संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 661, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें६३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मिले। उन्हें जीतकर श्रीरामचन्द्रजी सीताके साथ घर आये। तत्पश्चात् सत्ताईसवें वर्षकी आयुमें जब श्रीरामचन्द्रजीको युवराज पद दिया जाने लगा, तब कैकेयीने राजासे दो वर माँगे। उनमेंसे एक वरके द्वारा यह माँगा कि 'श्रीराम जटा धारण करके चौदह वर्षोंके लिये वनमें चले जायँ और दूसरे वरसे यह माँग लिया कि भरत युवराज-पदके अधिकारी हों।' कैकेयी भोली-भाली थी। उसने मन्थराके बहकानेसे ऐसा वर माँगा। राजा दशरथने जानकी और लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीको वनवास दे दिया। श्रीरामचन्द्रजी तीन राततक केवल जल पीकर रहे। चौथे दिन फलाहार किया और पाँचवें दिन चित्रकूटमें पहुँचकर उन्होंने पर्णकुटी बनायी। उस समय राजा दशरथ श्रीरामचन्द्रजीका नाम लेते हुए स्वर्गको सिधारे। उन्होंने ऋषिके शापको सफल बनाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। उसके बाद भरत और शत्रुघ्न चित्रकूटमें आये। भरतने पिताके स्वर्गगामी होनेका समाचार बतलाकर श्रीरामचन्द्रजीको घर लौट चलनेके लिये समझाया। जब वे लौटनेको राजी न हुए, तब उनकी चरणपादुका लेकर भरत और शत्रुघ्न नन्दिग्रामको लौट आये। वहाँ दोनों भाई राज्यकी रक्षा करते हुए श्रीरामकी चरणपादुकाके पूजनमें तत्पर रहे।
श्रीरामचन्द्रजी महात्मा अत्रिसे मिलकर दण्डकारण्यमें आये और राक्षसोंका वध आरम्भ किया। सबसे पहले विराध मारा गया। उसके बाद साढ़े बारह वर्षोंतक श्रीरामचन्द्रजी पंचवटीमें टिके रहे। वहाँ उन्होंने लक्ष्मणजीके द्वारा 'शूर्पणखा' नामक राक्षसीको कुरूप करा दिया। जानकीके साथ वनमें विचरते हुए श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके समीप भयंकर राक्षस रावण आया। वह सीताका अपहरण करनेके लिये आया था। माघ मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको वृन्द मुहूर्तमें जब राम और लक्ष्मण दोनों आश्रमसे बाहर चले गये थे, दशमुख रावणने सीताको अकेली पाकर हर लिया। रावण पहले मारीचके आश्रमपर गया था। मारीच मृगरूपमें आकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको दूर हटा ले गया था। तब श्रीरामचन्द्रजीने मृगरूपधारी मारीचको मार डाला और पुनः लौटकर जब वे आश्रमपर आये, तब उसे सीतासे रहित एवं सूना देखा।
उधर सीता रावणके द्वारा हरी जानेपर कुररीकी भाँति विलाप करने लगी—'हा राम! हा राम! मुझे राक्षस हरकर लिये जाता है, आप आकर मुझे बचाइये, मेरी रक्षा कीजिये।' जैसे भूखा बाज चीत्कार करती हुई चिड़ियाको उठा ले जाता है, वैसे ही राक्षस रावण जनकनन्दिनी सीताको हरकर लिये जा रहा था। यह समाचार सुनकर पक्षिराज जटायुने राक्षसराज रावणसे युद्ध किया। अन्तमें रावणने उन्हें घायल करके गिरा दिया। माघ कृष्णा नवमीको रावणके घरमें निवास करनेवाली सीताकी खोज करते हुए दोनों भाई राम और लक्ष्मण जटायुसे मिले। उसके मुखसे राक्षसद्वारा हरी गयी सीताका समाचार पाकर श्रीरामने भक्तिपूर्वक पक्षिराजका दाहादि संस्कार किया। फिर आगे-आगे श्रीराम और उनके पीछे लक्ष्मण चले। पम्पासरोवरके निकट पहुँचकर उन्होंने शबरीपर अनुग्रह किया। फिर पम्पासरोवरके जलका आचमन करके श्रीरामजी हनुमान्जीसे मिले। तदनन्तर रघुनाथजीने हनुमान् एवं सुग्रीवसे मैत्री की। सुग्रीवके पास आकर उन्होंने बाली नामक वानरको मारा। तत्पश्चात् श्रीरामदेवने अपनी प्राणवल्लभा सीताकी खोजके लिये हनुमान् आदि प्रमुख वानरोंको भेजा। हनुमान्जी श्रीरामकी अँगूठी लेकर गये। दसवें महीनेमें सम्पातीने हनुमान्जीको सीताका पता बतलाया। सम्पातीके कहनेसे हनुमान्जी सौ