संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हुई माला अपने मस्तकपर धारण करते हैं, उनके सहस्रों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो शालग्राम-शिलाके आगे दीपदान करते हैं, उनका कभी यमपुरमें निवास नहीं होता। जो शालग्राममें व्याप्त भगवान् विष्णुकी मनोहर पुष्पोंद्वारा पूजा करते हैं तथा जो भगवान् विष्णुके शयनकाल (चातुर्मास्य)-में शालग्रामशिलाको पंचामृतसे स्नान कराते हैं, वे मनुष्य संसारबन्धनमें कभी नहीं पड़ते। मुक्तिके आदिकारण निर्मल शालग्रामगत श्रीहरिको अपने हृदयमें स्थापित करके जो प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उनका चिन्तन करता है, वह मोक्षका भागी होता है। जो सब समयमें, विशेषतः चातुर्मास्यकालमें, भगवान् शालग्रामके ऊपर तुलसीदलकी माला चढ़ाता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। तुलसीदेवी भगवान् विष्णुको सदा प्रिय हैं। शालग्राम महाविष्णुके स्वरूप हैं और तुलसीदेवी साक्षात् लक्ष्मी हैं। इसलिये चन्दनचर्चित सुगन्धित जलसे तुलसीमंजरीसहित शालग्रामशिलारूप श्रीहरिको नहलाकर जो तुलसीकी मंजरियोंसे उनका पूजन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता है। उत्तम पुष्पोंसे पूजित भगवान् शालग्रामका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर श्रीहरिमें तन्मयताको प्राप्त होता है। शालग्राम-शिलाके चौबीस भेद हैं, उनका वर्णन सुनो। पहले केशव हैं, उनकी पूजा करनी चाहिये। दूसरे मधुसूदन, तीसरे संकर्षण, चौथे दामोदर, पाँचवें वासुदेव, छठे प्रद्युम्न, सातवें विष्णु, आठवें माधव, नवें अनन्तमूर्ति, दसवें पुरुषोत्तम, ग्यारहवें अधोक्षज, बारहवें जनार्दन, तेरहवें गोविन्द, चौदहवें त्रिविक्रम, पंद्रहवें श्रीधर, सोलहवें हृषीकेश, सत्रहवें नृसिंह, अठारहवें विश्वयोनि, उन्नीसवें वामन, बीसवें नारायण, इक्कीसवें पुण्डरीकाक्ष, बाईसवें उपेन्द्र, तेईसवें हरि और चौबीसवें श्रीकृष्ण कहे गये हैं। ये चौबीस मूर्तियाँ चौबीस एकादशियोंसे सम्बन्ध रखती हैं। सालभरमें चौबीस एकादशियाँ और ये चौबीस मूर्तियाँ पूजी जाती हैं। इनकी नित्य पूजा करनेवाला मनुष्य भक्तिमान् होता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनता और पढ़ता है, उसके ऊपर भूतसृष्टिकी रक्षा करनेवाले भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते हैं।
सतीका देहत्याग, पार्वतीविवाह, भगवान् शिवका हरिहररूपमें प्राकट्य और शालग्रामशिलाका महत्त्व
गालवजी कहते हैं—भगवान् विष्णु जिस प्रकार शालग्रामशिलाके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं और भगवान् शिव भी जिस प्रकार लिंगाकारमें स्थित हुए हैं, वह सब प्रसंग मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके अंगूठेसे प्रजापति दक्ष उत्पन्न हुए थे। दक्षके सती नामकी एक पुत्री हुई, जो उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न और बड़ी साध्वी थी। विधिके ज्ञाता भगवान् शंकरने सतीके साथ वेदोक्त विधिसे विवाह किया। दक्ष प्रजापतिका चित्त मोहवश मूढताको प्राप्त हो गया था। उन्होंने एक महान् यज्ञका आयोजन किया और उसमें भगवान् शंकरके प्रति द्वेष-भावका परिचय दिया। पिताके उस महान् द्वेषसे सतीदेवी कुपित हो उठीं और यज्ञवेदीमें आकर प्राणायाममें तत्पर हो उन्होंने अग्निमयी धारणाके द्वारा अपना शरीर त्याग दिया। उनके शरीरमें जो पैतृक अंश था, उसका परित्याग करके अपने भागके साथ सतीदेवीने मन-ही-मन शीतल हिमालयका चिन्तन किया। मृत्युकालमें अपने कर्मके अधीन हुआ मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहीं-वहीं उसका अवतार होता है। अतः