संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 702, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७३
कृपा कीजिये। आप-जैसे साधु पुरुष अनाथों, दीनों और पीड़ितोंपर कृपा करनेवाले होते हैं।'
इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भी उस निर्दयी, नर-भक्षी राक्षसने उस ब्राह्मणकुमारकी गर्दन मरोड़ डाली और उन्हें उदरस्थ कर लिया। तब वह पतिव्रता ब्राह्मणी अत्यन्त शोकसे ग्रस्त हो विलाप करने लगी। उसने पतिकी हड्डियोंको एकत्रित करके भयंकर चिता प्रज्वलित की और पतिका अनुसरण करनेके लिये अग्निमें प्रवेश करते समय राक्षसरूपधारी राजाको इस प्रकार शाप दिया—'अरे ओ पापात्मन्! तूने मेरे पतिको खा लिया है, अतः तू भी जब स्त्रीसे समागम करेगा, उसी समय तेरी मृत्यु हो जायगी।' यों कहकर वह पतिव्रता स्त्री चिताकी आगमें प्रवेश कर गयी।
गुरुके शापका उपभोग करके राजा पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त हुए और प्रसन्नतापूर्वक घरको गये। रानी मदयन्ती उस पतिव्रता ब्राह्मणीके शापको जानती थीं। इसलिये वैधव्यसे डरकर उन्होंने रतिकी इच्छावाले पतिको अपने पास आनेसे मना कर दिया। राजा मित्रसह राज्यके सुखभोगसे विरक्त हो गये और सम्पूर्ण लक्ष्मीका परित्याग करके पुनः वनमें चले गये। राज्य छोड़कर सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरते हुए राजाने अपने पीछे-पीछे आती हुई एक भयंकर रूपवाली पिशाचीको देखा। वह ब्रह्महत्या थी। श्रेष्ठ मुनियोंके उपदेशसे राजाने उस ब्रह्महत्याको पहचाना। उसके निवारणके लिये विरक्तचित्तवाले राजाने अनेक वर्षोंतक बहुत-से क्षेत्रोंमें विचरण किया। फिर भी जब ब्रह्महत्या निवृत्त नहीं हुई, तब वे मिथिलामें आये। इसी समय उधर आते हुए निर्मल अन्तःकरणवाले गौतम मुनिको उन्होंने देखा और उनके समीप जाकर बार-बार प्रणाम किया। तब मुनिश्रेष्ठ गौतमने राजाको आशीर्वाद दे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—'राजन्! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? तुम्हारे राज्यमें कोई विघ्न-बाधा तो नहीं है?'
राजाने कहा—ब्रह्मन्! आपकी कृपासे हम सब लोग कुशलसे हैं; परंतु यह भयंकर रूपवाली पिशाची हमें बड़ा दुःख देती है। शापग्रस्त होकर हमने जो दुर्लङ्घ्य पाप कर डाला है, उसकी शान्ति सहस्रों प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं हो रही है। आप प्रेमपूर्वक सम्भाषण करके मेरे चित्तको आनन्दित कर रहे हैं। महाभाग! आज अपने चरणकमलोंकी शरणमें आये हुए मुझ पापीको शान्ति प्रदान कीजिये, जिससे मुझे सुख मिले।
तब करुणानिधि गौतमजीने कहा—राजेन्द्र! तुम्हें साधुवाद है? अब अपने महान् पापोंसे होनेवाले भयको त्याग दो। जब भगवान् शंकर रक्षा करनेवाले हैं, तब उनकी शरणमें आये हुए भक्तोंको कहाँसे भय हो सकता है? गोकर्ण नामक मनोरम क्षेत्र महापातकोंका संहार करनेवाला है। वहाँ बड़े-से-बड़े पाप भी नहीं टिक सकते। गोकर्ण क्षेत्रमें विद्यमान भगवान् शिव स्मरण करनेमात्रसे समस्त पापोंका नाश कर डालते हैं। जैसे कैलास और मन्दराचलके शिखरपर भगवान् शिवका निश्चित निवास है, उसी प्रकार गोकर्णमण्डलमें भी है। वहाँ महादेवजी महाबल नामसे निवास करते हैं। रावण नामक राक्षसने घोर तपस्या करके जिस शिवलिंगको प्राप्त किया था, उसीको गणेशजीने गोकर्ण क्षेत्रमें स्थापित किया है। सनक-सनन्दन आदि महात्मा तथा मृगचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले साध्य एवं मुनिगण वहाँ बैठकर भगवान् शिवकी उपासना करते हैं। दण्डी, मुण्डी, स्नातक, ब्रह्मचारी तथा तपसे समस्त पातकोंको जला डालनेवाले महात्मा भी देवाधिदेव शिवकी उत्तम भक्तिसे उपासना करते हैं। इस ब्रह्माण्ड-मण्डलमें गोकर्णके समान दूसरा क्षेत्र नहीं है। वहाँ महात्मा अगस्त्य मुनिने घोर तपस्या की है। राजन्! इस तीर्थमें सम्पूर्ण देवताओंके स्थान हैं। देवाधिदेव भगवान् विष्णु,