संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चातुर्मास्य-माहात्म्य
चातुर्मास्य व्रतका माहात्म्य, संयम-नियम, दयाधर्म तथा चौमासेमें अन्न आदि दानोंकी महिमा
नारदजी बोले— देवाधिदेव! इस समय मैं शुभकारक चातुर्मास्य व्रतको सुनना चाहता हूँ।
ब्रह्माजीने कहा— देवर्षे! ये भगवान् विष्णु ही सबको मोक्ष देनेवाले तथा संसारसागरसे पार उतारनेवाले हैं। इनके स्मरणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। संसारमें मनुष्य-जन्म दुर्लभ है। उसमें भी उत्तम कुलमें जन्म पाना और दुर्लभ है। कुलीन होनेपर भी दयालु स्वभावका होना और कठिन है। यह सब होनेपर भी कल्याणमय सत्संग प्राप्त होना और भी दुर्लभ है। जहाँ सत्संग नहीं, विष्णुभक्ति नहीं और व्रत नहीं हैं, वहाँ कल्याणकी प्राप्ति दुर्लभ है। विशेषतः चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुका व्रत करनेवाला मनुष्य उत्तम माना गया है। सब तीर्थ, दान, पुण्य और देवस्थान चातुर्मास्य आनेपर भगवान् विष्णुकी शरण लेकर स्थित होते हैं। जो चातुर्मास्यमें श्रीहरिको प्रणाम करता है, उसीका जीवन शुभ है। संसारमें मनुष्यका जन्म और भगवान् विष्णुकी भक्ति दोनों ही दुर्लभ हैं। जो मनुष्य चातुर्मास्यमें नदीस्नान करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है। जो झरना, तड़ाग और बावलीमें स्नान करता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पुष्कर, प्रयाग अथवा और किसी महातीर्थके जलमें जो चातुर्मास्यमें स्नान करता है, उसके पुण्यकी संख्या नहीं है। नर्मदा, भास्करक्षेत्र, प्राची सरस्वती तथा समुद्र-संगममें एक दिन भी जो चातुर्मास्यमें स्नान करता है, उसमें पापका लेशमात्र भी नहीं रह जाता। जो नर्मदामें एकाग्रचित्त होकर तीन दिन भी चौमासेका स्नान करता है, उसके पापके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। जो गोदावरी नदीमें सूर्योदयके समय चौमासेमें पंद्रह दिनतक स्नान करता है, वह कर्मजनित शरीरका परित्याग करके भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। जो मनुष्य तिलमिश्रित एवं आँवलामिश्रित जलसे अथवा बिल्वपत्रके जलसे चातुर्मास्यमें स्नान करता है, उसमें दोषका लेशमात्र भी नहीं रह जाता। देवाधिदेव भगवान् विष्णुके चरणोंके अंगुष्ठसे प्रवाहित होनेवाली गंगाजी सदा ही पापनाशिनी कही गयी हैं। चातुर्मास्यमें उनका यह माहात्म्य विशेषरूपसे प्रकट होता है। भगवान् विष्णु स्मरण करनेपर सहस्रों पाप भस्म कर डालते हैं, इसलिये उनका चरणोदक मस्तकपर चौमासेमें धारण किया जाय तो वह कल्याणकारी होता है। चातुर्मास्यमें भगवान् नारायण जलमें