संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६३१
शरीरकी शुद्धिके लिये उस तीर्थमें स्नान करना आवश्यक है। गोवत्सतीर्थमें एक बार किया हुआ स्नान भी मनुष्योंको रुद्रलोक प्रदान करनेवाला है। वहाँ विशेषतः भाद्रपद मासमें पक्षके अन्तमें कूपके तटपर तर्पण और श्राद्ध करनेसे कलियुगमें पितरोंको अधिक तृप्ति होती है। गयामें इक्कीस बार तर्पण करनेपर पितरोंको जो परम तृप्ति होती है, वह गंगकूपमें एक बार तर्पण करनेसे ही हो जाती है। गोवत्स महादेवके समीप ही गंगकूप विद्यमान है। वहाँ तिल और जलसे भी तर्पण करनेपर पितर सद्गतिको प्राप्त होते हैं, नरकोंसे छूट जाते हैं। उस तीर्थमें मुनीश्वरगण गोदानकी प्रशंसा करते हैं। वहाँ दो पीलुके वृक्ष स्थित हैं। वहीं मुनिसेवित गोवत्सतीर्थ है, जो स्नानसे स्वर्ग देनेवाला, आचमनसे पापकी शुद्धि करनेवाला, कीर्तनसे पुण्य उत्पन्न करनेवाला और सेवनसे मोक्ष देनेवाला है।
गोवत्सतीर्थसे नैर्ऋत्य कोणमें 'लोहयष्टि' दीख पड़ती है। वहाँ स्वयम्भू लिंगके रूपमें साक्षात् भगवान् शंकर विराजमान हैं। भाद्रपद (आश्विन)-की अमावास्याके दिन लोहयष्टिमें श्राद्ध करनेपर पितर प्रेतयोनिसे मुक्त हो स्वर्गमें क्रीड़ा करते हैं। पितरलोग यह कहते हैं 'क्या हमारे कुलमें भी ऐसा कोई पुरुष उत्पन्न होगा, जो श्राद्धपक्षमें आश्विनकी अमावास्याके दिन लोहयष्टि तीर्थमें हमारे लिये तिल, जल, पिण्डदान अथवा केवल जल ही प्रदान करेगा?' मुनि कहते हैं—'यदि पितर अधिक प्रिय हों तो भाद्रपद (आश्विन)-की अमावास्या तिथिको उनके लिये अवश्य श्राद्ध करना चाहिये।' जो सरस्वतीके जलमें स्नान करके दूधसे और श्वेत तिलोंसे पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर अवश्य तृप्त होते हैं। लोहयष्टि तीर्थमें भक्ति-भावसे तर्पण करनेपर मनुष्य स्वयं भी तृप्तिको प्राप्त होता है। जल देनेवाला तृप्ति और अन्न देनेवाला अक्षय सुख पाता है। फल देनेवाला पितृभक्त पुत्र और अभय देनेवाला आरोग्य लाभ करता है। न्यायोपार्जित धनमेंसे जो थोड़ा भी दान दिया जाय, तो वह महान् फल देनेवाला होता है। उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य भगवान् शिवका पार्षद होता है।
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संक्षेपसे श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन
व्यासजी कहते हैं—पूर्वकालमें त्रेतायुग आनेपर भगवान् विष्णुका अंश सूर्यवंशमें रघुवंशशिरोमणि कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें अवतीर्ण हुआ। श्रीराम और लक्ष्मण अभी काकपक्षधारी बालक थे, तभी पिताकी आज्ञासे वे विश्वामित्रके अनुगामी हो गये। राजा दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये उन अपने दोनों कुमारोंको विश्वामित्रजीकी सेवामें सौंप दिया था। वे दोनों वीर धनुष और बाण धारण करके पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये चले। रास्तेमें जाते हुए उन दोनों भाइयोंके समक्ष ताड़का नामवाली राक्षसी विघ्न डालनेके लिये आ खड़ी हुई। तब विश्वामित्र मुनिकी आज्ञासे श्रीरामचन्द्रजीने ताड़काको मार डाला। विश्वामित्रजीने श्रीरामचन्द्रजीको धनुर्वेद विद्याका उपदेश भी दिया। रघुनाथजीके चरणोंके स्पर्शसे शिलारूपधारिणी अहल्या, जो इन्द्रके साथ संयोग होनेके कारण शापवश प्रस्तर हो गयी थी, पुनः गौतम-वधूके रूपमें प्रकट हो गयी। विश्वामित्रजीका यज्ञ आरम्भ होनेपर रघुनाथजीने मारीचको मार भगाया और सुबाहुको अपने उत्तम बाणोंसे मौतके घाट उतार दिया। उन्होंने राजा जनकके घरमें रखे हुए महादेवजीके धनुषको तोड़ डाला और अयोनिजा सीताके साथ विवाह किया। जब वे अयोध्याको लौटने लगे, तब रास्तेमें परशुरामजी