संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रसिद्ध एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। वे समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ, सब अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, वेदोंके पारंगत विद्वान्, शूरवीर, अत्यन्त बली, उत्साही, नित्य उद्योगी और दयाके निधान थे। राजाको शिकार खेलनेका व्यसन था। एक दिन उन्होंने अपनी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर भयंकर वनमें प्रवेश किया और वहाँ बहुतसे व्याघ्र, जंगली सूअर तथा सिंहोंको अपने बाणोंसे बींध डाला। राजा मित्रसह रथपर सवार हो कवचसे सुरक्षित होकर वनमें विचर रहे थे। उसी समय उन्होंने अग्निके समान आकृतिवाले एक निशाचरको मारा। उसका छोटा भाई दूरसे यह देखकर शोकमग्न हो गया और वहीं कहीं छिप गया। भाईको मारा गया देख उसने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—'यह राजा बड़ा दुर्धर्ष वीर है, इसे छलसे ही जीतना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके वह पापात्मा राक्षस मनुष्यके समान आकृति बनाकर राजाके समीप आया। राजाने सेवा करनेके लिये विनीतभावसे आये हुए उस पुरुषको देखकर अज्ञानवश उसे रसोईघरका अध्यक्ष बना दिया। तत्पश्चात् राजा लौटकर अपनी पुरीको आये। महाराज मित्रसहकी पत्नी मदयन्ती नामसे प्रसिद्ध थी। वह नलकी स्त्री दमयन्तीके समान बड़ी पतिव्रता थी। एक दिन राजा मित्रसहने श्राद्धके दिन मुनिवर वसिष्ठको निमन्त्रित करके अपने घरपर बुलाया। उस समय रसोईयेके रूपमें राक्षसने सागमें मनुष्यका मांस मिला दिया और वही वसिष्ठजीके आगे परोस दिया। उसे देखकर वसिष्ठजी बोले—'राजन्! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है। तू इतना दुष्ट और छली है कि मेरे आगे मनुष्यका मांस रख दिया। इस पापके कारण तू राक्षस हो जायगा।' जब मुनिको यह मालूम हुआ कि यह सारी करतूत राक्षसकी है, तब उन्होंने उस शापको बारह वर्षोंकी अवधिमें सीमित कर दिया। तब राजा भी कुपित होकर बोले—'यह मेरी करतूत नहीं थी और न मैं इस विषयमें कुछ जानता ही था, तो भी आपने मुझे अकारण शाप दे दिया। इसलिये गुरु होनेपर भी आपको मैं भी शाप देता हूँ।' ऐसा कहकर राजा अंजलिमें जल ले गुरुको शाप देनेके लिये उद्यत हुए। यह देख रानी मदयन्तीने पतिके चरणोंमें गिरकर उन्हें ऐसा करनेसे रोका। रानीके वचनका मान रखनेके लिये राजा शाप देनेसे निवृत्त हो गये और उस अंजलिके जलको उन्होंने अपने दोनों पैरोंपर डाल दिया। इससे राजाके दोनों पैर कल्मषयुक्त (मलिन) हो गये। तबसे राजाका नाम कल्माषपाद हो गया।
गुरुके शापसे राजा वनमें विचरनेवाले राक्षस हुए। एक दिन वनमें कहीं किशोर अवस्थावाले नवविवाहित मुनि-दम्पति रमण कर रहे थे। उस समय उस नर-भक्षी राक्षसने तरुण मुनिकुमारको खानेके लिये पकड़ लिया। ठीक उसी तरह, जैसे छोटे-से मृगशिशुको कोई व्याघ्र पकड़ लेता है। राक्षसके वशमें पड़े हुए अपने पतिको देखकर उसकी प्यारी स्त्री करुणापूर्वक बोली—'सूर्यवंशयशोधर महाराज! आप ऐसा पाप न कीजिये। आप राक्षस नहीं, अयोध्याके सम्राट् हैं, रानी मदयन्तीके पति हैं। प्रभो! ये मेरे स्वामी मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम हैं, इन्हें न खाइये। शरणमें आये हुए दीन, दुःखी मनुष्योंको आप ही सहारा देनेवाले हैं। इन महात्मा पतिके बिना मेरा यह शरीर मेरे लिये महान् भार है। इस मलिन पापमय पांचभौतिक शरीरसे क्या सुख होगा? ये मुनिकुमार देखनेको बालक हैं; किंतु वेदोंके विद्वान्, शान्त, तपस्वी और अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता हैं। इन्हें प्राणदान देकर आपको सम्पूर्ण जगत्के रक्षा करनेका पुण्य होगा। महाराज! मैं ब्राह्मणकी स्त्री हूँ, अभी बालिका हूँ, मुझपर