संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पदार्थोंमेंसे मैं किसका ग्रहण और किसका त्याग करूँ। जगत्में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब मेरे लिये माता पार्वतीके समान हैं और जितने भी पुरुष हैं, उन सबको मैं आपके रूपमें देखता हूँ। आप मेरे गुरु हैं, अतः मुझे नरकमें डूबनेसे बचाइये। मैंने आपके प्रसादसे यह विवेक प्राप्त किया है। भयंकर संसार-सागरमें मैं फिर न गिर जाऊँ, इसकी चेष्टा रखें। जैसे दीपक हाथमें लेकर किसी वस्तुको खोजनेवाला पुरुष उस वस्तुको देख लेनेपर उसके लिये स्वीकार किये जानेवाले अन्य सब साधनोंको त्याग देता है, उसी प्रकार योगी ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर संसारको त्याग देता है। सर्वज्ञ परमेश्वर! सर्वव्यापी ब्रह्मको जानकर जिसके सब कर्म निवृत्त हो जाते हैं, उसको विद्वान् पुरुष योगी कहते हैं। महेश्वर! मानवोंके लिये ज्ञान अत्यन्त दुर्लभ है। ज्ञानीजन प्राप्त किये हुए ज्ञानको किसी प्रकार भी खोना नहीं चाहते। यह ज्ञान आपके प्रभावसे ही प्राप्त होने योग्य है। मैं संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छा रखता हूँ। अतः मुझसे इस प्रकार विवाह आदि करनेकी बात नहीं कहनी चाहिये।'
जब देवी पार्वतीने विवाहके लिये बार-बार आग्रह किया, तब कार्तिकेयजी पिता-माताको प्रणाम करके क्रौंच पर्वतपर चले गये और वहाँ परम पवित्र आश्रममें बैठकर बड़ी भारी तपस्या करने लगे। उन्होंने द्वादशाक्षर बीजरूप परब्रह्मका जप किया और पहले ध्यानसे सब इन्द्रियोंका वशमें करके एक मासतक मनको योगमें लगाकर ज्ञानयोग प्राप्त कर लिया। जब उनके सामने अणिमा आदि सिद्धियाँ आयीं, तब वे उनसे क्रोधपूर्वक बोले—'अरी! यदि अपनी दुष्टताके कारण तुमलोग मेरे पास भी चली आयीं, तो मेरे-जैसे शान्तपुरुषोंका कभी पराभव न कर सकोगी।'
यह चातुर्मास्यका माहात्म्य सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो भगवान् शिव अथवा विष्णुको अपने हृदयमें स्थापित करके अभेद-बुद्धिसे उनके अद्वितीय स्वरूपका चिन्तन करता है, उसके लिये शत्रु भी अत्यन्त प्रिय हो जाता है।
चातुर्मास्य-माहात्म्य सम्पूर्ण।
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