भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 696
  • ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६६७

सद्विचार, सन्तोष और साधुसंग। ये चारों जिसके हाथमें हैं, उसकी सिद्धि दूर नहीं है। भगवान् विष्णुकी भक्ति तथा उत्तम धर्मके आचरणसे मनुष्योंको योगसिद्धि प्राप्त होती है। मनुष्य ज्ञानके लिये विद्यालयोंमें भटकता फिरता है। यदि कहीं सद्गुरु प्राप्त हो जायें तो उनसे तत्काल निर्मल दीपशिखाकी भाँति यथार्थ ज्ञानकी उपलब्धि हो जाती है। राग और द्वेष छोड़कर जो क्रोध और लोभसे रहित हो गया है, जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि है, जो विष्णुभक्तका दर्शन करता है, जिसके हृदयमें सब जीवोंके प्रति दयाका भाव स्थिर है तथा जो शौच एवं सदाचारसे युक्त है, वह योगी कभी दुःख नहीं पाता। जो माया आदिके आवरणोंसे रहित तथा मिथ्या वस्तुसे विरक्त है और कुसंगसे दूर रहता है, वह योगसिद्ध पुरुष है। बुद्धि दो प्रकारकी होती है। एक त्याज्य और दूसरी ग्राह्य। संसारविषयक बुद्धि त्याग देने योग्य है और परब्रह्मके चिन्तनमें लगनेवाली कल्याणमयी बुद्धि ग्रहण करने योग्य है। पार्वती! श्रीविष्णुका जो साकार और निराकार स्वरूप है, उसमें प्रतिष्ठित होनेवाले इस अक्षर, अव्यक्त, अमृत एवं सम्पूर्ण तत्त्वको बताया गया। इस प्रकार जानकर योगीपुरुष संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य सद्गुरुके उपदेशसे इस ज्ञानको पाता है। जब उसके ऊपर गुरु प्रसन्नचित्त होते हैं, तब मानो सम्पूर्ण विश्व प्रसन्न हो जाता है, जिसने गुरुको सन्तुष्ट किया, उसने समस्त देवताओं और पितरोंको सन्तुष्ट कर लिया। गुरुका उपदेश, भगवत्प्रतिमाका पूजन, उत्तम विचार, शममें मनका तत्पर होना और ज्ञानपूर्वक कर्मका अनुष्ठान करना—यह सब मोक्षसिद्धिका लक्षण है। द्वादशाक्षरमन्त्र सब पापोंका नाश करनेवाला है। यह दुष्टोंका दमन करनेवाला और परब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है। देवि! द्वादशाक्षररूपधारी निर्मल परब्रह्मके स्वरूपको मैंने तुमसे प्रकाशित किया है। जो मनुष्य इस द्वादशाक्षर मन्त्ररूप भगवत्स्वरूपको, जो योगियोंके ध्यान करने योग्य तथा भक्तिसे ग्राह्य है, चातुर्मास्यमें श्रद्धापूर्वक चिन्तन करता है, भगवान् विष्णु उसके कोटि जन्मोंके पापोंको जलाकर मोक्ष प्रदान करते हैं।

**ब्रह्माजी कहते हैं—**एक समय महाबली तारकासुरके भयसे भागे हुए देवताओंने महादेवजीकी स्तुति की और उनकी आज्ञासे कुमार कार्तिकेयको अपना सेनापति बनाया। फिर स्कन्दके तेजसे प्रबल होकर सब देवता तारकासुरसे युद्ध करने लगे। उस समय देवताओंने दानवोंकी सेनाको मार गिराया। भगवान् विष्णुके चक्रसे छिन्न-भिन्न होकर सहस्रों दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। युद्धमें दानवसेनाको नष्ट होती देख तारकासुर देवताओंका सामना करने लगा। देवेश्वर स्कन्दने बाणोंकी बौछारसे उसकी सेनाको शीघ्र ही तितर-बितर कर डाला। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे कार्तिकेयजीने शक्तिका प्रहार करके सारथिसहित तारकासुरको क्षणभरमें भस्म कर दिया। शेष दैत्य तारकासुरको मरा हुआ देख पातालमें भाग गये। तब देवताओंने कुमारके पराक्रमकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। विजय प्राप्त करके शिव आदि सब देवताओंने स्वामी कार्तिकेयको देवताओंके सेनापति पदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार तारकासुरको मारकर सातवें दिन बालक कार्तिकेयने मन्दराचलपर जा अपने माता-पिताको प्रसन्न किया। परमानन्दमें निमग्न हो स्कन्दने सब वृत्तान्त स्वयं ही माता-पितासे कहा। उस समय भगवान् शंकरने पुत्रका विवाह कर देनेका विचार किया और कार्तिकेयसे कहा—'वत्स! तुम्हारे विवाहका समय प्राप्त है, तुम पत्नी प्राप्त करके उसके साथ धर्माचरण करो।' पिताकी यह बात सुनकर स्वामी कार्तिकेयने कहा—'भगवन्! संसारके दृश्य और अदृश्य