संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२१
हैं, उससे चाण्डाल आदि योनिके पितरोंकी तृप्ति होती है। वत्स! इस प्रकार श्राद्धसे अनेकानेक बान्धवोंकी तृप्ति होती है। यदि अन्नद्वारा श्राद्ध करनेकी शक्ति न हो तो केवल सागोंसे भी उसका अनुष्ठान हो सकता है। अतः मनुष्य भक्तिपूर्वक शाकसे भी श्राद्ध करे। श्राद्ध करनेवाले मनुष्यका कुल कभी दुःखमें नहीं पड़ता।
यदि धर्मारण्यमें सब पाप-ही-पाप किया गया तो निश्चय ही पाप भी बढ़ता है और उसे करनेवाला घोर नरकमें पकाया जाता है। जैसे पुण्य, वैसे पाप; धर्मारण्यमें किया हुआ सब शुभाशुभ कर्म अवश्य वृद्धिको प्राप्त होता है।
धर्मारण्यवासी ब्राह्मणोंके गोत्र तथा उनकी रक्षाके लिये कामधेनुद्वारा वैश्योंकी उत्पत्ति
**युधिष्ठिरने पूछा—**धर्मारण्यमें जिन श्रेष्ठ आचार-व्यवहारवाले ब्राह्मणोंने निवास किया, वे किस कुलमें उत्पन्न हुए थे?
**व्यासजी बोले—**नृपश्रेष्ठ! उन ऊर्ध्वरेता ऋषियों एवं महात्मा ब्राह्मणोंकी शाखा, प्रशाखा, पुत्र-पौत्र आदिकी संख्या बहुत हुई। मुख्य-मुख्य चौबीस गोत्रोंके नाम तुम्हें बतलाता हूँ—भारद्वाज, वत्स (प्रथम), कौशिक, कुश, शाण्डिल्य, काश्यप, गौतम, छान्दन, जातूकर्ण्य, वत्स (द्वितीय), वसिष्ठ, धारण, आत्रेय, भाण्डिल, लौकिक, कृष्णायन, उपमन्यु, गार्ग्य, मुद्गल, मौषक, पुण्यासन, पराशर, कौण्डिन्य तथा गांगासन। इन गोत्रोंमें उत्पन्न ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान्, नाना प्रकारके यज्ञानुष्ठानमें तत्पर, द्विजपूजन कर्ममें संलग्न, सत्कर्मपरायण तथा गुणवान् हुए। धर्मारण्यनिवासी सब ब्राह्मण सदाचारी, अत्यन्त दक्ष, वेद-शास्त्रपरायण, यज्ञकर्ता तथा सत्य और शौचाचारमें प्रवृत्त रहनेवाले हैं। राजा युधिष्ठिर! पहले वहाँके ब्राह्मणोंको यक्ष, राक्षस और पिशाच आदि व्याकुल किये रहते थे। तब उन ब्राह्मणोंने देवताओंसे कहा—'देवगण! यक्ष और राक्षस आदिसे हम सताये जाते हैं, अतः उनके भयसे हमलोग अब इस उत्तम स्थानको त्याग देंगे।' यह सुनकर देवताओंने लोकहितकी कामनासे ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये प्रत्येक गोत्रमें एक-एक योगिनीकी स्थापना की। जिस गोत्रकी रक्षा और पालनमें जो शक्ति समर्थ हुई, वह उस गोत्रकी कुलदेवी मानी गयी। श्रीमाता, तारणीदेवी, गोत्रपा, आशापूरी, इच्छार्तिनाशिनी, पिप्पली, विकारवशा, जगन्माता, महामाता, सिद्धा, भट्टारिका, कदम्बा, विकरा, मीठा, सुपर्णा, वसुजा, महादेवी, मातंगी, वाणी, मुकुटेश्वरी, भद्री, महाशक्ति संहारी, महाबला और महादेवी चामुण्डा। ये गोत्रोंकी माताएँ हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने वहाँ रक्षाके लिये उन गोत्रमातृकाओंकी स्थापना की है। वहाँके स्वधर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण उन सब योगिनियोंकी पूजा करने लगे। तभीसे योगिनियोंद्वारा वे अपने-अपने समयमें सुरक्षित हुए। सब ब्राह्मण स्वस्थ एवं पुत्र-पौत्रोंसे संयुक्त हो गये।
राजन्! सौ वर्ष बीतनेके पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु और शिव धर्मारण्यको देखनेके लिये प्रातःकाल सूर्योदयके समय उत्तम विमानपर बैठकर आये। उस समय ब्राह्मणलोग समिधा, पुष्प और कुशा लानेके लिये आश्रम छोड़कर सब दिशाओंमें चले गये थे। आश्रम सूना देखकर महादेवजीने भगवान्से कहा—'प्रभो! यहाँके ब्राह्मण बड़ा कष्ट पाते हैं, अतः इनकी सेवाके लिये कुछ सेवकोंकी व्यवस्था करूँ, ऐसा मेरा विचार हो रहा है।' भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर श्रीविष्णुने कहा—'ठीक है, ठीक है।' फिर वे ब्रह्माजीसे बोले—