संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| * ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * | ६५९ |
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अग्निमें जली हुई सतीदेवी शीतल हिमालयका चिन्तन करनेके कारण हिमालयकी पुत्री हुईं। वहाँ पर्वतकन्या होकर उन्होंने शिवभक्तिमें तत्पर हो बड़ी उग्र तपस्या की। तदनन्तर सहस्रों वर्षोंके पश्चात् भूतभावन भगवान् महेश्वर ब्राह्मणका वेष धारण कर उस स्थानपर आये और पार्वतीके कर्म एवं स्वभावकी परीक्षा लेकर उन्हें तपस्यासे विशुद्ध जाना। तत्पश्चात् दिव्यशरीर धारण करके भगवान् शिवने पार्वतीका हाथ पकड़ लिया और कहा—'देवि ! तुमने तपस्यासे मुझे जीत लिया है, बोलो तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?' तब पार्वतीने महेश्वरसे कहा—'आप मुझे अंगीकार करनेमें मेरे पिताको निमित्त बनाइये।' उनके इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकरने सप्तर्षियोंको हिमालयके पास भेजा। सप्तर्षियोंने हिमालयके पास जाकर लग्नका समय बतलाया और महादेवजीसे सब समाचार कहकर वे अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर लग्नके दिन इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्मा, विष्णु और अग्निको आगे करके आये और 'वर' वेषमें भगवान् शंकरका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए। हिमवान्ने दूल्ह-वेषमें भगवान् शंकरका दर्शन करके अपनेको कृतार्थ माना और प्रसन्नतापूर्वक मधुपर्क आदि शुभ उपचारोंसे उनका पूजन किया। तत्पश्चात् वेदोक्त विधिसे उस गुणवती कन्याको हिमवान्ने भगवान् शिवको सौंप दिया। उसके बाद भगवान् शिवने अग्निकी परिक्रमा की और जब उनसे गोत्र आदि पूछा गया, तब वे लज्जित-से हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके कथनानुसार विवाहकी शेष विधि पूरी की गयी। जो यज्ञमें चरु ग्रहण करते समय अपने पाँच मुख प्रकाशित करनेवाले हैं, वे ही भगवान् महेश्वर गिरिराजनन्दिनीके लिये सुन्दर रूप और वेष-भूषासे सम्पन्न 'वर' बने हुए विराजमान थे। पार्वतीने भगवान् शंकरको ही अपना प्राणवल्लभ स्वीकार किया। विवाहके पश्चात् दहेज देकर हिमालयने शिवजीको विदा किया। वहाँसे भगवान् शिव मन्दराचल पर्वतपर आये। वहाँ विश्वकर्माने उनके लिये क्षणभरमें मणिमय भवनका निर्माण किया। वह मन्दिर देवाधिदेव भगवान् शिवकी इच्छाके अनुसार बढ़नेवाला था। उस सुन्दर भवनमें पार्वतीके साथ निवास करते हुए भगवान् शंकरकी दृष्टिमें वायुरूपधारी कामदेव आया। कामदेवने शिवजीको देखकर इस प्रकार स्तवन किया—'वृषभध्वज ! आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप गणोंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। हे नाथ! मेरी रक्षा कीजिये। प्रभो! आपके इस चराचर जगत्में कोई ऐसी वस्तु नहीं दिखायी देती, जो आपसे रहित हो। आप ही रक्षक, आप ही सृष्टि करनेवाले तथा आप ही समस्त संसारका संहार करनेवाले हैं। महादेव! मुझपर कृपा कीजिये और मुझे देहदान दीजिये।'
भगवान् शिव बोले—कामदेव ! मैंने पूर्व कालमें तुम्हें पार्वतीके आगे भस्म किया है। अब पुनः उन्हींके समीप शरीरधारी हो जाओ।
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर कामदेवने अपना शरीर धारण किया और विनयसे नम्र हो उसने पार्वतीके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। पार्वती और परमेश्वरका प्रसाद पाकर महामोह एवं बलसे सम्पन्न महातेजस्वी कामदेव तीनों लोकोंमें विचरण करने लगा।
प्राचीन कालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर भयंकर रूप धारण करनेवाले बलोन्मत्त दानवोंने देवताओंको मारा। देवता भयभीत होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये। बृहस्पति आदि सभी देवताओंने जगत्पिता ब्रह्माको नमस्कार करके उनका स्तवन किया। फिर सब-के-सब हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब ब्रह्माजीने उनसे पूछा—'देवताओ ! किसलिये मेरे पास आये हो ?'
देवता बोले—तात ! अद्भुत पराक्रम करनेवाले