भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 663, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 663

६३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नीलने प्रहस्तका वध किया। माघ कृष्णा द्वितीयासे लेकर चतुर्थीतक तीन दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने तुमुल युद्ध करके रावणको रणस्थलसे मार भगाया। पंचमीसे अष्टमीतक रावणद्वारा जगाया हुआ कुम्भकर्ण चार दिनतक केवल भोजन ही करता रहा। नवमीसे चार दिनतक कुम्भकर्णने युद्ध किया और बहुतसे वानरोंको खा डाला। अन्तमें वह श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया। अमावास्याके दिन लंकामें उसके लिये शोक मनाया गया। फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदासे लेकर चतुर्थीतक चार दिनोंमें नरान्तक आदि पाँच राक्षस मारे गये। पंचमीसे सप्तमीतक तीन दिनोंमें अतिकायका वध हुआ। अष्टमीसे द्वादशीतक पाँच दिनोंमें निकुम्भ और कुम्भ मारे गये। फिर चार दिनोंमें मकराक्षका वध किया गया। फाल्गुन कृष्णा द्वितीयाके दिन मेघनाद पराजित हुआ। तीजसे लेकर सप्तमीतक पाँच दिन दवा आदि लानेकी व्यग्रताके कारण युद्ध बंद रहा। अष्टमीको दुर्बुद्धि रावणने शोकके आवेगसे मायामयी मैथिलीका वध किया। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सेनाके द्वारा इसका पूर्णतः निश्चय किया। फिर त्रयोदशीसे पाँच दिनोंमें लक्ष्मणजीने विख्यात बल और पराक्रमवाले मेघनादको युद्धमें मार डाला। चतुर्दशीको रावणने युद्ध बंद करके यज्ञकी दीक्षा ली। फिर अमावास्याके दिन वह युद्धके लिये निकला। चैत्र शुक्ला प्रतिपदासे लेकर पाँच दिनतक रावण लगातार युद्ध करता रहा। इस युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका संहार हुआ। फिर तीन दिनोंतक रावणके रथ, घोड़े आदि मारे गये। चैत्र शुक्ला नवमीको लक्ष्मणजीको शक्ति लगी। तब श्रीरामचन्द्रजीने क्रोधमें भरकर दशमुख रावणको खदेड़ दिया। फिर विभीषणकी सलाहसे हनुमान्‌जी लक्ष्मणके लिये ओषधि लानेको द्रोणाचल पर्वतपर गये और वहाँसे विशल्या (संजीवनी बूटी) ले आकर उन्होंने लक्ष्मणको पिलायी। दशमीके दिन युद्ध बंद रहा। रातमें राक्षसों ने युद्ध आरम्भ किया। एकादशीके दिन श्रीरामचन्द्रजीके पास मातलि नामक सारथिके साथ इन्द्रका रथ आ पहुँचा। चैत्र शुक्ला द्वादशीसे लेकर कृष्णा चतुर्दशीतक अठारह दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने द्वन्द्वयुद्ध करके रावणको मार डाला। अमावास्याके दिन रावण आदि राक्षसोंके दाह-संस्कार हुए। इस प्रकार घोर संग्राम होनेपर श्रीरामचन्द्रजीको विजय प्राप्त हुई। माघ शुक्ला द्वितीयासे लेकर चैत्र कृष्णा चतुर्दशीतक सत्तासी दिनके संग्राममें केवल पंद्रह दिन युद्ध बंद रहा। शेष बहत्तर दिन युद्ध चालू रहा। वैशाख शुक्ला प्रतिपदाको श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें ही रहे। द्वितीयाके दिन उन्होंने विभीषणका लंकाके राज्यपर अभिषेक किया। तृतीयाको सीताकी शुद्धि हुई, देवताओंसे वरदान प्राप्त हुआ। उसी दिन दशरथजीका आगमन हुआ और उनके द्वारा भी सीताजीकी पवित्रताके विषयमे अनुमोदन प्राप्त हुआ।

इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंद्वारा कष्टमें डाली हुई परम पवित्र जानकीको बड़े प्रेमसे ग्रहण करके वहाँसे लौटे। वैशाखकी चतुर्थीको श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर बैठे और आकाशमार्गसे अयोध्यापुरीकी ओर चल दिये। चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर वैशाख शुक्ला पंचमीको श्रीरामचन्द्रजी अपने दलबलके साथ भरद्वाज आश्रमपर आकर रहे। फिर षष्ठीको पुष्पक विमानसे वे नन्दिग्राममें आये। सप्तमीमें अयोध्याके राज्यपर रघुनाथजीका अभिषेक हुआ। चौदह महीने दस दिनतक सीताको रामसे अलग रावणके घरमें रहना पड़ा था। बयालीसवें वर्षमें श्रीरामचन्द्रजीने राज्यकार्य प्रारम्भ किया। उस समय सीताजीकी आयु पैंतीस वर्षकी थी। चौदह वर्षके बाद ही

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