संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 622, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९३
ही प्रेरणासे मेरी प्रिया लक्ष्मी तुम्हारे घर आयी थीं और तुमने इनका भलीभाँति संरक्षण किया है। अतः मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। संसारमें जो पुरुष मेरी स्वरूपभूता इन महालक्ष्मीमें भक्ति रखता है, वह मेरा भक्त कहलाता है और जो इनसे विमुख है, वह मेरा द्वेषपात्र माना गया है। तुमने भक्तिपूर्वक इनका पूजन किया है, अतः तुम्हारे द्वारा मेरी भी पूजा सम्पन्न हो गयी; क्योंकि ये लक्ष्मी मुझसे अभिन्न हैं। इसलिये तुमने मेरा अपराध नहीं, पूजन ही किया है। मेरी स्वरूपभूता लक्ष्मी सम्पूर्ण जगत्की माता तथा वेदत्रयीरूपा हैं। उनकी रक्षा करते हुए जो तुमने मुझे बन्धनमें डाला है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। ये लक्ष्मी वास्तवमें तुम्हारी पुत्री हैं।
भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेके पश्चात् लक्ष्मीने भी कहा—राजन् ! तुमने अपने घरमें मेरी रक्षा की, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारी भक्तिका शोधन करनेके लिये ही मैं और भगवान् दोनों यहाँ आये हैं। तुम्हारे मनःसंयमरूप योग और भक्तिभावसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हम दोनोंकी कृपासे तुम्हें सदा सुखकी प्राप्ति होगी। हमारे चरणोंमें तुम्हारी अविचल भक्ति बनी रहेगी और देहावसान होनेपर तुम्हें पुनरावृत्तिरहित मेरा सायुज्य मोक्ष प्राप्त होगा। भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त तुम्हारी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहेगी।
तदनन्तर भगवान् विष्णुने पुनः इस प्रकार कहा—नृपश्रेष्ठ! तुमने जिस प्रकार मुझे यहाँ बेड़ीसे बाँधा है, उसी रूपसे मैं इस मण्डपमें निवास करूँगा। 'सेतुमाधव' के नामसे यहाँ मेरी प्रसिद्धि होगी। जो मनुष्य यहाँ मुझ सेतुमाधवकी सेवा करेंगे, वे सम्पूर्ण मनोरथों और अन्तमें सायुज्य मोक्षको भी प्राप्त होंगे। तुम्हारे द्वारा किये हुए मेरे तथा लक्ष्मीजीके स्तोत्रको जो प्रसन्नतापूर्वक पढ़ेंगे, सुनेंगे और लिखेंगे, उनकी मेरे परमधामसे कभी पुनरावृत्ति नहीं होगी। राजा पुण्यनिधिसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु सदा पूर्णरूपसे वहाँ निवास करने लगे हैं। राजाने सेतुमाधवरूपी भगवान् विष्णुको प्रणाम करके भक्तिभावसे उनकी महापूजा की और श्रीरामेश्वरका सेवन करके अपने घरको प्रस्थान किया। मथुरामें उन्होंने अपने पुत्रको राजा बना दिया और स्वयं जीवनभर उस परम उत्तम सेतुतीर्थमें निवास किया। देहावसान होनेपर राजाने मोक्ष प्राप्त कर लिया। उनकी पत्नी विन्ध्यावली भी उन्हींके साथ मृत्युको प्राप्त हुई। उस पतिव्रताने भी पतिके साथ उत्तम गति प्राप्त कर ली।
जो सेतुतीर्थमें भक्तिपूर्वक प्रतिदिन सेतुमाधवका दर्शन करते हैं, उनकी कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो सेतुतीर्थकी रेणुका लेकर गंगाजीमें डालता है, वह मृत्युके पश्चात् भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो गंगाजीका जल लाकर भगवान् रामेश्वरको स्नान कराता और उसके भारको सेतुतीर्थमें रखता है, वह निश्चय ही परब्रह्मको प्राप्त होता है। ब्राह्मणो ! इस प्रकार तुमसे भगवान् सेतुमाधवकी महिमाका वर्णन किया गया।