संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६४५
ही गर्भ धारण करेंगी। प्रायः लोग एकादशीके उपवाससे रहित होंगे। तीर्थसेवनमें ब्राह्मणोंकी प्रवृत्ति नहीं होगी। ब्राह्मण अधिक खानेवाले और अधिक सोनेवाले होंगे। सब लोग कुटिलवृत्तिसे जीविका चलानेवाले तथा वेदोंकी निन्दामें तत्पर होंगे। संन्यासियोंकी निन्दा करेंगे और परस्पर एक-दूसरेको छलनेवाले होंगे। कलियुगमें छूआछूतके दोषको नहीं मानेंगे। क्षत्रियलोग राज्यसे वंचित होंगे और म्लेच्छ राजा होगा। प्रायः सब विश्वासघाती, गुरुद्रोही, मित्रद्रोही तथा शिश्नोदरपरायण होंगे। महाराज! कलियुग आनेपर चारों वर्णके लोग एक हो जायेंगे, यह मेरा वचन अन्यथा नहीं होगा। कलियुग प्राप्त होनेपर सब ब्राह्मण स्थानसे भ्रष्ट होंगे। वे बलवान् पक्षको ग्रहण करेंगे और पक्षपाती होंगे तथा वेदभ्रष्ट होंगे।
प्राचीन कालमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने धर्मारण्य तीर्थको स्थापित किया था। सत्ययुगमें इस तीर्थका नाम धर्मारण्य, त्रेतामें सत्यमन्दिर, द्वापरमें वेदभवन और कलियुगमें मोहेरक हुआ*। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक सब पापोंका नाश करनेवाले धर्मारण्य-माहात्म्यको सुनता है, वह मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले त्रिविध पातकका नाश कर देता है। एक बार इसके सुनने अथवा कीर्तन करनेसे सब पापोंका नाश हो जाता है। स्त्री हो या पुरुष, जो भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह कभी नरकका दर्शन नहीं करता है। श्रेष्ठ पुरुष पवित्रचित्त होकर इस पुराणकी पुस्तकको किसी उत्तम स्थानपर स्थापित करके रेशमी वस्त्र तथा गन्ध, माल्य आदिसे इसकी पृथक्-पृथक् पूजा करे। कथा समाप्त होनेपर वाचककी भी पूजा करे। विचित्र वस्त्र दे। गन्ध, माला और चन्दन आदिके द्वारा देवताके समान पूजा करके वाचकको दूध देनेवाली गौका दान करे।
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धर्मारण्य-माहात्म्य सम्पूर्ण।
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* धर्मारण्यं कृतयुगे त्रेतायां सत्यमन्दिरम्। द्वापरे वेदभवनं कलौ मोहेरकं स्मृतम्॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ४०। ६७)