भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 646
  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * | ६१७ ---|---

उसे श्रद्धा और विधिके साथ जो धन दिया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है।

भूमिदान करनेवाला मण्डलेश्वर होता है, अन्नदाता सर्वत्र सुखी होता है और जल देनेवाला सुन्दर रूप पाता है। भोजन देनेवाला हृष्ट-पुष्ट होता है। दीप देनेवाला निर्मल नेत्रसे युक्त होता है। गोदान देनवाला सूर्यलोकका भागी होता है। सुवर्ण देनेवाला दीर्घायु और तिल देनेवाला उत्तम प्रजासे युक्त होता है। घर देनेवाला बहुत ऊँचे महलोंका मालिक होता है। वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोकमें जाता है। घोड़ा देनेवाला दिव्य शरीरसे युक्त होता है। बैल देनेवाला लक्ष्मीवान् होता है। पालकी देनेवाला सुन्दर स्त्री पाता है। उत्तम पलंग देनेवालेको भी यही फल मिलता है। जो श्रद्धापूर्वक दान देता और श्रद्धापूर्वक ग्रहण करता है, वे दोनों स्वर्गलोकके अधिकारी होते हैं तथा अश्रद्धासे दोनोंका अधःपतन होता है। झूठ बोलनेसे यज्ञका फल नष्ट होता है। अपने तपको लेकर आश्चर्य प्रकट करनेसे तपस्या क्षीण होती है और दानके बिना कीर्तिका नाश होता है। गन्ध, पुष्प, कुश, गौ, दूध, दही, साग, मधु, जल, फल, मूल, ईंधन और अभयदक्षिणा—ये वस्तुएँ निकृष्ट मनुष्यसे भी प्राप्त हों तो ग्रहण करनी चाहिये।

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पतिव्रता स्त्रियोंके बर्ताव, धर्म और नियम तथा श्राद्ध और धर्मारण्यका महत्त्व

**व्यासजी कहते हैं—**जो मनुष्य धर्मवापीमें पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक कि चौदह इन्द्र बीत नहीं जाते। यहाँ पितरोंकी भी पूजा करनी चाहिये। जो पूर्वज पितर स्वर्गमें गये हों, उन सबके लिये इस मोक्षदायिनी वापीके तटपर जाकर पिण्डदान करना चाहिये। त्रेतामें पाँच दिनोंतक और द्वापरमें तीन दिनोंतक श्राद्ध करनेसे जो फल मिलता है, वही कलियुगमें एकचित्त होकर जो एक पिण्डदान देता है, उसको भी मिल जाता है। कलियुग आनेपर संसारके मनुष्य लोलुप और पर-स्त्री-लम्पट हो जाते हैं एवं स्त्रियाँ अत्यन्त चपल हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष और नपुंसक—ये सब दूसरोंसे द्रोह करनेवाले, परनिन्दापरायण तथा सदैव दूसरोंके छिद्र देखनेवाले होते हैं; दूसरोंको उद्वेगमें डालनेवाले, झगड़ालु और दो मित्रोंमें फूट पैदा करनेवाले होते हैं। वे सब भी इस धर्मारण्यमें आकर पवित्र हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनोंने अपने श्रीमुखसे धर्मारण्यकी ऐसी महिमा बतलायी है। महाभाग! इस प्रकार मैंने धर्मारण्यका वर्णन किया। जो इसका पठन करते हैं अथवा इस तीर्थका सेवन करते हैं, वे मन, वाणी और शरीरसे शुद्ध होते हैं। जो परायी स्त्रियोंसे मुँह मोड़ लेते हैं, कहीं भी द्रोह न करके सर्वत्र समबुद्धि रखते हैं, शुद्धाचारी और माता-पिताके भक्त होते हैं, उनमें लोभ और चपलता नहीं होती। वे दान-धर्ममें तत्पर, आस्तिक, धर्मज्ञ और स्वामिभक्ति-परायण होते हैं। जो स्त्री इस तीर्थका सेवन करती है, वह पतिव्रता और पतिसेवामें तत्पर रहनेवाली होती है। धर्मारण्यके सेवनसे सब मनुष्य अहिंसक, अतिथिपूजक और सदा स्वधर्मपरायण होते हैं।

**शौनकजी बोले—**सब धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महाभाग सूतजी! पतिव्रता स्त्रियोंका कैसा लक्षण होता है, यह बतलाइये।

सूतजी बोले—(गुरुदेव व्यासजीने राजा युधिष्ठिरको यह बात इस प्रकार बतायी थी) जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री होती है, उसका जीवन सफल हो जाता है। उसके अंगोंकी छायाके