भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 698
* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड *६६९

ब्रह्मोत्तरखण्ड

शिवके षडक्षर एवं पंचाक्षर मन्त्रका माहात्म्य; राजा दाशार्ह तथा रानी कलावतीकी कथा

ज्योतिर्मात्रस्वरूपाय निर्मलज्ञानचक्षुषे।
नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये॥

‘ज्योतिमात्र जिनका स्वरूप है, निर्मल ज्ञान ही जिनका नेत्र है, जो लिंगस्वरूप ब्रह्म हैं, उन परम शान्त कल्याणमय भगवान् शिवको नमस्कार है।’

ऋषि बोले—सूतजी! आपने संक्षेपसे भगवान् विष्णुके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया, जो समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला और परम पवित्र है। हमने भी उसे ध्यानपूर्वक सुना है। अब हमलोग त्रिपुरविनाशक शिवजीके माहात्म्य और उनके मन्त्रोंकी महिमाको सुनना चाहते हैं।

सूतजीने कहा—मुनियो! मरणधर्मा मनुष्योंके लिये इतना ही सबसे उत्तम एवं सनातन श्रेय है कि भगवान् महेश्वरकी कथामें अकारण भक्तिभावका उदय हो*। समस्त पुण्यों, श्रेयके सम्पूर्ण साधनों और समस्त यज्ञोंमें जपयज्ञको ही सर्वोत्तम माना गया है†। जैसे सब देवताओंमें त्रिपुरारि भगवान् शंकर श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब मन्त्रोंमें शिवका षडक्षर मन्त्र श्रेष्ठ है। उसीको प्रणवसे रहित होनेपर पंचाक्षर मन्त्र भी कहते हैं। वह जप करनेवाले पुरुषोंको मोक्ष देनेवाला है। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले सब श्रेष्ठ मुनि इस मन्त्रका सम्यग् रूपसे सेवन करते हैं। शिवजीके शुभ पंचाक्षर मन्त्रमें सर्वज्ञ, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् शिव सदा रमते रहते हैं। यह मन्त्रराज सम्पूर्ण उपनिषदोंका आत्मा है। इसके जपसे सब मुनियोंने निरामय परब्रह्मका साक्षात्कार किया है। ‘नमः शिवाय’ मन्त्रमें ‘नमः’ पदके अर्थभूत नमस्कारके द्वारा जीवभाव परमात्मा शिवमें मिलकर तद्रूप हो जाता है। अतः वह मन्त्र साक्षात् परब्रह्मस्वरूप है। संसार-बन्धनमें बँधे हुए देहधारियोंके हितकी कामनासे स्वयं भगवान् शिवने ‘ॐ नमः शिवाय’ इस आदिमन्त्रका प्रतिपादन किया है। जिसके हृदयमें ‘ॐ नमः शिवाय’ यह मन्त्र निवास करता है, उसके लिये बहुत-से मन्त्र, तीर्थ, तप और यज्ञोंकी क्या आवश्यकता है‡? देहधारी मनुष्य तभीतक दुःखोंसे भरे हुए इस भयंकर संसारमें भटकते हैं, जबतक कि वे एक बार भी इस षडक्षर मन्त्रका उच्चारण नहीं करते। यह षडक्षर मन्त्र सम्पूर्ण ज्ञानोंकी निधि है। यह मोक्षमार्गको प्रकाशित करनेवाला दीपक है। अविद्याके समुद्रको सोखनेवाला वडवानल है और महापातकोंके जंगलको जला डालनेवाला दावानल है। अतः यह पंचाक्षर मन्त्र सब कुछ देनेवाला माना गया


* एतावदेव मर्त्यानां परं श्रेयः सनातनम्। यदीश्वरकथायां वै जाता भक्तिरहैतुकी॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। ५)

† सर्वेषामपि पुण्यानां सर्वेषां श्रेयसामपि। सर्वेषामपि यज्ञानां जपयज्ञः परः स्मृतः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। ७)

‡ किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तीर्थैः किं तपोऽध्वरैः। यस्यो नमः शिवायेति मन्त्रो हृदयगोचरः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। १६)