भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 638
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य *६०९

कुश हाथमें लिये हुए ही प्रातःकालकी सन्ध्या करे। अपने मनको दृढ़तापूर्वक संयममें रखकर प्राणायाम करनेवाला ब्राह्मण दिन और रातमें किये हुए पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। यदि मनको संयममें रखकर दस या बारह बार प्राणायाम कर लिये जायँ तो ऐसा मानना चाहिये कि उस पुरुषने बड़ी भारी तपस्या कर ली। व्याहृति और प्रणवके साथ किये हुए सोलह प्राणायाम यदि प्रतिदिन होते रहें तो एक मासमें वे भ्रूणहत्या करनेवाले पापीको भी पवित्र कर देते हैं। जैसे पार्थिव धातुओंका मल आगमें तपानेसे जल जाता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंद्वारा किये हुए दोष प्राणायामसे भस्म हो जाते हैं। नृपश्रेष्ठ! प्रणव परब्रह्म है। प्राणायाम उत्तम तपस्या है और गायत्रीसे बढ़कर दूसरा कोई पवित्र करनेवाला मन्त्र नहीं है। मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा रातमें जो पाप करता है, वह प्रातःसन्ध्याकी उपासना करते हुए प्राणायामोंके द्वारा शुद्ध कर देता है। इसी प्रकार मन, वाणी और क्रियाद्वारा दिनमें जो पाप करता है, उसे सायंकालकी सन्ध्योपासनामें प्राणायामोंके द्वारा नष्ट कर डालता है। सायंकालकी सन्ध्या करनेवाला पुरुष दिनमें किये हुए पापका नाश करता है। जो प्रातःकाल और सायंकालकी सन्ध्या नहीं करता, वह समस्त ब्राह्मणोचित कर्मोंसे शूद्रकी भाँति बाहर कर देने योग्य है*।

प्राणायामके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। फिर 'आपो हिष्ठा मयो भुवः' इत्यादि तीन ऋचाओंद्वारा मार्जन करे। पृथ्वीपर, मस्तकपर, आकाशमें, आकाशमें, पृथ्वीपर, मस्तकपर, मस्तकपर, आकाशमें तथा भूमिपर—इस तरह नौ बार नौ स्थानोंमें जल छिड़कना चाहिये। यहाँ भूमि या पृथ्वी शब्दसे दोनों चरण लिये गये हैं। आकाशका अर्थ हृदय माना गया है। सिर या मस्तक शब्द अपने प्रसिद्ध अर्थमें ही है। इस प्रकार इन्हीं अंगोंका मार्जन उक्त मन्त्रोंद्वारा बताया गया है। स्नान छः प्रकारके होते हैं—वारुण स्नान (जलसे किया हुआ स्नान), आग्नेय स्नान (अग्निकी लपटोंसे अपने अंगोंको तपाना या सर्वांगसे धूप-सेवन करना), वायव्य स्नान (स्वच्छ वायुका सेवन), ऐन्द्र स्नान (वर्षाके जलसे नहाना), मन्त्र स्नान (मन्त्रोच्चारण और श्रवणसे अपनेको शुद्ध करना) तथा ब्राह्म स्नान (वेद-मन्त्रोंद्वारा मार्जन या अभिषेक)। इनमें पूर्वोक्त सभी स्नानोंकी अपेक्षा यह ब्राह्म-स्नान (मार्जन) अधिक उत्तम है। जो ब्राह्म-स्नानकी विधिसे स्नान करता है, वह बाहर और भीतरसे भी शुद्ध हो जाता है तथा सर्वत्र देवपूजा आदि कर्मोंमें सम्मिलित होनेकी योग्यता प्राप्त कर लेता है; क्योंकि इससे अन्तःशुद्धि एवं भावशुद्धि हो जाती है। केवल जलस्नानसे ही कोई परम शुद्ध नहीं माना जाता। जो भावसे दूषित हैं, वे सैकड़ों बार स्नान करके भी शुद्ध नहीं होते। जिसका चित्त निर्मल है, उसीने सब तीर्थोंमें स्नान किया है, वही सब प्रकारके मलोंसे रहित है और उसीने सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया है।

चित्त जिस प्रकार निर्मल होता है, वह


* एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः। गायत्र्यास्तु परं नास्ति पावनं च नृपोत्तम ॥
कर्मणा मनसा वाचा यद्रात्रौ कुरुते त्वघम्। उत्तिष्ठन् पूर्वसन्ध्यायां प्राणायामैर्विशोधयेत् ॥
यदह्ना कुरुते पापं मनोवाक्कायकर्मभिः। आसीनः पश्चिमां सन्ध्यां प्राणायामैर्व्यपोहति ॥
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम्। नोपतिष्ठेत्तु यः पूर्वा नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम् ॥
स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः।
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। ७३–७६)