संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दैत्योंने युद्धमें हमें परास्त कर दिया। अतः हम सब लोग आपकी शरणमें आये हैं। देवेश्वर! अपनी शरणमें आये हुए हमलोगोंकी आप रक्षा कीजिये।
देवताओंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा— एक समय शिवभक्तोंने भगवान् विष्णुके भक्तोंके साथ एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे बड़ा विवाद हुआ। तब भगवान् शंकरने अपने भक्तोंके देखते-देखते एक परम अद्भुत रूप धारण किया। वह उनका हरिहरस्वरूप था। वे आधे शरीरसे शिव और आधे शरीरसे विष्णु हो गये। एक ओर भगवान् विष्णुके चिह्न और दूसरी ओर भगवान् शिवके चिह्न प्रकट हुए। एक ओर गरुड़ और दूसरी ओर नन्दी वृषभ उपस्थित थे। एक ओर मेघके समान श्याम वर्ण था तो दूसरी ओर कर्पूरके समान गौर वर्ण। दोनोंमें एकताका स्पष्टीकरण हुआ। इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्वमें एक ही भगवान् व्यापक हैं। अतः विश्व भगवान्से भिन्न नहीं है। इस तरह भगवान्की एकताका बोध हुआ। श्रुतियों और स्मृतियोंके अर्थको बाधित करनेवाली भेदबुद्धि नष्ट हो गयी। पाखण्डी और युक्तिवादी सब आश्चर्यचकित हो गये। सबने अपने-अपने मतका आग्रह छोड़कर मोक्षमार्गकी शरण ली। मन्दराचल पर्वतपर वह हरिहर-मूर्ति आज भी विद्यमान है, जिसकी प्रमथ आदि गण सदा स्तुति करते रहते हैं। सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली वह मूर्ति सम्पूर्ण विश्वका बीज एवं अनन्त है। शिव और विष्णुकी उस संयुक्त मूर्तिका स्मरण करनेपर वह सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली है। वह परम सत्य एवं योगी पुरुषोंके द्वारा चिन्तन करने योग्य है। मुक्तिकी इच्छा करनेवाले मनुष्य उस मूर्तिका ध्यान करके परम पदको प्राप्त होते हैं। चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे उसका ध्यान करके मनुष्य फिर मानवलोकमें जन्म नहीं लेता। उस हरिहर-मूर्तिके समीप जो लोग जाते हैं, उनका वे भगवान् कल्याण करते हैं।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् वे अग्नि आदि देवता मन्दराचल पर्वतपर गये और भगवान् महेश्वरको खोजते हुए वहीं भ्रमण करने लगे। तदनन्तर चातुर्मास्य पूर्ण होनेपर हरिहरस्वरूपधारी भगवान् शिव उनके ऊपर प्रसन्न हो प्रत्यक्ष दर्शन देकर बोले—‘देवेश्वरो! अब तुमलोग जाओ और अपने-अपने अधिकारोंका उपभोग करो। मैंने उन दानवोंको जिनसे तुम्हें भय था, मार डाला है।' तब प्रसन्नचित्त एवं बाधारहित देवता कोटि-कोटि विमानोंके द्वारा अपने-अपने अधिकारोंको प्राप्त हुए।
एक समय सब देवताओं तथा भगवान् विष्णु और शिवके द्वारा भी पार्वतीजीकी इच्छाके प्रतिकूल कोई कार्य हो गया। इससे उन्होंने देवताओंको मर्त्यलोकमें प्रस्तर-प्रतिमा होनेका शाप दिया। उसी समय उन्होंने भगवान् विष्णुसे कहा—'आप भी मर्त्यलोकमें शिलारूप होंगे और शिवजीको भी ब्राह्मणोंके शापसे लिंगाकार प्रस्तररूप प्राप्त होगा।' तब भगवान् विष्णुने पार्वतीजीको प्रणाम करके कहा—'महाव्रते! महादेवि! आप सदैव महादेवजीकी प्रिया हैं। सम्पूर्ण भूतोंकी जननि! आपको नमस्कार