भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५९४ संक्षिप्त स्कन्दपुराण


सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! अब मैं सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम बतलाता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। श्रेष्ठ बुद्धिवाला पुरुष स्नान और आचमन करके विशुद्धचित्त हो नित्यकर्म पूरा कर ले। उसके बाद भगवान् रामेश्वर शिव तथा राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन करावे। फिर सब अंगोंमें भस्म धारण करके मस्तकमें त्रिपुण्ड्र अथवा गोपीचन्दनसे तिलक करे। रुद्राक्षकी माला धारण करके हाथमें पवित्री पहन ले और पवित्रतापूर्वक यह संकल्प करे कि 'मैं सेतुतीर्थकी यात्रा करूँगा।' तत्पश्चात् भक्तिभावसे अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए मौनावलम्बनपूर्वक अपने घरसे निकले। अथवा शिवजीका पंचाक्षर नाममन्त्र जपता रहे। मनको वशमें रखे। प्रतिदिन एक बार हविष्यान्न भोजन करे। क्रोध और इन्द्रियोंको काबूमें रखे। जूता, खड़ाऊँ अथवा छाता न धारण करे। पान न खाये। तेल न लगावे। स्त्री-प्रसंग आदिसे बचकर रहे। शौच-सन्तोष आदि नियमोंके तथा सदाचारके पालनमें तत्पर रहे। समयपर सन्ध्योपासना करे। तीनों समय गायत्रीकी उपासना और श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करता रहे। मार्गमें सेतुतीर्थकी महिमाका प्रतिदिन आदरपूर्वक पाठ करे अथवा रामायण या किसी अन्य पुराणका पाठ करे। व्यर्थकी बातें छोड़कर सेतुतीर्थकी यात्रा करे। आत्मशुद्धिके लिये प्रतिग्रह न स्वीकार करे। सदाचारको न छोड़े। मार्गमें शिव-विष्णु आदिकी पूजा तथा बलिवैश्वदेवादि कर्म करता रहे। ब्रह्मयज्ञ आदि धर्म, अग्निहोत्र कर्म तथा शक्तिके अनुसार अतिथियोंको अन्न-पान आदिका दान करे। रास्तेमें भगवान् शिव और विष्णु आदिके नाम जपे तथा उनके स्तोत्रोंका पाठ करे। निषिद्ध कर्मोंको सर्वथा त्याग दे और सदा धर्मका ही आचरण करे। इस प्रकारके नियमोंका पालन करते हुए पहले सेतुमूल स्थानको जाय। वहाँ एकाग्रचित्त हो समुद्रका आवाहन करके उसे प्रणाम करे। तदनन्तर समुद्रके लिये अर्घ्य दे। अर्घ्यके पश्चात् भगवान्‌से आज्ञा लेकर समुद्रमें स्नान करे। मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए मुनि, देवता, वानर और पितरोंके लिये तर्पण करे।

समुद्रको प्रणाम करनेका मन्त्र

नमस्ते विश्वगुप्ताय नमो विष्णो ह्यपाम्पते।
नमो हिरण्यशृङ्गाय नदीनां पतये नमः ॥

'विश्वमें गुप्तस्वरूपसे व्यापक एवं जलोंके स्वामी श्रीविष्णुदेव*! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हिरण्यमय शृंगसे सुशोभित नदीपति सागर! आपको नमस्कार है।'

अर्घ्यदानका मन्त्र

सर्वरत्नमयः श्रीमान् सर्वरत्नाकराकर।
सर्वरत्नप्रधानस्त्वं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥

'सब रत्नोंके आकर महासागर! तुम सर्वरत्नमय एवं श्रीसम्पन्न हो। तुम्हीं सब रत्नोंमें प्रधान हो। मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार करो।'

भगवान्‌से आज्ञा लेनेका मन्त्र

अशेषजगदाधार शंखचक्रगदाधर।
देहि देव ममानुज्ञां युष्मत्तीर्थनिषेवणे ॥

'सम्पूर्ण जगत्‌के आधार शंख-चक्र-गदाधारी नारायण! अपने तीर्थका सेवन करनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये।'

सेतुकी पूर्व दिशामें सुग्रीवका, दक्षिणमें नलका, पश्चिममें मयन्दका, उत्तरमें द्विविदका और मध्यमें श्रीराम, लक्ष्मण, यशस्विनी सीता, अंगद, वायुपुत्र


* 'सरसामस्मि सागरः' इस भगवद्वचनके अनुसार समुद्र भगवान्‌की विभूति है। इसलिये उसे 'विष्णु' कहा गया है।