भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 637, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 637
६०८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जबतक मलका लेप और दुर्गन्ध मिट न जाय,तदनन्तर धर्मशास्त्रोंमें बताये हुए नियमोंके अनुसार
तबतक उसे धोना ही चाहिये। ब्रह्मचर्य आदिदन्तधावन करे; क्योंकि आचमन करनेवाला
तीन आश्रमोंमें क्रमशः दुगुने शौचका विधान है।मनुष्य भी यदि दन्तधावन न करे तो वह
दिनमें जो शौचका विधान है, उससे आधा रात्रिमेंअपवित्र ही माना गया है। प्रतिपदा, अमावास्या,
करना चाहिये। पराये गाँवमें उससे आधा औरषष्ठी, नवमी तथा रविवारको काठकी दाँतन
मार्गमें उससे भी आधे शौचका विधान है।न करे। जिस दिन दाँतन निषिद्ध है, उस दिन
रोगीके लिये उससे भी आधे शौचका नियममुखकी शुद्धिके लिये बारह बार कुल्ला करना
है। परंतु जब मनुष्य स्वस्थ हो जाय, तबचाहिये। कनिष्ठा अंगुलीके बराबर मोटी, बारह
शौचसम्बन्धी नियमोंके पूर्ण पालनमें कमी नअंगुल लंबी, हरी, गीली लकड़ी, जिसका
करे। हाथ-पैरोंकी शुद्धिके पश्चात् मनुष्य पवित्रछिलका उतारा न गया हो तथा जिसमें छेद
भूमिमें बैठकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करकेया रोग न हो, दाँतनके लिये उपयुक्त मानी
जलसे कुल्ला करे। उस जलमें भूसी, कोयला,गयी है। दन्तधावनके काष्ठका अग्रभाग एक
अस्थि एवं भस्मका संसर्ग नहीं रहना चाहिये।अंगुलतक चबाना चाहिये फिर उसीके कूँचेसे
अत्यन्त शुद्ध एवं स्वच्छ जलसे आचमन करे।दाँतोंको रगड़कर साफ करना और जलसे कुल्ला
आचमनमें इतना जल पीये कि वह हृदयतककरना चाहिये। शरीरशुद्धिके लिये प्रातःकाल
पहुँच सके। इस कार्यमें जल्दी नहीं करनीस्नान करना चाहिये। यदि तीर्थ (तालाब या
चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे। आचमनकेनदी)-का जल मिल जाय तो विशेष उत्तम है।
लिये जल लेते समय उसे भलीभाँति दृष्टिशरीरके नौ छिद्रोंसे दिन-रात मल निकलता
डालकर देख ले। वह पवित्र हो तभी उसकारहता है, अतः वह सदा मलिन है। प्रातःकाल
उपयोग करे। यदि दोनों पैरोंको न धोये तोस्नान करनेसे इसकी शुद्धि होती है। प्रातःकालका
आचमन करनेपर भी मनुष्य अशुद्ध ही मानास्नान प्राजापत्य व्रतके समान पापनाशक माना
जाता है। अपनी शुद्धिके लिये मनुष्य तीन बारगया है। वह उत्साह, मेधा, सौभाग्य, रूप तथा
जल पीकर आँख, कान आदि इन्द्रियछिद्रोंकासम्पदाको बढ़ानेवाला है। वह दरिद्रता, पाप,
स्पर्शद्वारा शुद्ध करे। अंगूठेके मूल भागसे अपनेग्लानि, अपवित्रता और दुःस्वप्नका नाश करनेवाला
ओठोंको पोंछे, जलसे हृदयका स्पर्श करकेहै तथा तुष्टि और पुष्टि प्रदान करनेवाला है।
समस्त अंगुलियोंसे मस्तकका स्पर्श करे। जलसहितनृपश्रेष्ठ! अब मैं प्रसंगवश स्नानकी विधिका
अंगुलियोंके अग्रभागसे दोनों कन्धोंका स्पर्शवर्णन करता हूँ; क्योंकि विद्वानोंने विधिपूर्वक
करे। सड़क या गलीमें घूम आनेपर आचमनकिये हुए स्नानका महत्त्व साधारण स्नानसे
किया हुआ मनुष्य भी फिर आचमन करे। स्नान,सौगुना अधिक बताया है। विशुद्ध कुशा लेकर
भोजन और जलपान करनेपर, शुभ कर्मकेपवित्र स्थानपर रखे और आचमन करके स्नान
प्रारम्भमें, सोकर उठनेपर, वस्त्र बदलने या नूतनकरे। हाथमें कुश लेकर, शिखा बाँधकर जलके
वस्त्र धारण करनेपर, कोई अमांगलिक वस्तुभीतर प्रवेश करे और अपनी शाखामें बतायी
दीख जानेपर अथवा भूलसे किसी अपवित्रहुई विधिके अनुसार विधिपूर्वक स्नान करे। इस
वस्तुको छू लेने या उसकी याद कर लेनेपरप्रकार स्नानकार्य समाप्त करके वस्त्र निचोड़कर
दो बार आचमन करनेसे मनुष्य शुद्ध होता है।दो नूतन वस्त्र धारण करे। फिर आचमन करके