भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 648
  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६१९ पति ही है। जो स्त्री पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके व्रत और उपवास आदिका नियम करती है, वह पतिकी आयु हर लेती है और मरनेपर नरकमें जाती है।* जो नारी पतिके कोई बात कहनेपर क्रोधपूर्वक उसका उत्तर देती है, वह गाँवमें कुतिया और निर्जन वनमें सियारिन होती है। स्त्रियोंके लिये एकमात्र यही सर्वोत्तम नियम बताया गया है कि वह प्रतिदिन अपने पतिके चरणोंकी पूजा करके ही भोजन करे और दृढ़ निश्चयपूर्वक इस नियमका पालन करे। पतिसे ऊँचे आसनपर न बैठे। दूसरेके घरमें न जाय और कड़वी बातें कभी मुँहसे न निकाले। गुरुजनोंके समीप जोरसे न बोले तथा न किसीको पुकारे ही। जो खोटी बुद्धिवाली स्त्री पतिका साथ छोड़कर एकान्तमें विचरती है, वह वृक्षके खोंखलेमें सोनेवाली क्रूर उलूकी होती है। जो दूसरे पुरुषकी ओर कटाक्षसे देखती है, वह ऐंची आँखवाली हो जाती है। जो पतिको छोड़कर अकेली मिठाइयाँ उड़ाती है, वह गाँवकी विष्ठाभोजी सूकरी अथवा चमगादड़ होती है। जो हुंकार और त्वंकार करके (पतिके प्रति अनादरसूचक वचन कहकर) अप्रिय भाषण करती है, वह गूँगी होती है। जो सौतसे सदा ही ईर्ष्या रखती है, वह खोटे भाग्यवाली होती है। जो पतिकी आँख बचाकर किसी दूसरे पुरुषको निहारती है, वह कानी, विकृत मुखवाली अथवा कुरूपा होती है। पतिको बाहरसे आते देख जो तुरंत उठकर पानी और आसन देती है, पानका बीड़ा खिलाती है, पंखा करती, पाँव दबाती, प्रिय वचन बोलती और पसीना आदि दूर करके प्रियतमको सन्तुष्ट करती है, उसके द्वारा तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं। पिता, भाई और पुत्र- ये सब परिमित- नपी-तुली वस्तुएँ प्रदान करते हैं, परंतु पति अपनी पत्नीको अपरिमित दान करता है। इसके दानकी कोई सीमा नहीं होती। ऐसे पतिका कौन ऐसी स्त्री है, जो पूजन न करे? पति ही देवता है, पति ही गुरु है और पति ही धर्म, तीर्थ एवं व्रत है। अतः स्त्री सब छोड़कर एकमात्र पतिकी पूजा करे।† कन्याके विवाहकालमें ब्राह्मणलोग यह प्रतिज्ञा करवाते हैं कि तू पतिके जीवन और मरणमें भी उनकी सहचरी होकर रह। जो श्मशानमें जाते हुए स्वामीके शवके पीछे-पीछे घरसे (सती होनेके लिये) प्रसन्नतापूर्वक जाती है, उसे पग- पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। जैसे साँप पकड़नेवाला मनुष्य साँपको बलपूर्वक बिलसे बाहर निकाल लेता है, उसी प्रकार सती स्त्री अपने पतिको बलपूर्वक यमदूतोंके हाथसे छीनकर स्वर्गमें ले जाती है। पतिव्रता स्त्रीको देखकर यमदूत भाग जाते हैं, सूर्य भी उसके तेजसे सन्तप्त होते हैं और अग्निदेव भी उसके तेजकी आँचसे जलने लगते हैं। पतिव्रताका तेज देखकर सम्पूर्ण तेज काँप उठते हैं। अपने शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने करोड़ अयुत वर्षोंतक वह पतिके साथ स्वर्गसुख भोगती है और विहार करती है। संसारमें वह माता धन्य है, वह पिता धन्य है और वह पति धन्य है, जिनके घरमें पतिव्रता स्त्री शोभा पाती है। केवल पतिव्रता नारीके पुण्यसे उसके पिता, माता और पति- इन तीनों कुलोंकी तीन-तीन पीढ़ियाँ स्वर्गीय सुख भोगती हैं। दुराचारिणी स्त्रियाँ अपना शील
  • व्रतोपवासनियमं पतिमुल्लङ्घ्य या चरेत् । आयुष्यं हरते भर्तुर्मृता निरयम्ऋच्छति ॥ (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ७। ३७) † मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत् ॥ भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च। तस्मात् सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत् ॥ (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ७। ४७-४८) In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth