटर और चनाका वैश्वदेव-होममें त्याग करे। तेलका पका, बिना पका तथा नमक मिलाया हुआ सब अन्न छोड़ दे। अरहर, मसूर, गोलधान्यसे बना हुआ भोजन, दूसरोंके खानेसे बचा हुआ भोजन अथवा बासी अन्नको भी वैश्वदेव-होममें त्याग दे। हाथमें कुश धारण करके आचमन और प्राणायाम करे। फिर 'पृष्टो दिवि०' इत्यादि मन्त्रसे दो बार अग्निका पर्युक्षण करके कुशास्तरण करे। फिर वैदिक मन्त्रसे अग्निको अपने अभिमुख करके गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिके द्वारा पूजा करे। फिर अपनी शाखामें बतायी हुई विधिके अनुसार विद्वान् पुरुष होम करे। राह चलनेवाला पथिक, जिसकी जीविका नष्ट हो गयी हो ऐसा पुरुष, विद्यार्थी, गुरुका पालन-पोषण करनेवाला पुरुष, संन्यासी और ब्रह्मचारी—ये छः धर्मभिक्षुक माने गये हैं*। चाण्डाल और कुत्तेको भी दिया हुआ अन्न निष्फल नहीं होता। अतः अन्नकी याचना करनेके लिये कोई आवे तो उसके अपाय होनेका विचार नहीं करना चाहिये। कुत्ते, पतित, चाण्डाल, पापरोगी, काक और कीड़ोंके लिये घरसे बाहर पृथ्वीपर अन्न डाल देना चाहिये। कौओंको
* अध्वगः क्षीणवृत्तिश्च विद्यार्थी गुरुपोषकः। यतिश्च ब्रह्मचारी च षडेते धर्मभिक्षुकाः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। १२६)