भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 647

६१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


तुल्य उसकी कथा भी पुण्यकारक होती है। पतिव्रता स्त्रियाँ अरुन्धती, सावित्री, अनसूया, शाण्डिली, सती, लक्ष्मी, शतरूपा, सुनीति, संज्ञा और स्वाहाके समान होती हैं। पतिव्रताओंके धर्म मुनिवर व्यासजीने इस प्रकार बतलाये हैं— पतिव्रता स्त्री पतिके भोजन कर लेनेपर भोजन करती है, उनके खड़े रहनेपर स्वयं भी खड़ी रहती हैं, पतिके सो जानेपर सोती है और पहले ही जाग उठती है। स्वामी यदि दूसरे देशमें हो, तो वह अपने शरीरका श्रृंगार नहीं करती अथवा यदि किसी कार्यवश पति बाहर जायँ तो वह सब प्रकारके आभूषणोंको उतार देती है। पतिकी आयु बढ़े, इस उद्देश्यसे वह कभी पतिके नामका उच्चारण नहीं करती। वह दूसरे पुरुषका नाम भी कभी नहीं लेती। पति चाहे कितनी ही खरी-खोटी बात क्यों न कह डाले, वह उसे नहीं कोसती। जब स्वामी कहते हैं कि 'यह कार्य करो' तब वह शीघ्र उत्तर देती 'जो आज्ञा नाथ! मैंने अभी इस कामको पूरा किया। आप यह समझ लें कि कार्य पूरा हो गया।' पतिके बुलानेपर वह घरका काम-काज छोड़कर तुरंत उनके पास दौड़ी जाती है और पूछती है— 'प्राणनाथ! किस लिये दासीको बुलाया है? मुझे सेवाका आदेश देकर अपने कृपाप्रसादकी भागिनी बनाइये।' वह घरके दरवाजेपर देरतक नहीं खड़ी होती। दरवाजेपर सोती-बैठती भी नहीं। जो वस्तु नहीं देने योग्य होती है, उसे वह स्वयं किसीको कभी नहीं देती। पतिव्रता स्त्रीको चाहिये कि स्वामीके लिये पूजनकी सामग्री बिना कहे ही जुटा दे। नित्य-नियमके लिये जल, कुशा, पत्र, पुष्प, अक्षत आदि प्रस्तुत करे और पतिकी प्रतीक्षामें खड़ी होकर जिस समय जो वस्तु आवश्यक हो, वह सब शीघ्र बिना किसी उद्वेगके अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रस्तुत करे। स्वामीके भोजनसे बचे हुए प्रसादस्वरूप अन्न और फल आदिको अत्यन्त प्रिय मानकर ग्रहण करे। सामाजिक उत्सवोंका दर्शन तो वह दूरसे ही त्याग दे। पतिकी आज्ञाके बिना वह तीर्थयात्राको और विवाहोत्सवोंको देखने आदिके लिये भी न जाय। पति सुखसे सोये हों, सुखसे बैठे हों या स्वेच्छानुसार किसी कार्य अथवा विचारमें रम रहे हों, तो कार्यमें विघ्न आनेपर भी उन्हें कभी न उठावे। रजस्वला होनेपर वह तीन राततक पतिको अपना मुँह न दिखावे। जबतक स्नान करके शुद्ध न हो जाय, तबतक अपनी आवाज भी पतिके कानोंमें न पड़ने दे। भलीभाँति स्नान कर लेनेपर सबसे पहले पतिके ही मुखका दर्शन करे, दूसरे किसीका नहीं। अथवा पतिदेव उपस्थित न हों तो मन-ही-मन उनका ध्यान करके सूर्यदेवका दर्शन करे। पतिकी आयु बढ़नेकी इच्छा रखनेवाली पतिव्रता स्त्री हल्दी, कुंकुम, सिन्दूर, कज्जल, चोली, पान, मांगलिक आभूषण, केशोंके श्रृंगार तथा हाथ और कान आदिके आभूषण अपने शरीरसे कभी अलग न करे। पतिसे विद्वेष रखनेवाली स्त्रीसे पतिव्रता नारी कभी बातचीत न करे। कभी अकेली न रहे और नंगी होकर न नहाये। ओखली, मूसल, झाडू, सिलवट, चक्की और चौखठ (देहली)-पर सती स्त्री कभी न बैठे। पतिके सम्मुख धृष्टता न करे। जहाँ-जहाँ पतिकी रुचि हो, वहाँ-वहाँ उसे भी प्रेम रखना चाहिये। स्त्रियोंके लिये यही सबसे उत्तम व्रत, यही महान् धर्म और यही पूजा है कि वह पतिकी आज्ञाका उल्लंघन न करे। नपुंसक, दुर्दशाग्रस्त, रोगी, वृद्ध, सुस्थिर अथवा दुःस्थिर कैसा भी पति क्यों न हो, उस पतिका वह कभी उल्लंघन न करे। वह लोहेके बरतनमें भोजन न करे। यदि उसे तीर्थस्नानकी इच्छा हो, तो वह प्रतिदिन पतिका चरणोदक पीये। उसके लिये शंकर और भगवान् विष्णुसे भी बढ़कर उसका