संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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'ब्रह्मन्! आप यहाँके ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये कोई उपाय कीजिये।' भगवान् विष्णुका यह आदेश सुनकर ब्रह्माजीने कामधेनुका स्मरण किया। स्मरण करनेसे कामधेनु उसी क्षण वहाँ आ गयी।
तब ब्रह्माजीने कामधेनुसे कहा—मातः! इन ब्राह्मणोंमेंसे प्रत्येकके लिये दो-दो शुद्ध हृदयवाले अनुचरोंकी व्यवस्था करो। 'बहुत अच्छा' कहकर उस महाधेनुने खुरसे पृथ्वीको खोदा और हुंकार किया। इससे छत्तीस हजार शिखा-सूत्रधारी मनुष्य प्रकट हुए। वे सभी महाबली वैश्य थे। उन्होंने यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। वे सब शास्त्रोंमें चतुर, ब्राह्मणभक्त, ब्राह्मणोंका हित चाहनेवाले, तपस्वी, उत्तम आचारवाले और धार्मिक थे। उस समय एक-एक ब्राह्मणके लिये दो-दो अनुचर दिये गये। राजन्! ब्राह्मणका पहले जो गोत्र बताया गया है, वही उसके अनुचरका भी हुआ। तदनन्तर ब्रह्माजीने उनके हितके लिये कहा—'तुम सब लोग इन ब्राह्मणोंका वचन मानो और इन्हें जिस-जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, उसे ला दिया करो। प्रतिदिन समिधा, कुशा और फूल आदि ले आओ। सदा इनकी आज्ञाके अनुसार चलो, कभी इनका अनादर न करो। जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूडाकरण, उपनयन आदि संस्कार तथा जो व्रत, दान, उपवास आदि कर्म प्राप्त हों, उन्हें इन ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अनुसार ही करना चाहिये। इनकी आज्ञा लिये बिना जो दर्शयाग, श्राद्धकार्य या और कोई कर्म करेगा, वह दरिद्रता, पुत्रशोक एवं कीर्तिनाशको प्राप्त होगा।' तब उन अनुचरोंने 'बहुत अच्छा' कहकर देवताओंकी आज्ञा स्वीकार की। तदनन्तर वे इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता कामधेनुकी स्तुति करने लगे—'अनघे! तुम सब देवताओंकी माता और सब यज्ञोंका कारण हो। सब तीर्थोंमें तुम्हीं उत्तम तीर्थ हो। तुम्हें सदा नमस्कार है। तुम्हारे ललाटमें सूर्य, चन्द्रमा, अरुण तथा भगवान् शंकर विराजमान हैं। हुंकारमें सरस्वती वास करती हैं, गलेके कंबलमें नागोंका निवास है, खुरपृष्ठमें गन्धर्व और चारों वेद हैं तथा तुम्हारे मुखके अग्रभागमें समस्त चराचर तीर्थ हैं।' इस प्रकार भाँति-भाँतिके वचनोंसे प्रसन्न की हुई कामधेनु स्वर्गको चली गयी।
उन वैश्योंके विवाहके लिये भगवान् शंकर और यमने गन्धर्वोंकी कन्याओंको लाकर उनकी पत्नीके रूपमें स्थापित किया। 'विश्वावसु' नामसे प्रसिद्ध जो गन्धर्वोंके राजा हैं, उनके यहाँ साठ हजार कन्याएँ थीं। वे सभी रूप, यौवन और उदारतासे सम्पन्न थीं। उन्हींको वेदोक्त विधिसे देवताके समीप उन वैश्योंके लिये अर्पण किया। उस समय उन वैश्योंने गन्धर्वोंको, पूर्वज देवताओंको, सूर्य और चन्द्रमाको तथा यमराज और मृत्युको भी आज्यभाग दिया। विधिपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेके पश्चात् ही उन वैश्योंने उन कन्याओंका वरण (पाणिग्रहण) किया। तबसे लेकर आजतक गान्धर्व विवाह उपस्थित होनेपर देवता आज्यभाग ग्रहण करते हैं। जिन छत्तीस हजार धेनुकुमारोंकी चर्चा की गयी है, उनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या