संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ब्रह्माजीके द्वारा मानसी और शारीरिक सृष्टिका प्रादुर्भाव, चारों वर्णोंके धर्म तथा शूद्र जातियोंके भेदोंका वर्णन
नारदजीने पूछा— पितामह! अट्ठारह प्रकारकी प्रजाएँ कौन-कौन-सी हैं? उनकी जीवनवृत्ति और धर्म क्या है? यह सब बताइये।
ब्रह्माजीने कहा— अपने कालके परिमाणसे जब जगदीश्वर भगवान् श्रीहरि योगनिद्रासे जाग्रत् हुए, तब उस समय उनकी नाभिसे प्रकट हुए कमलकोषसे मेरा जन्म हुआ। तदनन्तर उस कमलकी नालसे भगवान्के उदरमें प्रवेश करके जब मैंने देखा, तब वहाँ मुझे कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंके दर्शन हुए; परंतु फिर जब बाहर आया तब सृष्टिके पदार्थ और उसके हेतुओंको भूल गया। तब आकाशवाणी हुई—'महामते! तपस्या करो।' यह भगवदीय आदेश पाकर मैंने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। फिर मनके द्वारा पहले मानसी सृष्टिका चिन्तन किया। उससे मरीचि आदि मुनीश्वर ब्राह्मण प्रकट हुए। नारद! उन्हींमें सबसे छोटे होकर तुम उत्पन्न हुए। तुम ज्ञानी एवं वेदान्तके पारंगत पण्डित हुए। वे सब मुनि कर्मनिष्ठ हो सदा सृष्टिविस्तारके लिये उद्योग करने लगे। परंतु तुम अनन्यभावसे भगवान् विष्णुके भक्त हुए। एकान्ततः ब्रह्मचिन्तनपरायण, ममता और अहंकारसे शून्य हुए। तुम भी मेरे मानस पुत्र ही हो। मानसी सृष्टिके पश्चात् मैंने देहजा सृष्टिकी रचना की। मेरे मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य और चरणोंसे शूद्र उत्पन्न हुए। अनुलोम और विलोम क्रमसे शूद्रसे नीचे-नीचे सब मेरे चरणतलोंसे ही प्रकट हुए हैं। वे सब प्रकृतियाँ (प्रजाजन) मेरे शरीरके अवयव-विशेषसे उत्पन्न हैं। नारद! मैं तुमसे उनके नाम बताता हूँ, सुनो—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन ही द्विज हैं। वेद, तपस्या, पठन, यज्ञ करना और दान देना—ये सब इनके कर्म हैं। द्विजोंको पढ़ाने और थोड़ा-सा प्रतिग्रह लेनेसे ब्राह्मणोंकी जीविका चलती है। यद्यपि ब्राह्मण तपस्याके प्रभावसे दान ग्रहण करनेमें समर्थ है, तथापि वह प्रतिग्रह न स्वीकार करे; क्योंकि उसे अपने तपोबलकी रक्षा सदा करनी चाहिये। वेदपाठ, विष्णु-पूजन, ब्रह्मध्यान, लोभका अभाव, क्रोध न होना, ममताशून्यता, क्षमासारता, आर्यता (श्रेष्ठ आचारका पालन), सत्कर्मपरायणता, दानरूपी कर्म तथा सत्यभाषण आदि सद्गुणोंसे जो सदा विभूषित होता है, वह ब्राह्मण कहलाता है। क्षत्रियको तपस्या, यज्ञ, दान, वेदपाठ और ब्राह्मणभक्ति—ये सब कर्म करने चाहिये। शस्त्रोंसे इनकी जीविका चलती है। स्त्री, बालक, गौ, ब्राह्मण और भूमिकी रक्षाके लिये, स्वामीपर आये हुए संकटको टालनेके लिये, शरणमें आये हुएकी रक्षाके लिये तथा पीड़ितोंकी आर्त पुकार सुनकर उन सबका संकट दूर करनेके लिये जो सदा तत्पर रहते हैं, वे ही क्षत्रिय हैं। वैश्य धन बढ़ानेवाला, पशुओंका पालक, कृषिकर्म करनेवाला, रस आदिका विक्रेता तथा देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजक है। वह सूद लेकर धनकी उत्पत्ति करे, यज्ञ आदि कर्मोंका अनुष्ठान करता रहे, दान और स्वाध्याय भी करे। ये सब वैश्यके कर्म बताये गये हैं। शूद्र भी प्रातःकाल उठकर भगवान्का चरण-वन्दन करके विष्णुभक्तिमय श्लोकोंका पाठ करते हुए भगवान् विष्णुके स्वरूपको प्राप्त होता है। जो वर्षमें आनेवाले सभी व्रतोंका तिथि तथा वारके अधिदेवताकी प्रसन्नताके लिये पालन करता है और सब जीवोंको अन्नदान करता है, वह शूद्र गृहस्थ श्रेष्ठ माना गया है। वह वेदमन्त्रोंके उच्चारणके