भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 682
  • ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * | ६५३ ---|---

चाहिये। चौथी ऋचासे अर्घ्यदान करना उचित है। इसके बाद श्रीहरिको अमृतसे आचमन करावे। तीन आचमनसे ब्राह्मणकी शुद्धि बतायी गयी है। आचमनका जल स्वच्छ एवं फेन और बुद्बुदसे रहित होना चाहिये। ब्राह्मण इतने जलसे आचमन करे कि वह उसके हृदयतक पहुँच जाय, क्षत्रिय कण्ठतक जाने लायक जलसे आचमन करे और वैश्य तालुतक पहुँचने लायक जलसे आचमन करे। स्त्री और शूद्र एक बार जलका स्पर्शमात्र करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। पाँचवीं ऋचाके द्वारा भक्तियुक्त चित्तसे आचमन करना चाहिये। भगवान् हृषीकेश भक्तिसे ग्रहण करने योग्य हैं। भक्तिसे वे अपने-आपको भी समर्पित कर देते हैं। तत्पश्चात् सुगन्धित पदार्थोंद्वारा सुवासित और सभी ओषधियोंसे युक्त सुवर्णमय कलशोंमें रखे हुए जलसे भगवान्‌को स्नान करावे। श्रद्धापूर्वक मनसे भावनाद्वारा लाये हुए तीर्थजलसे स्नान कराना चाहिये। श्रद्धाके बिना दी हुई रत्नोंकी राशि भी निष्फल होती है और श्रद्धासे दिया हुआ जल भी अक्षय फल देनेवाला होता है। छठी ऋचासे स्नान कराकर पुनः आचमन कराना चाहिये।

सातवीं ऋचासे भगवान् विष्णुके लिये वस्त्र देना चाहिये। आठवींसे यज्ञोपवीत समर्पित करे, नवीं ऋचासे यज्ञमूर्ति श्रीहरिके श्रीअंगोंपर उत्तम चन्दनका लेप करना चाहिये। जिसने सुन्दर यक्षकर्दमके द्वारा जगद्गुरु भगवान् विष्णुके अंगोंमें लेप किया है, उसने अपने सुयशसे इस संसारको आच्छादित एवं तृप्त किया है। चन्दन देनेवाला मनुष्य संसारमें अपने तेजसे भगवान् सूर्यके समान होकर देवभावको प्राप्त होता और ब्रह्मादि देवताओंके लोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जो मनुष्य चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुको चन्दनके आलेपसे सुन्दर रूपमें देखते हैं, वे कभी यमपुरीमें नहीं जाते। दसवीं ऋचासे भक्तिपूर्वक पुष्प चढ़ाकर भगवान्‌की पूजा करे। पुष्पोंसे पूजित हुए भगवान् विष्णुको यदि दूसरे लोग भी प्रणाम करते हैं, तो उन्हें भी अक्षय लोक प्राप्त होते हैं। ग्यारहवीं ऋचासे श्रीहरिको धूप-दान करना चाहिये—'उत्तम गन्धसे युक्त दिव्य वनस्पतिका रस तथा अतिशय सुगन्धित यह धूप सम्पूर्ण देवताओंके सूँघने योग्य है, भगवन्! आप इसे ग्रहण करें।' इस मन्त्रका उच्चारण करके भगवान्‌को अगुरुका धूप निवेदन करे। चातुर्मास्यमें इसका महान् फल है। कपूर, चन्दनदल, मिश्री, मधु और जटामासीसे युक्त धूप श्रीहरिके शयनकालमें निवेदन करना चाहिये। देवता सूँघनेसे ही प्रसन्न होते हैं। अतः धूप उनकी घ्राणेन्द्रियको तृप्त करनेका शुभ साधन है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको बारहवीं ऋचासे दीपदान करना चाहिये। जो चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके आगे दीपदान करता है, उसकी पापराशि पलभरमें जलकर भस्म हो जाती है।

दीपदानके अनन्तर मोक्षपदमें स्थित भक्तियुक्त पुरुषोंको तेरहवीं ऋचाके द्वारा भगवान्‌को अन्नमय नैवेद्य निवेदन करना चाहिये। अन्नदानके अनन्तर भगवान्‌को पुनः आचमन कराना चाहिये। तत्पश्चात् चौदहवीं ऋचासे सब पापोंका नाश करनेवाली आरती उतारे और भगवान्‌को नमस्कार करे। पंद्रहवीं ऋचाके द्वारा ब्राह्मणोंके साथ भगवान्‌के चारों ओर घूमकर परिक्रमा करनी चाहिये। चार बार परिक्रमा करनेसे चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्‌की परिक्रमा तथा भगवत्सम्बन्धी तीर्थोंकी यात्रा सम्पन्न हो जाती है। तदनन्तर सोलहवीं ऋचाद्वारा भगवान् विष्णुके साथ अपनी एकताका चिन्तन करे—'मैं ही सदा विष्णु हूँ' इस प्रकार अपने मनमें भावना करनेवाला ब्राह्मण जीवन्मुक्त हो जाता है। चौमासेमें ब्राह्मणको विशेषरूपसे योगयुक्त होना चाहिये। इस प्रकार यहाँ मोक्षमार्ग प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुकी भक्ति बतायी गयी।

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