संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६०८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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| जबतक मलका लेप और दुर्गन्ध मिट न जाय, | तदनन्तर धर्मशास्त्रोंमें बताये हुए नियमोंके अनुसार |
| तबतक उसे धोना ही चाहिये। ब्रह्मचर्य आदि | दन्तधावन करे; क्योंकि आचमन करनेवाला |
| तीन आश्रमोंमें क्रमशः दुगुने शौचका विधान है। | मनुष्य भी यदि दन्तधावन न करे तो वह |
| दिनमें जो शौचका विधान है, उससे आधा रात्रिमें | अपवित्र ही माना गया है। प्रतिपदा, अमावास्या, |
| करना चाहिये। पराये गाँवमें उससे आधा और | षष्ठी, नवमी तथा रविवारको काठकी दाँतन |
| मार्गमें उससे भी आधे शौचका विधान है। | न करे। जिस दिन दाँतन निषिद्ध है, उस दिन |
| रोगीके लिये उससे भी आधे शौचका नियम | मुखकी शुद्धिके लिये बारह बार कुल्ला करना |
| है। परंतु जब मनुष्य स्वस्थ हो जाय, तब | चाहिये। कनिष्ठा अंगुलीके बराबर मोटी, बारह |
| शौचसम्बन्धी नियमोंके पूर्ण पालनमें कमी न | अंगुल लंबी, हरी, गीली लकड़ी, जिसका |
| करे। हाथ-पैरोंकी शुद्धिके पश्चात् मनुष्य पवित्र | छिलका उतारा न गया हो तथा जिसमें छेद |
| भूमिमें बैठकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके | या रोग न हो, दाँतनके लिये उपयुक्त मानी |
| जलसे कुल्ला करे। उस जलमें भूसी, कोयला, | गयी है। दन्तधावनके काष्ठका अग्रभाग एक |
| अस्थि एवं भस्मका संसर्ग नहीं रहना चाहिये। | अंगुलतक चबाना चाहिये फिर उसीके कूँचेसे |
| अत्यन्त शुद्ध एवं स्वच्छ जलसे आचमन करे। | दाँतोंको रगड़कर साफ करना और जलसे कुल्ला |
| आचमनमें इतना जल पीये कि वह हृदयतक | करना चाहिये। शरीरशुद्धिके लिये प्रातःकाल |
| पहुँच सके। इस कार्यमें जल्दी नहीं करनी | स्नान करना चाहिये। यदि तीर्थ (तालाब या |
| चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मतीर्थसे आचमन करे। आचमनके | नदी)-का जल मिल जाय तो विशेष उत्तम है। |
| लिये जल लेते समय उसे भलीभाँति दृष्टि | शरीरके नौ छिद्रोंसे दिन-रात मल निकलता |
| डालकर देख ले। वह पवित्र हो तभी उसका | रहता है, अतः वह सदा मलिन है। प्रातःकाल |
| उपयोग करे। यदि दोनों पैरोंको न धोये तो | स्नान करनेसे इसकी शुद्धि होती है। प्रातःकालका |
| आचमन करनेपर भी मनुष्य अशुद्ध ही माना | स्नान प्राजापत्य व्रतके समान पापनाशक माना |
| जाता है। अपनी शुद्धिके लिये मनुष्य तीन बार | गया है। वह उत्साह, मेधा, सौभाग्य, रूप तथा |
| जल पीकर आँख, कान आदि इन्द्रियछिद्रोंका | सम्पदाको बढ़ानेवाला है। वह दरिद्रता, पाप, |
| स्पर्शद्वारा शुद्ध करे। अंगूठेके मूल भागसे अपने | ग्लानि, अपवित्रता और दुःस्वप्नका नाश करनेवाला |
| ओठोंको पोंछे, जलसे हृदयका स्पर्श करके | है तथा तुष्टि और पुष्टि प्रदान करनेवाला है। |
| समस्त अंगुलियोंसे मस्तकका स्पर्श करे। जलसहित | नृपश्रेष्ठ! अब मैं प्रसंगवश स्नानकी विधिका |
| अंगुलियोंके अग्रभागसे दोनों कन्धोंका स्पर्श | वर्णन करता हूँ; क्योंकि विद्वानोंने विधिपूर्वक |
| करे। सड़क या गलीमें घूम आनेपर आचमन | किये हुए स्नानका महत्त्व साधारण स्नानसे |
| किया हुआ मनुष्य भी फिर आचमन करे। स्नान, | सौगुना अधिक बताया है। विशुद्ध कुशा लेकर |
| भोजन और जलपान करनेपर, शुभ कर्मके | पवित्र स्थानपर रखे और आचमन करके स्नान |
| प्रारम्भमें, सोकर उठनेपर, वस्त्र बदलने या नूतन | करे। हाथमें कुश लेकर, शिखा बाँधकर जलके |
| वस्त्र धारण करनेपर, कोई अमांगलिक वस्तु | भीतर प्रवेश करे और अपनी शाखामें बतायी |
| दीख जानेपर अथवा भूलसे किसी अपवित्र | हुई विधिके अनुसार विधिपूर्वक स्नान करे। इस |
| वस्तुको छू लेने या उसकी याद कर लेनेपर | प्रकार स्नानकार्य समाप्त करके वस्त्र निचोड़कर |
| दो बार आचमन करनेसे मनुष्य शुद्ध होता है। | दो नूतन वस्त्र धारण करे। फिर आचमन करके |