भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 636

* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०७


छः वैरियोँको जीतकर मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। दूसरोंको कष्ट न देते हुए परलोकमें सहायता देनेवाले धर्मका धीरे-धीरे संग्रह करे। यदि धर्मकी भलीभाँति रक्षा की जाय तो वही परलोकमें सहायक होता है। पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बन्धुजनोंसे भी बढ़कर मनुष्यका सहायक धर्म ही है। जीव अकेला ही जन्म लेता, अकेला मरता, अकेला पुण्य भोगता और अकेला ही पापका उपभोग करता है। मृत्यु हो जानेपर इस शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी भाँति त्यागकर भाई-बन्धु मुँह फेर लेते हैं। परलोकमें जाते हुए जीवके साथ केवल उसका धर्म ही जाता है*। अतः धर्मका संग्रह अवश्य करे। धर्म ही इस लोक और परलोकमें सहायक होता है। धर्मकी सहायता पाकर जीव नरकके दुस्तर अन्धकारसे पार हो जाता है। बुद्धिमान् पुरुष सदा उत्तम-उत्तम पुरुषोंके साथ सम्बन्ध जोड़े। अधम कोटिके मनुष्योंका संग छोड़कर अपने कुलको उन्नतिशील बनावे। सद्धर्मके पालनसे ब्राह्मण श्रेष्ठताको प्राप्त होता है। जो स्वाध्याय नहीं करता, सदाचारका उल्लंघन करता है, आलसी और दूषित अन्न खानेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको यमराज कष्ट देते हैं। अतः ब्राह्मण प्रयत्नपूर्वक सदाचारका पालन करे।

रात्रिके अन्तमें आधे पहरका समय ब्राह्ममुहूर्त कहलाता है। उस समय उठकर विद्वान् पुरुष सर्वदा अपने हितका चिन्तन करे। फिर गणेश, शिव, पार्वती, श्रीरंग (विष्णु), लक्ष्मी, ब्रह्मा, इन्द्रादि देवता, वसिष्ठ आदि मुनि, गंगा आदि नदी, श्रीशैल आदि पर्वत, क्षीरसागर आदि समुद्र, मानसरोवर आदि तड़ाग, कामधेनु आदि गौ तथा प्रह्लाद आदि भगवद्भक्त पुरुषोंका स्मरण करे। माताके चरण सब तीर्थोंसे भी अधिक उत्तम हैं, अतः उनका स्मरण करके पिता और गुरुका भी हृदयमें ध्यान करे। तत्पश्चात् आवश्यक कार्य (शौच आदि) करनेके लिये नैर्ऋत्य कोणकी ओर जाय। गाँवसे सौ धनुष दूर जाना चाहिये और नगरसे चार सौ धनुष। वहाँ तिनकेसे पृथ्वीको आच्छादित करके अपने मस्तकको भी कपड़ेसे अच्छी तरह ढक ले। यज्ञोपवीतको कानपर चढ़ाकर उत्तरकी ओर मुँह किये हुए मौनभावसे बैठकर मल-मूत्रका त्याग करे। उत्तराभिमुख बैठनेका नियम दिनमें और दोनों सन्ध्याओंके समय है। रात्रिमें शौच आदिके लिये दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके बैठना चाहिये। खड़े होकर मल-मूत्रका त्याग न करे। इस कार्यमें जल्दबाजी भी न करे। ब्राह्मण, गौ, अग्नि तथा आती हुई वायुकी ओर मुँह करके भी शौचके लिये न बैठे। फालसे जोती हुई भूमिमें, सड़कपर और उठने-बैठनेके योग्य भूमिमें मल-मूत्रका त्याग न करे। मलोत्सर्गके समय चारों दिशाओंकी ओर न देखे। ग्रह और नक्षत्रोंकी ओर दृष्टि न डाले। ऊपर आकाशकी ओर न ताके। मलकी ओर भी दृष्टिपात न करे। मलत्यागके पश्चात् मनुष्य कंकड़ आदिसे रहित चिकनी मिट्टी ले। वह मिट्टी चूहोंकी खोदी हुई या शौचसे बची हुई या केश आदिसे मिली हुई नहीं होनी चाहिये। बायें हाथसे गुदामें एक बार मिट्टी लगाकर उसे जलसे धो डाले। इसी प्रकार पाँच बार मिट्टी लगाकर गुदाको धोये। एक-एक बार दोनों पैरोंमें मिट्टी लगाकर धोये और दोनों हाथोंको तीन-तीन बार मृत्तिकालेपनपूर्वक धोये। गृहस्थ पुरुष इसी प्रकार शौचकी शुद्धि करे।


* जायते चैकलः प्राणी म्रियते च तथैकलः। एकलः सुकृतं भुङ्क्ते भुङ्क्ते दुष्कृतमेकलः॥
देहे पञ्चत्वमापन्ने त्यक्त्वैकं काष्ठलोष्टवत्। बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मो यान्तमनुव्रजेत्॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ५। २४-२६)