भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 672
  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * | ६४३ ---|---

किया। स्मरण करते ही सब देवता वहाँ आ पहुँचे। उनके विमानोंकी पंक्ति कोटि-कोटि सूर्योंके समान प्रकाशित हो रही थी। श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन सबका यथायोग्य पूजन किया और वह सब वृत्तान्त निवेदन करते हुए कहा—'मैं इस क्षेत्रकी अधिदेवीके कहनेसे यहाँ धर्मारण्य हरिक्षेत्रमें धर्मकूपके समीप जीर्णोद्धार करना चाहता हूँ।' तदनन्तर वे सब ब्राह्मण तीनों मूर्तियोंको प्रणाम करके हर्षमें भर गये। उनका मनोरथ सफल हो गया। उन्होंने अर्घ्य-पाद्य आदिकी विधिसे श्रद्धापूर्वक उनका पूजन किया। वे तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव क्षणभर विश्राम करके विनयसे हाथ जोड़े हुए महाशक्तिशाली श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—'सूर्यवंश-विभूषण राम! तुमने देवद्रोही रावण आदि राक्षसोंका जो संहार किया है, इससे हमलोग बहुत प्रसन्न हैं। तुम इस महास्थानका उद्धार करो और महान् सुयश प्राप्त करो।'

उन देवताओंकी आज्ञा पाकर दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए और ब्रह्मा आदि देवताओंके समीप जीर्णोद्धारका कार्य प्रारम्भ किया। उन्होंने पहले महान् पर्वतके समान सुन्दर एवं विशाल वेदी बनवायी और उसके ऊपर अनेकानेक सुन्दर ब्राह्मशाला, गृहशाला तथा ब्रह्मशालाका निर्माण कराया। उन शालाओंमें यथास्थान खजाना और गृहोपयोगी आवश्यक वस्तुओंका संग्रह किया गया। कोटि-कोटि स्वर्णमुद्राओं तथा रस और वस्त्र आदिसे वे शालाएँ भर गयीं। उनमें धन-धान्य-समृद्धि एवं सब प्रकारके धातुओंका भी संग्रह किया गया था। यह सब करके श्रीरामने ब्राह्मणोंको दान दिया। उन्होंने एक-एक ब्राह्मणके लिये दस-दस दूध देनेवाली गौएँ दीं। उन्होंने वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके लिये चार हजार चार गाँव दिये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन देवताओंने उन्हें स्थापित किया था, इसीलिये संसारमें त्रैविद्य नामसे उनकी ख्याति हुई। इस प्रकार ब्राह्मणोंको वह परम अद्भुत दान दिया। मण्डलोंमें जो उत्तम शूद्र वैश्यवृत्तिसे जीविका चला रहे थे, उनकी संख्या सवा लाख थी। वे सब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे और माण्डलिक कहलाते थे। उन सबको श्रीरामने ब्राह्मणोंकी सेवामें नियुक्त किया। श्रीरामचन्द्रजीने दो चँवर और खड्ग दिये। प्रतिष्ठा-विधिके साथ अपने कुलके स्वामी भगवान् सूर्यको स्थापित किया। चार वेदोंसे युक्त ब्रह्माजीकी स्थापना की, महाशक्ति श्रीमाता एवं श्रीहरिको भी स्थापित किया। विघ्नोंका निवारण करनेके लिये दक्षिण द्वारपर उन्होंने गणेशजी तथा अन्य देवताओंकी स्थापना की। वीरवर श्रीरघुनाथजीने सात मंजिलके मन्दिर बनवाये और यह नियम किया कि 'जो कोई भी यहाँ शुभ एवं मांगलिक कार्य करे, पुत्र होनेपर जातकर्म, अन्नप्राशन तथा मुण्डन आदि कर्म करे, यज्ञकर्मोंमें लक्ष होम और कोटि होम करे, वास्तुपूजा एवं ग्रहशान्ति करे तथा ऐसे महोत्सवोंके अवसरपर मनुष्य जो कुछ भी द्रव्य, अन्न, वस्त्र, धेनु, सुवर्ण, रजत आदिका दान ब्राह्मणों, शूद्रों, दीनों, अनाथों और अन्धोंके लिये देवे, उस समय पहले कार्यकी निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि होनेके लिये भगवान् वकुलादित्य और श्रीमाताका भाग निकाल दे। जो मनुष्य मेरी आज्ञाका उल्लंघन करके विपरीत आचरण करेगा, उसके उस कर्ममें विघ्न उपस्थित होगा।'

ऐसा कहकर श्रीरामने प्रसन्नचित्तसे देवताओंकी बावलियों, सुन्दर चहारदिवारियों, दुर्गके उपकरणों, विस्तृत सड़कों और गलियों, कुण्ड, सरोवर, तलैया, धर्मवापी तथा अन्यान्य देवनिर्मित कूपोंका पुनर्निर्माण कराया। इस प्रकार मनोरम धर्मारण्यमें इन सब वस्तुओंका विस्तारपूर्वक निर्माण कराकर