भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 664, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 664
  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६३५

श्रीरामने अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया था। उस समय रावणका दर्प दलन करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने अपने भाइयोंके साथ ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया। राज्यका पालन करनेके पश्चात् वे सबके साथ परम धाममें गये। रामराज्यमें सब लोग बहुत प्रसन्न रहते थे। सभी धन-धान्यसे सम्पन्न तथा पुत्र-पौत्रोंसे भरे-पूरे थे। बादल इच्छाके अनुसार पानी बरसाते थे, अन्नकी उपज कई गुनी अधिक होती थी, गौएँ घड़ाभर दूध देती थीं और वृक्षोंमें सदैव फल लगे रहते थे। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें किसीको आधि-व्याधि नहीं सताती थी, सभी स्त्रियाँ पतिव्रता होती थीं, पुरुष पिता-माताकी भक्ति करनेवाले होते थे, ब्राह्मण सदा वेदपाठमें लगे रहते, क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी सेवा करते और वैश्यलोग ब्राह्मणों एवं गौओंमें सदा भक्ति रखते थे। उस समय वर्णसंकरता और कर्मसंकरताका नाम नहीं सुना जाता था। कोई भी स्त्री वन्ध्या, दुर्भाग्यवती, काकवन्ध्या, मृतवत्सा अथवा विधवा नहीं थी। सधवा स्त्रीको कभी विलाप नहीं करना पड़ता था। कोई भी माता-पिता और गुरुकी अवहेलना नहीं करते थे। प्रत्येक मनुष्य पुण्य करता और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा नहीं टालता था। कोई दूसरेकी भूमिपर अधिकार नहीं जमाते थे। सभी परायी स्त्रियोंसे विमुख रहते थे। कोई मनुष्य परनिन्दक, दरिद्र, रोगी, चोर, जुआरी, शराबी और पापी नहीं था। सुवर्ण चुरानेवाला, गुरुपत्नीगमन करनेवाला, ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या और बालहत्या करनेवाला तथा झूठ बोलनेवाला एक भी मनुष्य नहीं था। कोई किसीकी जीविका नष्ट नहीं करता और झूठी गवाही नहीं देता था। शठ, कृतघ्न और मलिन मनुष्य कहीं देखनेको भी नहीं मिलता था। ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् होते थे और सदा सर्वत्र उनकी पूजा होती थी। अत्यन्त विख्यात रामराज्यमें कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो व्रतका पालन करनेवाला एवं ईश्वरका भक्त न हो। राज्य करते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास उनके पुरोहित महाभाग वसिष्ठ मुनि अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करके आये। श्रीरामचन्द्रजीने अभ्युत्थान, अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क आदिके द्वारा मुनियोंसहित गुरु वसिष्ठका पूजन किया। तत्पश्चात् मुनिवर वसिष्ठने श्रीरामचन्द्रजीसे उनके राज्य, अश्व, हाथी, खजाना, देश, उत्तम बन्धु तथा सेवकोंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा। श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है।' तदनन्तर श्रीरामने मुनिवर वसिष्ठजीसे उनकी पत्नी और पुत्रके कुशल-मंगलका समाचार पूछा। तब वसिष्ठजीने भूमण्डलमें जिन-जिन क्षेत्रों, तीर्थों और देवालयोंका सेवन किया था, उन सबकी चर्चा करते हुए सर्वत्र अपना कुशल-मंगल बतलाया। इससे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी बड़े विस्मित होकर वसिष्ठजीसे उत्तमोत्तम तीर्थका माहात्म्य पूछने लगे।


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