भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 686

* ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६५७

तुम्हारा मन उत्साहके साथ संलग्न होता है? भगवान् विष्णुका चरणोदक प्रतिदिन सिरपर धारण करते हो न? भगवान् विष्णुका भजन, श्रीविष्णुकी कथा, श्रीविष्णुका स्तोत्र, श्रीविष्णुका नमस्कार, श्रीविष्णुका ध्यान और भगवान् विष्णुका पूजन—यह सब भगवान्‌के शयनकाल (चातुर्मास्य) में किया जाय तो मोक्ष देनेवाला होता है।'

ऐसा कहते हुए मुनिको प्रणाम करके शूद्रने फिर कहा—मुने! आपकी कृपादृष्टिसे ही मुझे इस आश्रमका पूरा-पूरा फल मिल गया। तथापि मैं आपकी उपदेशयुक्त वाणी सुनना चाहता हूँ। आपके आगमनका क्या प्रयोजन है, यह कृपा करके बतावें?

तब गालवजीने उस धर्मात्मा एवं सत्यवादी शूद्रसे कहा—इधर तीर्थयात्रामें लगे हुए मुझे कई मास व्यतीत हो गये, अब चातुर्मास्य आ गया है। अतः अपने आश्रमको जाऊँगा। भगवान् नारायणकी प्रसन्नताके लिये आषाढ़ शुक्ला एकादशीको अपने घरपर चातुर्मास्यका नियम ग्रहण करूँगा।

पैजवन बोला—द्विजश्रेष्ठ! मेरे ऊपर अनुग्रह करके कोई ज्ञानकी बात मुझे भी बताइये। वेदमें मेरा अधिकार नहीं है। वेदसारके जपका भी मुझे अधिकार नहीं है। अतः विशेषतः चातुर्मास्यमें पालन करने योग्य यदि कोई मोक्षसाधक उपाय हो तो उसे बताइये।

गालवजीने कहा—जो मनुष्य शालग्राममें स्थित भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं, भक्ति उनसे दूर नहीं है। जिसका मन भगवान् शालग्रामके चिन्तनमें लगा हुआ है, उसके द्वारा जो कुछ भी शुभ कर्म किया जाता है, वह अक्षय होता है। चातुर्मास्यमें इसका विशेष माहात्म्य है। जहाँ शालग्राम-शिला और द्वारकाकी शिला दोनोंका संगम हो, वहाँ मनुष्यके लिये मुक्ति दुर्लभ नहीं है। जिस भूमिमें सैकड़ों पापोंसे युक्त मनुष्योंद्वारा भी शालग्रामकी शिला पूजी जाती है, वहाँ यह शिला पाँच कोसतकके प्रदेशको पवित्र करती है। यह शालग्रामशिला तेजोमय पिण्ड है, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है। इसके दर्शनमात्रसे भी तत्काल सब पापोंका नाश हो जाता है। महाशूद्र! शालग्रामशिलाकी उपस्थितिसे सब तीर्थ और देवमन्दिर पवित्र हो जाते हैं तथा समस्त नदियाँ तीर्थत्वको प्राप्त होती हैं। शालग्रामशिलाकी सन्निधिमात्रसे सर्वत्र सम्पूर्ण क्रियाएँ शोभन होती हैं। जिसके घरमें शुभ शालग्रामशिलाका कोमल तुलसीदलोंद्वारा पूजन होता है, वहाँ यमराज अपना मुँह नहीं दिखाते। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सच्छूद्रोंको भी शालग्रामशिलाके पूजनका अधिकार है।

सच्छूद्रने पूछा—ब्रह्मन्! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। सुना जाता है कि स्त्री और शूद्र आदिके लिये शालग्रामशिलाके पूजनका निषेध है। अतः मेरे-जैसा मनुष्य किस प्रकार शालग्रामका पूजन करे?

गालवजीने कहा—मानद! शूद्रोंमें केवल असत् शूद्रके लिये शालग्रामशिलाका निषेध है। स्त्रियोंमें भी पतिव्रता स्त्रियोंके लिये उसका निषेध नहीं किया गया है। जो शालग्रामशिलाके ऊपर चढ़ायी